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बुधवार, 28 फ़रवरी, 2007 को 15:36 GMT तक के समाचार
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'बजट में सामाजिक क्षेत्र की उपेक्षा'

महिलाएँ
बजट में सामाजिक क्षेत्रों पर और ध्यान दिया जाना चाहिए था
बड़ी-बड़ी घोषणाओं के बावजूद शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र की उपेक्षा जारी है. यूपीए सरकार के चौथे बजट ने एक बार फिर सामाजिक क्षेत्र को निराश किया है.

सामाजिक क्षेत्र ख़ासकर शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार को इस बजट से बड़े प्रावधानों की बहुत उम्मीद थी.

यह उम्मीद इसलिए थी कि अर्थव्यवस्था की विकास दर 9 फ़ीसदी से ऊपर पहुँच गई है लेकिन इस तेज विकास दर का लाभ आम आदमी तक नहीं पहुँच पा रहा है.

इस तीव्र विकास का लाभ आम आदमी तक पहुँचे इसके लिए सामाजिक क्षेत्र पर खर्च बढ़ाने की मांग लगातार तेज़ होती जा रही है.

लेकिन वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने अगले वित्तीय वर्ष के बजट में सामाजिक क्षेत्र के लिए कोई बड़ी और महत्त्वाकांक्षी योजना और प्रावधानों की घोषणा करने के बजाए वित्तीय और राजस्व घाटे को काबू में रखने को प्राथमिकता दी है.

हालाँकि उन्होंने केंद्रीय आयोजना के तहत सामाजिक सेवाओं के बजट में करीब 27 फ़ीसदी की बढ़ोत्तरी करते हुए 80 हजार 315करोड़ रुपए का प्रावधान किया है.

लेकिन यह रकम पिछले वर्ष की तुलना में सिर्फ़ 17 हज़ार करोड़ रुपए अधिक है.

यह दरियादिली भी तब दिखाई है जब उन्होंने केंद्रीय करों पर लगने वाले शिक्षा उपकर को दो फीसदी से बढ़ाकर तीन फीसदी करने की घोषणा की है. जाहिर है कि सामाजिक क्षेत्र के लिए प्रावधान ऊँट के मुँह में जीरे के बराबर है.

शिक्षा क्षेत्रः वादे से दूर

वित्त मंत्री ने बजट में शिक्षा के लिए कुल 32 हज़ार 251 करोड़ रुपए का प्रावधान किया है जिसमें से 28 हज़ार 671 करोड़ रुपए आयोजना के मद में और 3680 करोड़ रुपए गैर योजना मद में खर्च किए जाएंगे.

बच्चे
शिक्षा क्षेत्र देश के विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है

चिदंबरम का दावा है कि शिक्षा के बजट में 34.2 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी की गई है.

यह दावा इसलिए भ्रामक है क्योंकि इसमें सर्वशिक्षा अभियान के लिए 10 हज़ार 761 करोड़ रुपए का प्रावधान करते हुए यह मान लिया गया है कि राज्य सरकारें भी इतनी रक़म का इंतज़ाम कर लेंगी.

लेकिन यह एक कोरी कल्पना के अलावा और कुछ नहीं है. सच पूछिए तो शिक्षा क्षेत्र की मौज़ूदा ज़रूरतों और चुनौतियों को देखते हुए यह बढ़ोत्तरी उम्मीद से बहुत कम है

स्वास्थ्यः उपेक्षा जारी है

बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र की उपेक्षा जारी है. हालाँकि वित्त मंत्री का दावा है कि स्वास्थ्य के मद में बजटीय प्रावधानों में 22 फ़ीसदी की बढ़ोत्तरी की गई है. लेकिन यह उम्मीदों से काफ़ी कम है.

बजट में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के लिए कुल 15 हज़ार 855 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है जिसमें से 14 हज़ार 363 करोड़ रुपए आयोजना के मद में खर्च होंगे.

लेकिन यह रक़म जीडीपी के 0.4 फीसदी से अधिक नहीं है जबकि यूपीए सरकार ने स्वास्थ्य क्षेत्र पर जीडीपी का तीन प्रतिशत खर्च करने का वादा किया है.

ताजा आर्थिक सर्वेक्षण ते मुताबिक केन्द्र और राज्य सरकारें अभी मिलकर स्वास्थ्य पर जीडीपी का मात्र 1.39 फ़ीसदी खर्च कर रही है.

यह हाल तब है जब यूएनडीपी के मानव विकास रिपोर्ट में स्वास्थ्य के हर सूचकांक पर भारत का प्रदर्शन दुनिया के अन्य देशों के मुक़ाबले बहुत बदतर है.

रोज़गारः हाथी के दाँत...

चिदंबरम ने बजट में यूपीए सरकार की एक और महत्त्वाकांक्षी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना को मौजूदा 200 जिलों से बढ़ाकर 330 जिलों में करने का ऐलान किया है.

लेकिन इसके लिए उन्होंने पिछले वर्ष के 11300 करोड़ रुपए के प्रावधान की तुलना में अगले साल के लिए सिर्फ 700 करोड़ बढ़ाकर 12 हज़ार करोड़ रुपए का आवंटन किया है.

यह समझ पाना बहुत मुश्किल है कि इस योजना को 200 जिलों के बजाए अब 330 ज़िलों तक फैलाने के बावजूद बजट में अपेक्षित प्रावधान क्यों नहीं किया गया है.

इस योजना के लिए किए गए प्रावधान से यह साफ़ है कि हाथी के दाँत खाने के और दिखाने के और हो गए हैं.

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