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भूमंडलीकरण के दौर में छोटे राज्य
भूमंडलीकरण और बाज़ार की ताक़त के ज़ोर पर मनचाहे सौदे करने वाले दौर में राजनीतिक कुशलता और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद जैसे मुद्दों के आधार पर गठित तीन राज्यों झारखंड, उत्तरांचल और छत्तीसगढ़ आज राजनीतिक रुप से अलग अलग स्थितियों में हैं लेकिन पहले तीन वर्षों की इनकी उपलब्धियाँ इनके निर्माण की प्रासंगिकता पर प्रश्नचिन्ह बनकर खड़ी हैं. विकास, बढ़िया प्रशासन, क्षेत्रीय अस्मिता वगैरह की बातें मात्र तीन वर्ष बाद भी किसी को याद हो ऐसा नहीं लगता. झारखंड की हालत शायद सबसे ख़राब है. जबकि प्राकृतिक संसाधनों और स्पष्ट आदिवासी पहचान के चलते इसके विकास और पहचान की संभावना सबसे ज़्यादा थी और शायद अब भी है. नक्सली यहाँ के काफ़ी बड़े इलाक़े में समानांतर शासन चला रहे हैं और उनका प्रभाव क्षेत्र तीन वर्षों में काफ़ी बढ़ा है. मंत्रीमंडल और शासन में साझेदार दल यहाँ प्रेशर ग्रुप की तरह काम नहीं करते, बल्कि वे सत्ता और लूट के साझेदार बने हुए हैं. गठजोड़ ठेकेदार, व्यापारी, अधिकारी और नेताओं का जितना प्रबल गठजोड़ झारखंड में दिखता है वैसा आज कहीं नहीं है.
यह माना जा रहा था कि प्राकृतिक संसाधनों का ख़जाना होने तथा कलकत्ता और मुंबई से सीधे जुड़े होने के चलते झारखंड में तेज़ी से पूँजी निवेश होगा, बड़े-बड़े उद्योग लगेंगे पर राजनीतिक-प्रशासनिक अराजकता ने ऐसा होने नहीं दिया है. उल्टे इस बीच मोदी समूह ने बिहार स्पंज का बचा खुचा कारोबार समेटा, जमशेदपुर से लगा आदित्यपुर औद्योगिकक्षेत्र सूना हुआ और निजी तथा सार्वजनिक क्षेत्र की कई इकाइयों ने दम तोड़ा है. होने को सिर्फ़ सड़क और पुलिया का निर्माण हुआ है जिसमें ठीक-ठाक राजस्व वाले इस प्रदेश की पूँजी सड़क पर जाने के साथ-साथ ठेकेदार, इंजीनियर, अधिकारी और नेताओं की जेबों में भी गई है और सब बम-बम कर रहे हैं. एक और विकास हुआ है, जो सिर्फ़ राँची नहीं बल्कि बाक़ी दोनों प्रदेशों की राजधानी में हुआ है - नई राजधानी विकसित करने की तैयारी. अभी मुख्य काम जगह चुनने का चल रहा है. जिधर मुख्यमंत्री और सरकार की नज़र मुड़ती है वहाँ की ज़मीन मंहगी हो जाती है, बिल्डर लॉबी मालामाल हो रही है. नौकरशाही हावी
पर हालत यह है कि वे यहीं क़ैद होकर रह गए हैं. उनके मंत्रियों तक पर झूठे आरोपों का घेरा पड़ जाता है, नौकरशाही हावी रहती है. कभी चौलाई, मड़वा, कोदा में विदेशियों की दिलचस्प ख़बरें उड़ती हैं तो कभी विकास के नाम पर शहर उजड़ने की. नया निवेश, नया उद्योग, नए कारोबार की ख़बर तो अभी तक सुनाई नहीं पड़ी है. वही नौकरशाह, वही ठेकेदार, वही भाजपा और वही काँग्रेस. बाक़ी राज्य तो एक पार्टी के राज का रोना रो सकते हैं उत्तराँचल ने तो दोनों पार्टियों को भुगत कर देख लिया - समाजवादी पार्टी को वह देखना नहीं चाहता और ब्राह्मण-ठाकुर बहुल राज्य में बहुजन समाज पार्टी के लिए कोई गुँजाइश नहीं है. छत्तीसगढ़ भी अलग नहीं
बड़े उद्योग आने या निवेश के फ़ैसलों का तो पता नहीं लेकिन राज्य प्रशासन कभी नदी बेचने के लिए चर्चा में आया तो कभी सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों के विनिवेश के विवाद के चलते. चुनाव के चलते जो चर्चा हो रही है उसे छोड़ भी दें तो नक्सलियों का आतंक, ठेकों की लूट और चालाक-धूर्त अधिकारियों का राज बढ़ा ही है. नए राज्य बनने और वहाँ विकास-पिछड़ेपन, शासन-कुशासन की चर्चा का कोई अंत नहीं है. पर इतना ज़रुर लगता है कि जो माँग थी, जो घोषित मंशा थी, वह पूरी नहीं हुई है. उत्तराखंड और झारखंड के नाम पर जो लंबी लड़ाई चली और उन आंदोलनों पर जो राजनीतिक रोटियाँ सेंकीं गईं वह सब धरी रह गईं. आदिवासी राज, अपना राज, विकास और सुशासन जैसी चींजें कहीं नहीं दिखतीं. छोटे राज्यों की ताक़त एक और चीज़ न देखें तो चर्चा अधूरी रहेगी. भूमंडलीकरण और बाज़ार के आकार की ताक़त के आधार पर बेहतर सौदा पटाने के युग में छोटे राज्यों की सार्थकता पर सवाल उठाना ज़रुरी है. भुखमरी, ख़ुदकशी, नक्सली आतंक, बच्चे बेचने जैसी बदनामी झेलने वाले आँध्र प्रदेश ने इस बीच क्या-क्या पाया है यह याद करना ज़रुरी है.चंद्राबाबू नायडू कितनी बार लाखों टन अनाज, मनचाही नियुक्तियाँ और अरबों का निवेश ले आए हैं इसे याद करना चाहिए. सारी मारकाट, सारी बदनामी और सारी मानवनिर्मित आपदाएँ झेलने के बाद गुजरात ने क्या पाया है यह भी याद करना ज़रुरी है. ऐसे में लगता है कि चार सांसदों वाले उत्तराँचल और 14 सांसदों वाले झारखंड की आवाज़ कौन कहाँ सुनेगा? पिछड़े बिहार का बँटवारे से क्या गया और दिग्विजय सिंह को क्या राजनीतिक नुक़सान हुआ, जैसे सवाल अपनी जगह पर हैं हीं. |
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