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गुरुवार, 01 नवंबर, 2007 को 13:52 GMT तक के समाचार
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'चीन से तुलना अब बेमानी नहीं लगती'

भारत-चीन के झंडे
भारत और चीन में जल्द ही विकसित देशों में शामिल होने की क्षमता है
कुछ वर्ष पहले तक यह कहना कि भारत चीन की तरह तेज़ी से विकास कर सकता है, नेताओं के कोरे आश्वासनों की तरह लगता था.

पहले इस तरह के दावों को आधार देने वाले आँकड़े नहीं थे लेकिन अब यह बात पुरानी हो चुकी है.

भारतीय उद्योग जगत का असाधारण उदय, भारत में बचत और निवेश दर में आशा से कहीं अधिक वृद्धि और पिछले पाँच वर्षों की लगातार ऊँची विकास दर से स्पष्ट है कि चीन से तुलना अब कतई बेमानी नहीं है.

इन दोनों देशों में से कौन सा देश आर्थिक विकास की लंबी दौड़ में आगे रहेगा अभी यह स्पष्ट नहीं है, वैसे इस पर सोचना अभी ज़रूरी भी नहीं है.

जो साफ़ दिख रहा है वह यह है कि दोनों विकसित देशों की श्रेणी में शामिल होने की ओर मज़बूती से बढ़ रहे हैं.

राह पर

पहले प्रमाण के रूप में हम इन दोनों देशों की प्रति व्यक्ति वार्षिक आय को लेते हैं.

 औद्योगिक देशों की प्रति व्यक्ति आय 20 हज़ार डॉलर को हम मानक मानें तो 2016 तक चीन और 2028 तक भारत एक विकसित औद्योगिक देश की श्रेणी में शुमार हो जाएगा

भारत की ख़रीद क्षमता लगभग चार हज़ार डॉलर है जबकि चीन में यह इसके दोगुने से भी थोड़ा अधिक है.

हाल के वर्षों में दोनों देशों ने जो आय वृद्धि दर ( भारत की लगभग 9 फ़ीसदी और चीन की 11 फ़ीसदी) हासिल की है और जनसंख्या वृद्धि दर के आधार पर हम यह अनुमान लगा सकते हैं कि आने वाले कुछ सालों में दोनों देशों में आय किस तरह बढ़ेगी.

औद्योगिक देशों की प्रति व्यक्ति आय 20 हज़ार डॉलर को हम मानक मानें तो 2016 तक चीन और 2028 तक भारत एक विकसित औद्योगिक देश की श्रेणी में शुमार हो जाएगा.

कुछ वर्ष पहले तक भारत की क्षमताओं पर संदेह किया जाता था

चीन का लंबे समय (वर्ष 1978 से) से उच्च विकास दर बनाए रखने का रिकॉर्ड है और इसे देखते हुए चीन के बारे में यह आकलन कोई आश्चर्यजनक नहीं है.

चीन के बारे में अगर इस तरह का आकलन आज से 20 वर्ष पहले भी किया जाता तो भी यही निष्कर्ष होता.

सबसे बड़ा आश्चर्य तो भारत है. कुछ वर्ष पहले तक भारत के औद्योगिक देश होने के बारे में सोचना भी सपने की तरह था लेकिन अब हक़ीकत यह है कि 21 साल बाद इस असाधारण उपलब्धि को हासिल किया जा सकता है.

जोखिम भी

लेकिन लोगों को इसकी रौ में नहीं बह जाना चाहिए. मैंने सिर्फ़ वर्तमान हालात को देखते हुए भविष्य के बारे में एक आकलन किया है. कुछ अप्रत्याशित घटनाओं से यह भविष्यवाणी ग़लत भी हो सकती है.

पर्यावरण पर बढ़ते दबाव के मद्देनज़र विकासशील देशों के लिए उच्च विकास दर को बरकरार रखने में ख़ासी मुश्किल हो सकती है.

