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रोज़गार देने में चीन से आगे भारत | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
चीन के आर्थिक विकास की तुलना में भारत के पिछड़ जाने पर चिंता जताने वालों के लिए राहत की एक ख़बर है कि रोज़गार पैदा करने में भारत चीन, रुस और ब्राज़ील से आगे है. हाल ही में जारी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में वर्ष 2000-2005 के बीच प्रतिवर्ष 1.13 करोड़ रोज़गार के अवसर पैदा हुए. हालांकि इस रिपोर्ट में इस बात पर चिंता जताई गई है कि दुनिया के चार उभरते हुए देश ब्राज़ील, रूस, भारत और चीन (ब्रिक) में जिस तरह से रोज़गार के अवसर पैदा हो रहे हैं, उससे असंतुलित आर्थिक विकास का भी ख़तरा है. यह रिपोर्ट ऑर्गेनाइजेशन फॉर इकॉनॉमिक को-ऑपरेशन एंड डवलपमेंट (ओईसीडी) ने तैयार की है. ओईसीडी पेरिस स्थित एक संस्था है. अमरीका, ब्रिटेन, फ़्रांस, जर्मनी और जापान जैसे दुनिया के तीस विकसित देश इसके सदस्य हैं. अपनी रिपोर्ट में ओईसीडी ने माना है कि रोज़गार देने के मामले में ओईसीडी देशों की तुलना में ब्रिक देशों ने पाँच गुना अधिक लोगों को रोज़गार उपलब्ध करवाया. वर्ष 2000 से 2005 के बीच भारत, ब्राज़ील, रूस और चीन ने 2.2 करोड़ लोगों को रोज़गार उपलब्ध करवाए हैं. एक तथ्य यह भी है कि इन चार ब्रिक देशों में दुनिया की 42 फ़ीसदी आबादी बसती है और यहाँ दुनिया के 45 फ़ीसदी कामगार रहते हैं. लेकिन इसके वितरीत ओईसीडी के 30 देशों में दुनिया के सिर्फ़ 19 प्रतिशत कामगार बसते हैं. रोज़गार एम्प्लायमेंट आउटलुक-2007 नाम की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2000 से 2005 के बीच भारत ने प्रतिवर्ष 1.13 करोड़ रोज़गार के अवसर पैदा किए.
यह आँकड़ा चीन से 60 प्रतिशत अधिक है जहाँ इसी अवधि में प्रतिवर्ष सिर्फ़ 70 लाख लोगों को ही रोज़गार मिल सका. जबकि ब्राज़ील ने 27 लाख और रूस ने सात लाख लोगों को हर साल रोज़गार दिया. इस तरह से देखा जाए तो इन पाँच सालों में ब्रिक देशों का आधा रोज़गार तो भारत ने ही पैदा किया. भारत के एक अच्छी ख़बर यह भी है कि वर्ष 2005 में यहाँ बेरोज़गारी की दर छह प्रतिशत रही. जबकि इसी साल चीन में बेरोज़गारी की दर 8.3 प्रतिशत, ब्राज़ील में 9.3 प्रतिशत और रूस में 7.9 प्रतिशत रही. सर्वेक्षण में कहा गया है कि ब्रिक देशों में बेरोज़गारों की सबसे कम संख्या भारत में ही रही. चिंता लेकिन ऐसा नहीं है कि सब कुछ अच्छा ही अच्छा है. भारत में जो लोग रोज़गार पा रहे हैं उनमें से 85 प्रतिशत रोज़गार अनौपचारिक रोज़गार है. इस रोज़गार को भारत में असंगठित क्षेत्र का रोज़गार माना जाता है और इसमें स्वरोज़गार भी शामिल हो सकता है. ब्राज़ील में रोजग़ार पाने वाले आधे लोग इसी अनौपचारिक रोज़गार पाने वालों में से थे. रिपोर्ट में चीन और भारत में रोज़गार पाने वालों के बीच तनख़्वाह की असमानता को लेकर भी चिंता जताई गई है. ओईसीडी के अर्थशास्त्री पस्कल मरियाना