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शुक्रवार, 01 सितंबर, 2006 को 22:51 GMT तक के समाचार
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मदरसों की कमान महिलाओं के हाथ

मदरसा
मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में मुसलमान लड़के और लड़कियों के लिए चलने वाले मदरसों में ज़्यादातर की कमान महिलाओं के हाथों में है.

मध्यप्रदेश मदरसा बोर्ड के रिकॉर्ड के मुताबिक लगभग 62 प्रतिशत मदरसे महिलाओं की देखरेख में चल रहे हैं.

इसे कुछ लोग भोपाल में चार पीढ़ियों तक रहे बेगमों के शासनकाल से जोड़ कर देखते है तो कुछ लोगों का मानना है कि समाज में आ रहे बदलाव के कारण मुस्लिम महिलाएं भी मज़हब के दायरे में अपने आपको स्थापित करने की कोशिश कर रही है.

शहर में इस वक्त लगभग ग्यारह सौ मदरसे चल रहे है. इन मदरसों में से ज़्यादातर का पंजीकरण मदरसा बोर्ड में है.

मगर ऐसे मदरसों की तादाद भी बड़ी है, जिन्होनें पंजीकरण नही कराया है.

शहर के आरिफ़ नगर इलाके में बुशरा दारुल उलूम मदरसा चलाने वाली राणा ख़ान का कहना है कि वो दीनी तालीम देने के ही मक़सद से इस तरफ आईं.

 मज़हबी तालीम के साथ साथ दुनियावी तालीम भी एक वजह है, जिसके कारण लोग इधर आ रहे है. औरत के लिए मज़हबी दायरे में रहते हुए इस काम को अंजाम देना आसन है
बेगम सुरैया, मदरसा गुलिस्ताने उर्दू

उनका कहना है कि पढ़ी लिखी औरतों के लिए ये एक अच्छा रोज़गार का साधन है. राणा ख़ान इस मदरसे को 1999 से चला रही हैं.

उनका कहना है कि लोग यहाँ पर अपनी बच्चियों को भेजने में किसी भी तरह से दिक्कत महसूस नहीं करते हैं, साथ ही अब मदरसों में उन्हें आधुनिक शिक्षा भी मिल रही है.

एक और मदरसा गुलिस्ताने उर्दू चलाने वाली बेगम सुरैया कहती है, "मज़हबी तालीम के साथ साथ दुनियावी तालीम भी एक वजह है, जिसके कारण लोग इधर आ रहे है. औरत के लिए मज़हबी दायरे में रहते हुए इस काम को अंजाम देना आसन है."

मदरसा बोर्ड के अध्यक्ष एम उद्दीन का कहना है कि शासन की नीतियों की वजह से भी महिलाएँ इसकी तरफ आ रही है.

उनका कहना है, "सर्व शिक्षा जैसे अभियानों के साथ जुड़ने के बाद महिलाओं को इससे काफ़ी लाभ मिल रहा है."

बढ़ता दख़ल

मदरसों में महिलाओं के बढ़ते दख़ल को मुसलमान मर्द ग़लत नही मानते है. उनका कहना है कि शरीयत में रह कर अगर औरत मदरसा चलाती है तो कुछ भी ग़लत नही है.

 भोपाल में चार पीढ़ियों तक बेगमों की हुकूमत रही है. इन बेगमों ने हमेशा ही लड़कियों की पढ़ाई पर ख़ास तवज्जो दी है. तब से ही भोपाल में आमतौर पर मुसलमान लड़कियों में पढ़ाई का चलन है
आफ़ाक अहमद, शिक्षाविद्

नायब शहर काज़ी अमीरउल्ला कहते है कि इस्लाम में मज़हबी तालीम देने की रोक टोक किसी को भी नही है. औरत अगर ये काम कर रही है तो वो दीन की ख़िदमत ही कर रही है.

शिक्षाविद् आफ़ाक अहमद का कहना है, " भोपाल में चार पीढ़ियों तक बेगमों की हुकूमत रही है. इन बेगमों ने हमेशा ही लड़कियों की पढ़ाई पर ख़ास तवज्जो दी है. तब से ही भोपाल में आमतौर पर मुसलमान लड़कियों में पढ़ाई का चलन है. शायद यही वजह है कि आज हम मदरसों के संचालन में इन्हें आगे पा रहे है."

मगर कुछ ऐसे भी है जिन्हें औरतों का मदरसों की देखरेख करना नागवार गुज़र रहा है.

मौलाना शम्स कहते है कि ज़्यादातर औरतें सरकार की विभिन्न योजनाओं का लाभ लेने के लिए मदरसा चला रही हैं.

उनका ये भी कहना है कि कई मदरसे अलग अलग नामों से एक ही महिलाओं की सरपरस्ती में चल रहे हैं.

महिलाओं के इस मैदान में आने से मदरसा जाने वाली लड़कियों की संख्या में इज़ाफा हुआ है. इन्हें न सिर्फ दीनी तालीम बल्कि आधुनिक शिक्षा भी मिल रही है.

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