|
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
उत्तरांचल का नरभक्षी तेंदुआ मारा गया
क़रीब बीस दिनों की कसरत के बाद उत्तरकाशी के कई गांवों में आतंक का पर्याय बन चुका नरभक्षी तेंदुआ गुरुवार की सुबह मारा गया. समझा जा रहा है कि ये वही नरभक्षी है जिसने पिछले एक महीने में इस इलाक़े में नौ बच्चों को अपना शिकार बना लिया था. बुधवार की रात ये नरभक्षी तेंदुआ माल्ना नाम के गांव में शिकार की तलाश में आया था और उसने एक बच्चे पर हमला भी किया था. उस बच्चे के भाई ने बहादुरी दिखाते हुए तेंदुए पर अपनी बेल्ट से वार किया जिससे वह भाग गया. ये खबर गश्त करते हुए शिकारी दल को मिली. उसका पीछा करते हुए शिकारी दल ने उस पर गोली चलाई लेकिन वह मरा नहीं. घायल तेंदुए की तलाश रात भर चलती रही और गुरुवार तड़के शिकारी दल के मुखिया लखपत सिंह रावत ने चार गोलियाँ दागकर तेंदुए को मार गिराया. उत्तरकाशी मे यमुनोत्री जाने वाले रास्ते के पास मारे गए तेंदुए को देखने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी. क्षेत्र के लोगों ने राहत की साँस ली है जहां उसके खौफ़ से लोगों का रहना मुश्किल हो गया था. उत्तरकाशी के जिलाधिकारी केके पंत के अनुसार ये करीब आठ फुट लंबा नर तेंदुआ है. आरंभिक जांच से पता चला है कि ये तेंदुआ बूढ़ा हो चुका था. इसके दाँत और नाखून घिसे हुए हैं और ऐसा लगता है कि जानवर न पकड़ पाने के कारण ही ये नरभक्षी हो गया था. लोगों को आशंका है कि उस इलाक़े में एक और नरभक्षी सक्रिय है लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यही अकेला नरभक्षी था. हालाँकि जिलाधिकारी का कहना है कि ऐसे मामलों में सौ फीसदी दावे के साथ कुछ नहीं कहा जा सकता क्योंकि उत्तरकाशी घने जंगलों से घिरा है औऱ यहां तेंदुओं की बड़ी संख्या है. पौड़ी में आतंक उधर, पौड़ी गढवाल के कार्बेट नेशनल पार्क से सटे इलाकों में भी नरभक्षियों का ऐसा ही आतंक है जहाँ तेंदुओं की संख्या काफी ज्यादा है. आंकड़ों पर नज़र डालें तो पिछले नौ साल मे 126 लोगों को तेंदुए खा चुके हैं इनके अलावा 249 लोगों को गंभीर रूप से घायल कर दिया है. इसी अवधि में सरकारी निर्देश पर 56 तेंदुओं को शिकारियों ने मारा है और सात पिंजरों में पकड़े गए हैं.लेकिन तेंदुओं का खौफ़ कम नहीं हुआ है. विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में जंगल कटने और छोटे जानवरों का बहुत ज्यादा शिकार होने से तेंदुओं के लिए भोजन रह ही नहीं गया है. बाघ अपने इलाके में तेंदुओं को घुसने नही देते हैं लिहाज़ा तेंदुओं का रूख रिहायशी इलाकों की तरफ हो रहा है. ध्यान देने की बात ये है कि तेंदुआ वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के तहत पहली अनुसूची के लुप्तप्राय जानवरों में एक है. जहाँ आदमी की जान कीमती है वहीं पर्यावरण के लिहाज से तेंदुए को बचाना भी एक चुनौती है. |
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||