 पर्यावरण पर बढ़ते दबाव के मद्देनज़र विकासशील देशों के लिए उच्च विकास दर को बरकरार रखने में ख़ासी मुश्किल हो सकती है

इसके अलावा राजनीतिक उठापठक भी हो सकती है और इससे दोनों देशों को ख़तरा है.

हालांकि इन सब चेतावनियों के बावजूद में जो कुछ भी हो रहा है वह बुनियादी बदलाव है.

चीन से आगे

ऑटोमोबाइल क्षेत्र में भविष्यवाणी करने वाली दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित संगठनों में से एक, मिशिगन के सीएसएम वर्ल्डडवाइड की भविष्यवाणी है कि भारत अगले वर्ष चीन को पछाड़ कर विश्व में सबसे तेज़ी से बढ़ता कारों का बाज़ार बन जाएगा.

वर्ष 2007 और 2013 के बीच चीन में वाहनों की बिक्री की वृद्धि दर 8.05 प्रतिशत रहने की संभावना है जबकि भारत में यह आँकड़ा 14.47 प्रतिशत रह सकता है.

इसका एक कारण यह है कि भारत में पहली बार इस क्षेत्र में नए-नए प्रयोग हो रहे हैं.

 वर्ष 2007 और 2013 के बीच चीन में वाहनों की बिक्री की वृद्धि दर 8.05 प्रतिशत रहने की संभावना है, जबकि भारत में यह आँकड़ा 14.47 प्रतिशत रह सकता है

टाटा मोटर्स जैसे समूह इसके लिए बधाई के पात्र हैं कि उनके प्रयासों से काफ़ी सस्ती कारों की श्रेणी में भारत अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी बन सकता है. ऐसी कारों की क़ीमत एक लाख रुपए से भी कम रह सकती है.

जहाँ तक बचत और निवेश की बात है भारत राष्ट्रीय आमदनी का लगभग 34 प्रतिशत हर साल निवेश करके पूर्वी एशियाई देशों की कतार में शामिल हो गया है.

और इसमें भी औद्योगिक क्षेत्रों ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई है.

भारत इससे भी अधिक विकास के साथ चीन की बराबरी कर सकता है या फिर उससे भी आगे निकल सकता है क्योंकि कई क्षेत्रों में अभी भी सुस्ती है.

सुधार और संभावनाएँ

भारत में श्रम क़ानून काफ़ी उलझे हुए है हैं, जिन्हें बदले जाने की ज़रूरत है. इसके अलावा अफ़सरशाही भी काफ़ी बड़ी और बाधा खड़ी करने वाली है.

इसे ठीक करने के लिए शीर्ष स्तर पर इच्छाशक्ति के सिवाय कुछ नहीं चाहिए.

भारतीय शेयर बाज़ारों में तेज़ उछाल आया है

इसके अलावा ऊर्जा और पर्यावरण से जुड़े मसले भी चिंता के विषय हैं.

अगर भारत का अमरीका से परमाणु समझौता हो जाता है तो इससे ऊर्जा की समस्या कुछ हद तक समाप्त हो जाएगी.

भारत के पास ऐसे मानव श्रम की काफ़ी संख्या है जिनका उपयोग नहीं हो पाता है क्योंकि 30 प्रतिशत से अधिक लोग निरक्षर हैं.

आखिरकार, दक्षिण और पूर्व एशिया के देशों में व्यापार जो पहले काफ़ी कम हुआ करता था वह अब बढ़ रहा है. ख़ासकर भारत और चीन के बीच.

वर्ष 1997-98 में भारत और चीन के बीच 1.6 अरब डॉलर का व्यापार होता था, जो इस वर्ष बढ़कर 15 से 20 अरब डॉलर के बीच हो सकता है.

पिछले कुछ वर्षों से इन दोनों देशों के बीच व्यापार 40 फ़ीसदी से अधिक की दर से प्रतिवर्ष बढ़ रहा है.

भविष्य में इसके और बढ़ने की संभावना है, जो इन दोनों देशों की अर्थव्यस्था को बढ़ाने में तो सहायक होगा ही और इससे क्षेत्रीय सौहार्द भी बढ़ेगा.

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