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रविवार, 12 दिसंबर, 2004 को 02:20 GMT तक के समाचार
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कई ज़िंदगियाँ बदल दी हैं एक शिक्षक ने

पंचानन बाबू
पंचानन बाबू के योगदान को सराहना भी मिली है पुरस्कार के रूप में
एक बहुत पुरानी कहावत है कि ‘अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता’. लेकिन पश्चिम बंगाल के हावड़ा ज़िले में डफ़रपुर मानसतला इलाक़े में रहने वाले एक सेवानिवृत्त स्कूली शिक्षक ने अपनी लगन से इस कहावत को ग़लत साबित कर दिया है.

पंचानन पारुई ने छात्रों को सिर्फ शिक्षा ही नहीं दी, बल्कि उनके कल्याण के लिए अपनी जीवन भर की कमाई दान कर दी है.

अब भी हर महीने पेंशन के तौर पर मिलने वाले साढ़े पांच हज़ार रुपए में से सिर्फ एक हज़ार अपने पास रख कर बाक़ी रक़म वे विभिन्न स्कूलों को दान कर देते हैं ताकि ग़रीब बच्चे पढ़ सकें.

वे अब तक हावड़ा, हुगली, बर्दवान और बांकुड़ा ज़िले में छह सौ से ज़्यादा स्कूलों को 13 लाख रुपए दान कर चुके हैं. उनके दरवाज़े से कोई छात्र निराश नहीं लौटता.

आख़िर उन्होंने ग़रीब छात्रों की मदद को अपना मिशन क्यों बनाया? काफ़ी ग़रीब परिवार में जन्मे पंचानन ने अपनी दो बहनों के साथ भूखे पेट रह कर बचपन गुजारा.

वे बताते हैं, " पिता की असमय मौत के बाद परिवार का ख़र्च चलाने के लिए मैंने कभी सब्जी बेची तो कभी किसी मिल में नौकरी की."

 पांच भाई-बहनों के परिवार में मेरे पिता के लिए पढ़ाई का ख़र्च उठाना संभव नहीं था. पिता जूट मिल में काम करते थे. बाद में वह भी बंद हो गई. लेकिन पंचानन बाबू की सहायता से मैंने बीएससी पास की और अब बैंक में चुना गया हूँ
सुमन मंडल

उन्होंने काम करते हुए ही प्राइवेट छात्र के तौर पर एम (कॉम) पास किया. वर्ष 1968 में बेगड़ी हाईस्कूल में नौकरी मिलने के बाद उन्होंने 1974 में ग़रीब छात्रों की आर्थिक सहायता के लिए अपने माता-पिता की याद में अंगुरबाला व नागेंद्र स्मृति छात्रवृत्ति शुरू की.

अपने इस मिशन के लिए उन्होंने शादी भी नहीं की. रिटायर होने के बाद भविष्यनिधि व ग्रेच्युटी के पैसों को भी उन्होंने इसी काम में लगा दिया.

उनके छोटे से कमरे में सामान के नाम पर एक चौकी, दो-चार कपड़ों व कुछ ज़रूरी बर्तनों के सिवा कुछ भी नहीं है.

पंचानन कहते हैं, "मैं नहीं चाहता कि कोई मेधावी छात्र पैसों के अभाव में पढ़ाई से वंचित रह जाएँ या फिर उसे मेरी तरह संघर्ष करना पड़े."

उनकी आर्थिक सहायता से कई गरीब बच्चे पढ़-लिख कर आज अच्छी जगहों पर नौकरी कर रहे हैं.

सहायता

ऐसे ही एक छात्र हैं सुमन मंडल, जो आज एक बैंक में नौकरी करते हैं. वे कहते हैं, " पांच भाई-बहनों के परिवार में मेरे पिता के लिए पढ़ाई का ख़र्च उठाना संभव नहीं था. पिता जूट मिल में काम करते थे. बाद में वह भी बंद हो गई."

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घर में बिजली नहीं है इसलिए लालटेन का ही आसरा है

लेकिन पंचानन बाबू की सहायता से ही उन्होंने बीएससी पास की और बैंक की नौकरी के लिए चुने गए.

हावड़ा के एक अन्य छात्र दिलीप गिरी के पिता बलाई गिरी भी बताते हैं कि पंचानन बाबू ने दिलीप को पढ़ा कर उनकी ज़िंदगी बदल दी. दिलीप अब एक कंप्यूटर फ़र्म में काम करते हैं.

हावड़ा में बागनान स्थित श्रीकृष्ण गर्ल्स हाईस्कूल की प्रधानाचार्य श्रीमती नंदिता कुंडू बताती हैं कि 1985 में पंचानन बाबू ने स्कूल को एकमुश्त कुछ रक़म दी थी. अब उसी के ब्याज के पैसों से हर साल मेधावी छात्राओं को पुरस्कृत किया जाता है.

शारदाचरण स्कूल के प्रधानाचार्य अनिल कुमार चक्रवर्ती बताते हैं कि पंचानन बाबू की सहायता से हर साल प्रथम आने वाले छात्रों को छात्रवृत्ति मुहैया कराई जाती है.

उनके इस मिशन को सरकार की ओर से कोई मान्यता नहीं मिलने के बावजूद 72 वर्ष के पंचानन पारुई का उत्साह कम नहीं हुआ है. वे कहते हैं, "‘जब तक जीवित रहूंगा, यह काम जारी रखूंगा."

यही नहीं उन्होंने मरने के बाद अपनी आंखे और शरीर दान करने का भी फ़ैसला किया है.

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