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चीन के ख़िलाफ़ नई 'सामरिक साझेदारी' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बंगाल की खाड़ी में चार देशों के वायुयानों, पनडुब्बियों और जलपोतों ने चार सितंबर से एक हफ़्ते का युद्धाभ्यास शुरू कर दिया है. इसका नाम 'मालाबार07-02' रखा गया है जो भारतीय युद्धपोतों के लिए अब तक का सबसे बड़ा संयुक्त अभ्यास है. अमरीका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया मिलकर यह युद्धाभ्यास कर रहे हैं. उनके बीच सामरिक साझेदारी को लेकर समझौता हुआ है जिसे 'क्वाड्रीलेटरल इनिश्येटिव' नाम दिया गया है. सामरिक स्तर पर पहली बार ये चारों देश एक साथ आए हैं. इस अभ्यास में सिंगापुर ने भी अपनी छोटी-सी उपस्थिति दर्ज कराई है. बहुत से विश्लेषक इसे चीन की बढ़ती शक्ति को 'रोकने के लिए' प्रजातांत्रिक गठबंधन के दाँव के रूप में देख रहे हैं. हालांकि युद्धाभ्यास में हिस्सा ले रहे देशों ने इस बात का खंडन किया है लेकिन चार देशों की इस सामरिक साझेदारी ने चीन की चिंताएँ बढ़ा दी हैं. चीन की चिंता जब मई के महीने में मनीला में भारत, अमरीका, जापान और ऑस्ट्रेलिया ने इस साझेदारी की पहल की थी तब इससे चिंतित चीन ने चारों देशों की सरकारों को अपना औपचारिक विरोध दर्ज कराया था.
'क्वाड्रीलेटरल इनिश्येटिव' जिसे 'क्वॉड' भी कहा जा रहा है, उसके सदस्यों ने चीन को भरोसा दिलाया था कि यह 'सामरिक साझेदारी' सिर्फ़ क्षेत्रीय सुरक्षा को बनाए रखने के लिए है, न कि किसी शक्तिशाली देश को निशाना बनाने के लिए. इसके एक महीने के बाद जर्मनी में हुए दुनिया के शक्तिशाली देशों के संगठन 'जी-आठ' के सम्मेलन में चीन के राष्ट्रपति हू जिंताओ ने भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से इसके लिए स्पष्टीकरण माँगा था. हालांकि इसके जवाब में भारतीय प्रधानमंत्री ने चीन के साथ शांति और दोस्ती की बात दोहराई लेकिन चीनी टीकाकारों का कहना था कि चीन संतुष्ट नहीं हुआ था. दिल्ली में चर्चा इस युद्धाभ्यास से पहले दिल्ली में गहन चर्चा हुई थी. पिछली जुलाई में ऑस्ट्रेलिया के रक्षा मंत्री ब्रेंडन नेल्सन ने इस रक्षा सहयोग का नीतिगत ढाँचा तैयार किया था. इसके एक महीने बाद ऑस्ट्रेलियाई नौसेना के प्रमुख एडमिरल रसेल शाल्डर्स सामरिक सहयोग और युद्धाभ्यास की रणनीति के बारे में बात करने भारत आए थे. फिर कुछ ही दिनों के बाद जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे दिल्ली पहुँचे थे. उन्होंने प्रस्ताव रखा था कि अगर भारत हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के बीच फैले क्षेत्र 'एशियन आर्क आफ फ्रीडम' में 'लोकतांत्रिक चारदीवारी' बनाने में मुख्य भूमिका निभाने के लिए तैयार हो जाए तो जापान भारत को पर्याप्त आर्थिक और वाणिज्यिक मदद देगा. इसे 'अलोकतांत्रिक' शक्तियों के ख़िलाफ़ उठाया गया कदम माना जा रहा है. लेकिन 'क्वॉड' के सदस्य देशों का कहना है कि चीन को डरने की कोई ज़रूरत नहीं है.
वैसे जापान, अमरीका और भारत के युद्धपोतों ने अप्रैल में दक्षिणी चीन सागर में ऐसा ही युद्धाभ्यास किया था. जवाब चारों देशों के रक्षा विभाग से जारी कागजों में चीन को संभावित ख़तरा बताया गया है और 'क्वॉड' का गठन करके गठबंधन बनाने की कोशिश की गई है जिसे चीन अनदेखा नहीं कर सकता. अगस्त में चीन के 1600 सैनिकों ने रूस के यूरल पर्वतमाला पर रूस के सैनिकों के साथ सैन्याभ्यास किया. इस अभ्यास को 'पीस मिशन2007' नाम दिया गया था. रूसी राष्ट्रपति प्यूतिन ने शंघाई सहयोग संगठन देशों की समापन बैठक पर चीनी राष्ट्रपति हू जिंताओं और संगठन के अन्य चार सदस्य देशों को दावत दी थी. राष्ट्रपति पूतिन ने उस समय लंबी दूरी के बमवर्षक विमानों को फिर से नैटो वायुक्षेत्र की तरफ़ तैनात करने की घोषणा की थी. सोवियत संघ के पतन के बाद से ऐसा नहीं किया गया था. अभी शीतयुद्ध की वापसी तो नहीं हो रही है लेकिन अमरीका, रूस और चीन के बीच उभरते व्यापार और सुरक्षा तनाव से एशिया में एक नया सामरिक गठबंधन ज़रूर देखने को मिल सकता है. | इससे जुड़ी ख़बरें भारत-अमरीका संयुक्त अभ्यास का विरोध07 नवंबर, 2005 | भारत और पड़ोस 'युद्धाभ्यास तय कार्यक्रम के अनुसार'04 नवंबर, 2005 | भारत और पड़ोस अमरीकी युद्धपोत भारतीय नौसेना में24 जून, 2007 | भारत और पड़ोस विरोध के बीच भारत का नौसैनिक अभ्यास 03 सितंबर, 2007 | भारत और पड़ोस भारत-रूस में व्यापार की अपार संभावनाएँ25 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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