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उत्तरांचल में नरभक्षी तेंदुओं का बढ़ता आतंक
भले ही जिम कार्बेट ने कुमाऊं के नरभक्षियों का सत्तर साल पहले सफ़ाया कर दिया हो लेकिन उत्तरांचल के गढ़वाल क्षेत्र में नरभक्षी तेंदुओं का आतंक दिन प्रति दिन बढ़ता जा रहा है. इनकी दहशत से लोग शाम ढलते ही घरों में दुबक जाते हैं. गढ़वाल के उत्तरकाशी में हाल के दिनों में नरभक्षी तेंदुए ने नौ बच्चों को अपना शिकार बनाया है. बड़ी मुश्किल से एक तेंदुए को गुरूवार 15 जनवरी को मारा गया. यह पता नहीं चल सका कि क्या यह वही तेंदुआ था जो लगातार बच्चों को अपना शिकार बना रहा था. पौड़ी जिले में भी पिछले 6 महीनों में 13 लोग तेंदुए का शिकार बन चुके हैं. उत्तरकाशी के पंचाण गांव में 6 साल का सज्जन पाल अपने घर के आंगन में खेल रहा था जब अचानक तेंदुआ उसे उठा ले गया. तीन दिन बाद जंगल में उसकी लाश मिली. गांव के प्रीतम सिंह का कहना है कि हमारा जीना मुशिकल हो गया है. कब कहां से तेंदुआ किस पर हमला कर दे डर ही लगा रहता है. उधर पौड़ी गढ़वाल के कार्बेट नेशनल पार्क से सटे इलाकों में भी नरभक्षियों का ऐसा ही आतंक है जहां तेंदुओं की संख्या काफ़ी ज्यादा है. आंकड़ों पर नज़र डालें तो पिछले 9 साल मे 126 लोगों को तेंदुए खा चुके हैं जबकि 249 लोगों को गंभीर रूप से घायल कर दिया है. इसी अवधि में सरकारी निर्देश पर 56 तेंदुओं को शिकारियों ने मारा है और सात पकड़े गए हैं लेकिन तेंदुओं का खौफ़ कम नहीं हुआ है. आतंक नरभक्षी के आतंक के साए में जी रहे पौड़ी के रेवड़ी गांव के लोगों ने प्रशासन की ढिलाई से तंग आकर खुद ही मोर्चा संभाला और एक तेंदुए को पिछले महीने मार गिराया.
क्षुब्ध गांववालों ने पौड़ी में डीएम कार्यालय पर प्रदर्शन भी किया. रेवड़ी गांव की ही बीना देवी की तीन साल की बेटी को तेंदुआ खा गया था. वो बताती हैं, " मेरी बेटी को आंगन में बैठाकर वो भैंस को चारा डालने कुछ क़दम दूर ही गई थीं कि पलक झपकते तेंदुआ न जाने कहां से आया और उनकी बेटी को उनकी आंखों के सामने उठा कर ले गया." पहाड़ों में अब बाघ और तेंदुए जैसे जंगली जानवर घरों तक बेखौफ़ मंडराने लगे हैं. देहरादून स्थित वाइल्ड लाइफ इन्स्टीट्यूट ऑफ इंडिया में वन्य जीव विशेषज्ञ डॉ एस पी गोयल बताते हैं कि 15 साल से कम उम्र के बच्चे तेंदुए का आसान शिकार होते हैं. और एक बार मनुष्य से निर्भीक हो जाने के बाद ये तेंदुए बार बार हमला करते हैं. नरभक्षी होते तेंदुओं के इस व्यवहार को समझने के लिए वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ने पौड़ी में इकॉलोजी ऑफ लेपर्ड के नाम से एक प्रोजेक्ट भी शुरु किया है. डॉ गोयल बताते हैं कि मूल रूप से पिछले कुछ वर्षों में जंगल कटने और छोटे जानवरों का बहुत ज्यादा शिकार होने से तेंदुओं के लिए भोजन रह ही नहीं गया है. उनका कहना है कि बाघ अपने इलाक़े में तेंदुओं को घुसने नही देते हैं लिहाज़ा तेंदुओं का रूख रिहायशी इलाकों की तरफ हो रहा है. ध्यान देने की बात ये है कि तेंदुआ वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के तहत पहली अनुसूची के लुप्तप्राय जानवरों में एक है. जहाँ आदमी की जान कीमती है वहीं पर्यावरण के लिहाज से तेंदुए को बचाना भी उतना ही ज़रूरी है. |
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