|
भारत में घटते बाघों की चिंता | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
संयुक्त राष्ट्र ने भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से अपील की है कि वो बाघों के संरक्षण के लिए कार्रवाई करें. संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी कन्वेंशन ऑन इंटरनेशनल ट्रेड इन इनडैंजर्ड स्पीसीज़(साइट्स) के प्रमुख विलेम विन्सटेकर्स ने मनमोहन सिंह के नाम एक खुली चिट्ठी में यह अपील की है. विन्सटेकर्स ने कहा कि उनका इरादा भारत को शर्मिंदा करने का नहीं है और पत्र को सार्वजनिक करना बाघों के संरक्षण के अंतिम प्रयास के तौर पर किया गया है. 'साइट्स' का मानना है कि बेलगाम शिकारियों के कारण भारत के जंगलों में बाघों की संख्या लगातार घटती जा रही है. भारतीय प्रधानमंत्री को इस तरह पत्र लिखा जाना एक असामान्य क़दम माना जा रहा है. पत्र की भाषा भी दोटूक है. 'साइट्स' का मानना है कि भारत बाघों के शिकार को रोकने के लिए प्रभावी उपाय नहीं कर रहा है. घटती संख्या बाघों की संख्या की दृष्टि से भारत दुनिया में पहले स्थान पर है, लेकिन हाल के वर्षों में इनकी संख्या लगातार घटती जा रही है. सरकारी अनुमानों के अनुसार भारत में क़रीब 3500 बाघ हैं. लेकिन वन्यजीव संरक्षण से जुड़ी कई संस्थाएँ इसे बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया आँकड़ा मानते हैं. उल्लेखनीय है कि 30 साल पहले तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने बाघ परियोजना की शुरूआत की थी, लेकिन फिर भी भारत में बाघों की संख्या को बढ़ाया नहीं जा सका है. वन्यजीवों से जुड़ी तस्करी पर नज़र रखने वाले 'साइट्स' के अधिकारी जॉन सेलर के अनुसार बाघों का शिकार अब एक बहुत ही पेशेवर धंधा बन चुका है. उन्होंने कहा, "यदि भारत के एक प्रमुख वन्यजीव अभ्यारण्य में एक भी बाघ नहीं बचे होने की बात सही है तो फिर इससे ज़्यादा गंभीर बात क्या हो सकती है?" |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||