ने बीबीसी से हुई बातचीत में कहा, "भारत के शहरी क्षेत्रों में तो रोज़गार की स्थिति सुधरी है लेकिन ग्रामीण इलाक़ों में जहाँ कृषि ही रोज़गार का साधन है, अभी भी स्थिति अच्छी नहीं है." इसके अलावा एक बड़ी समस्या ब्रिक देशों में बूढ़े होते लोगों की है. रिपोर्ट में कहा गया है कि अगले 15 सालों में बूढ़े होते हुए लोगों के कारण कामगारों की संख्या में कमी आएगी. ओईसीडी के रोज़गार डिविज़न के रेमंड टोरी कहते हैं, "चीन का उदाहरण लें तो वर्ष 2030 तक 25 प्रतिशत लोग सेवानिवृत्त हो रहे होंगे. यानी दुनिया की एक चौथाई आबादी काम से हट जाएगी." इसके अलावा कहा गया है कि इन चारों देशों में जिस तरह की शिक्षा दी जा रही है उसकी गुणवत्ता के चलते भी आर्थिक विकास के टिकाऊ होने पर शक होता है. रेमंड टोरी कहते हैं, "कामगारों की ज़रूरत को देखते हुए शिक्षा प्रणाली को बदलना होगा." चेतावनी दी गई है कि भूमंडलीकरण भी एक बड़ी चुनौती साबित होने वाली है और इन देशों को ज़्यादा व्यापक नीतियाँ तैयार करनी होंगी. 'भारत भ्रमित न हो' इस रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अर्थशास्त्री भरत झुनझुनवाला कहते हैं कि ग़ौर से देखा जाए तो भारत में रोज़गार के अवसर पैदा नहीं हुए हैं यह तो हमारी बढ़ती जनसंख्या के भी आँकड़े हैं.
उनका कहना है कि भारत में काम करने की उम्र में पहुँचने के बाद लोग कुछ न कुछ करने लगता है. कोई जूस बेचने लगता है तो कोई रिक्शा चलाने लगता है और कोई कागज़ के लिफ़ाफ़े बनाने लगता है. तो मजबूरी में किए जा रहे काम को रोज़गार पाना नहीं कहा जा सकता. इसे ही रिपोर्ट में अनौपचारिक क्षेत्र का रोज़गार कहा गया है. झुनझुनवाला कहते हैं कि चीन में अनौपचारिक क्षेत्र में रोज़गार की प्रथा नहीं है जबकि भारत में यह एक बड़ा क्षेत्र है. इसलिए भारत में चीन की तुलना में बेरोज़गार भी कम दिखते हैं. उनका कहना है कि इस रिपोर्ट से भारत को ख़ुश होने की बिलकुल भी ज़रुरत नहीं है और इसे उपलब्धि की तरह भी नहीं देखा जाना चाहिए. वे कहते हैं कि इस रिपोर्ट से भ्रम में पड़ने की ज़रुरत नहीं है और देखने की ज़रुरत है कि तनख़्वाह बढ़ाने वाला और औपचारिक रोज़गार कैसे मिल सकता है. | इससे जुड़ी ख़बरें 'बजट में सामाजिक क्षेत्र की उपेक्षा'28 फ़रवरी, 2007 | कारोबार खेती के बढ़ते संकट से एसईजेड पर उठे सवाल17 दिसंबर, 2006 | कारोबार 'एसईजेड से 15 लाख लोगों को रोज़गार'17 दिसंबर, 2006 | कारोबार ऊँची विकास दर मगर बेरोज़गारी बढ़ी27 फ़रवरी, 2006 | भारत और पड़ोस 'ग्रामीण भारत में ईसाई बेरोज़गार अधिक'30 मार्च, 2007 | भारत और पड़ोस रोज़गार की गारंटी, भुगतान की नहीं!01 फ़रवरी, 2007 | भारत और पड़ोस उत्तर प्रदेश में बेरोज़गारी भत्ता बँटा16 जून, 2006 | भारत और पड़ोस 200 ज़िलों में रोज़गार गारंटी योजना01 फ़रवरी, 2006 | भारत और पड़ोस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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