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शिक्षक बने रसोइया, तो पढ़ाई कैसे... | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत में शिक्षकों पर गाहे-बगाहे ये आरोप लगते रहते हैं कि वे बच्चों को ठीक से नहीं पढ़ाते हैं लेकिन पंजाब में कुछ अलग ही हो रहा है. यहाँ के प्राथमिक स्कूलों के शिक्षकों से बच्चों के लिए खाना पकवाया जा रहा है. भला शिक्षकों को कैसे ये गवारा हो कि कोई उनसे खाना बनवाए लेकिन दाल नहीं गली तो उन्हें अदालत का दरवाज़ा खटखटाना पड़ा है. अब शिक्षक ये कह रहे हैं कि सरकार खाना बनावाने का इंतज़ाम करे और उन्हें पढ़ाने का काम करने दे. दरअसल सरकारी योजना के तहत सरकारी विद्यालयों में छात्रों को मुफ़्त खाना दिया जाता है. सरकार अपनी योजना तो चलाना चाहती है लेकिन इसके लिए पर्याप्त व्यवस्था नहीं कर रही. अव्यवस्था का आलम ये है कि शिक्षक अपने बहुमूल्य समय में से चार घंटे निकालकर न सिर्फ़ खाना बनाते हैं बल्कि साफ़-सफ़ाई भी करते हैं. व्यवस्था या अव्यवस्था? अब शिक्षकों का ये कहना है कि अगर यह व्यवस्था इसी तरह चलती रही तो होनहार छात्रों की कल्पना भूल जाइए क्योंकि अगर वे पढ़ेंगे नहीं तो होनहार कैसे बनेंगे. राज्य के शिक्षक संघ ने पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में अपील की है और अनुरोध किया है कि अदालत सरकार को ये निर्देश दे कि बच्चों के लिए बना-बनाया खाना उपलब्ध कराया जाए. अदालत ने राज्य सरकार को नोटिस जारी करके 16 जनवरी तक जवाब देने को कहा है. पिछले साल मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने यह योजना शुरू की थी जिसका मक़सद था बच्चों में कुपोषण को रोकना और स्कूल के प्रति उन्हें आकर्षित करना. लेकिन खाना बनवाने को लेकर शिक्षक काफ़ी नाराज़ हैं. शिक्षकों के वकील अतुल लखनपाल ने कहा कि किसी भी स्कूल के पास खाना बनाने की सुविधा नहीं है. सरकार खाने का सामान इन स्कूलों को उपलब्ध करा देती है और खाना बनाने की ज़िम्मेदारी आ जाती है शिक्षकों पर. और तो और जाँच के दौरान अगर खाना अच्छा नहीं पाया जाता है तो शिक्षकों पर ही मुसीबत आती है. | इससे जुड़ी ख़बरें छात्रों ने बनाया रेडियो सॉफ़्टवेयर11 अगस्त, 2005 | भारत और पड़ोस इकलौती लड़की को मुफ़्त शिक्षा22 सितंबर, 2005 | भारत और पड़ोस कई ज़िंदगियाँ बदल दी हैं एक शिक्षक ने12 दिसंबर, 2004 | भारत और पड़ोस देश की अकेली महिला कुश्ती प्रशिक्षक17 नवंबर, 2005 | खेल पत्नी बिरह ने दिलाया पुरस्कार16 फ़रवरी, 2005 | मनोरंजन बच्चों का दाख़िला बच्चों का खेल नहीं15 अक्तूबर, 2004 | भारत और पड़ोस मेरे पहले शिक्षकः शम्सुल इस्लाम09 मार्च, 2004 | मनोरंजन हँसते हँसते पढ़ना बेहतर24 मार्च, 2002 | पहला पन्ना इंटरनेट लिंक्स बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है. | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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