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कश्मीर में मदरसों में आधुनिकता
अनेक देशों में इस्लामी स्कूलों यानी मदरसों को कट्टरपंथ या चरमपंथ के बीज बोने वाले शिक्षा संस्थान कहा जाता है. ख़ासतौर से जम्मू कश्मीर में इन्हें चरमपंथी गतिविधियों को बढ़ावा देने तक की बातें कही गईं. लेकिन अब भारत प्रशासित कश्मीर में मदरसों के बारे में इस राय को बदलने के लिए व्यापक बदलाव किए जा रहे हैं. मदरसों का तालमेल आधुनिक शिक्षा से बिठाने की कोशिशों के तहत अब इनका पाठ्यक्रम बदला जा रहा या उसे व्यापक बनाया जा रहा है. ख़ास बात ये है कि वक़्फ़ बोर्ड के इस क़दम को मौलवियों ने भी मंज़ूरी दे दी है. पहले चरण में कश्मीर घाटी के 76 मदरसों का कायापलट किया जा रहा है और इससे क़रीब 7000 छात्र प्रभावित होंगे. इनमें कुछ मदरसे तो 16 सदीं से चल रहे हैं और कुछ आलोचकों का कहना है कि ये मदरसे इस्लामी चरमपंथी पैदा करते हैं. मदरसों में पढ़ने वाले ज़्यादातर छात्र मौलवी या इस्लाम का विद्वान बनना चाहते हैं लेकिन अब राय बन रही है कि इस्लामी शिक्षा के साथ-साथ आम शिक्षा का भी इंतज़ाम होना चाहिए. छवि का सवाल कश्मीर वक़्फ़ बोर्ड के उपाध्यक्ष मोहम्मद शफ़ी पंडित कहते हैं कि मदरसों की संचालन जिस तरह से होता है उससे उनके बारे में कुछ ख़राब राय बनती है. "इसी राय को सुधारने के लिए मदरसों के पाठ्यक्रम में बदलाव किए जा रहे हैं." पंडित का कहना है कि ऐसा करने के पीछे मक़सद इस्लामी पाठ्यक्रम को बाहर करना नहीं बल्कि आधुनिक शिक्षा के साथ उसका तालमेल बिठाना है.
"क़ुरआन और धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ पाठ्यक्रम में अंग्रेज़ी, विज्ञान, गणित और सामाजिक विषयों को भी शामिल किया जा रहा है." वक़्फ़ बोर्ड राजधानी श्रीनगर के पास ही एक मदरसा चलाता है जिसका नाम है - सुल्तान-उल-आरेफ़ीन. इस मदरसे को आदर्श माना जाता है और यहाँ के छात्रों में डॉक्टर, वैज्ञानिक और पायलट बनने के सपने जगाए जाते हैं. यहाँ पढ़ने वाला एक छात्र मुस्तफ़ा फर्राटेदार अंग्रेज़ी बोलता है, हालाँकि उसके माँ-बाप अनपढ़ हैं. मुस्तफ़ा का कहना था, "मैं बड़ा होकर डॉक्टर बनना चाहता हूँ ताकि बहुत सी ज़िंदगियाँ बचा सकूँ." मुस्तफ़ा के साथ पढ़ने वाले अन्य छात्रों के भी कुछ ऐसे ही सपने हैं. इनमें ज़्यादातर बच्चे निम्न और मध्यम वर्ग के परिवारों से हैं. अगर यह मदरसा नहीं होता तो इनमें से बहुत से बच्चे परंपरागत मदरसों में ही जाने के लिए मजबूर होते क्योंकि इनमें से बहुत से बच्चों के माँ-बाप ज़्यादा ख़र्च उठाने की हैसियत में नहीं हैं. स्कूल के प्रिंसिपल मोहम्मद आमिर लहरवाल कहते हैं कि उनके स्कूल में ज़्यादातर बच्चे ग़रीब परिवारों से ही आते हैं और वे यहाँ पढ़ने वाले अपने बच्चों के भविष्य के बारे में आश्वस्त हैं.
आलमगीर अली की छह साल की बच्ची भी इसी स्कूल में पढ़ती है. आलमगीर का कहना है, "हम यहाँ की शिक्षा के बारे में बहुत संतुष्ट हैं. यह विज्ञान का दौर है इसलिए यह सभी छात्रों के लिए बहुत ज़रूरी है. लेकिन साथ-साथ मज़हबी शिक्षा भी ज़रूरी है." श्रीनगर की मशहूर हज़रत बल दरगाह में स्थित मदरसे में एक इस्लामी विद्वान हैं प्रोफ़ेसर कामिली. उनका कहना है, "विज्ञान और इस्लाम में कोई टकराव नहीं है, उसी तरह से आधुनिक तकनीक और इस्लाम में भी कोई टकराव नहीं है." "इस्लाम हमसे इसे आगे बढ़ाने की उम्मीद करता है. मुसलमान विज्ञान से ख़ुश हैं." |
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