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मूर्ति बनाकर पूजना पड़ा 'गुरुजी' को | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
देश के बड़े शहरों में शिक्षक दिवस पर जब चुनिंदा विषयों को कुछ शिक्षकों द्वारा दिलचस्प बनाने का प्रयास हो रहा था, एक ठेठ आदिवासी गाँव में हजारों साल पुरानी एक कहानी फिर दोहराई जा रही थी-कहानी एकलव्य की. मध्यप्रदेश के झाबुआ ज़िले के गाँव माता फलिया में विद्यार्थियों ने मिट्टी के गुरुजी बनाकर उसकी पूजा-अर्चना की और उनसे शिक्षा का आशीर्वाद लिया. कारण यह कि उनके गाँव में न तो कोई स्कूल है और न कोई गुरुजी. गाँव के बाहर टेसू के पेड़ तले बिठाए गए 'गुरुजी' के सामने खड़े होकर बच्चों ने स्थानीय भाषा में प्रार्थना की-“बिना स्कूल वाली इस जगह में आप ही हमारे ज्ञानदाता हैं, इसलिए हम आपसे आशीर्वाद मांगते हैं कि गुरु के अभाव में हम जो भी टूटा-फूटा पढ़ते हैं वह हमें फल जाए." स्थानीय नागरिक पेमा भाभर ने कहा कि माता फलिया और पास के दो गांवों के लोग प्रशासन से पिछले छह सालों से प्राइमरी स्कूल की मांग कर हैं लेकिन कोई सुनवाई नहीं होती. शिक्षकों की कमी इस गाँव से सबसे नज़दीक मौजूद स्कूल पहुँचने के लिए बच्चों को कई नदी-नाले पार करने पड़ते हैं जिसके कारण यहाँ के तक़रीबन ढाई सौ बच्चे शिक्षा से वंचित हैं. गाँव के क़रीब 25 बच्चे हाल तक ऐसे ही एक प्राइमरी स्कूल जाते थे लेकिन वहां स्कूल में पहले से ही मौजूद बच्चों के लिए बैठने को जगह नहीं थी. साथ ही एक से पाँचवीं कक्षा तक के इस स्कूल में सिर्फ दो ही शिक्षक हैं जिसमें एक अक्सर स्थानीय प्रशासन द्वारा दूसरे ग़ैर-शैक्षणिक कामों में लगा दिए जाते हैं. ज़ाहिर है इस स्थिति में बच्चे कुछ सीख नहीं पाते थे और आख़िर गाँववालों ने उन्हें स्कूल भेजना बंद कर दिया. ग्राम सरपंच हुरजी भागोरा दुखी होकर कहते हैं कि गाँव के लोग अपने बच्चों को पढ़ाना- लिखाना चाहते हैं लेकिन लगता है सरकार का ध्यान इस ओर बिलकुल नहीं है. आदिवासियों के हकों के लिए लड़ रही संस्था 'संपर्क' के नीलेश देसाई के अनुसार सरकार द्वारा चलाए जा रहे सर्वशिक्षा अभियान के तहत प्रत्येक 35 से 40 बच्चों से समूह के लिए एक शिक्षक बहाल किए जाने का नियम है लेकिन झाबुआ में औसतन 100 से 150 बच्चों के लिए एक ही शिक्षक मौजूद है. पहलावाद ब्लाक में ही (माता फ़लिया इसी प्रखंड का हिस्सा है) प्रशासन के ख़ुद के आकड़ों के अनुसार सिर्फ़ प्राथमिक स्कूलों में 234 शिक्षकों की कमी है. नीलेश देसाई कहते हैं, "हज़ारों साल पहले राजपुत्रों को विद्या देने वाले द्रोणाचार्य ने भी एकलव्य को शिष्य बनाने से इनकार कर दिया था. आज हज़ारों साल बाद आज़ाद भारत में भी आदिवासी विद्यार्थियों की स्थिति वहीं है जो एकलव्य की थी." |
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