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पटरी पर लौटने तो लगी है मुंबई, लेकिन... | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मुंबई का विशाल चर्चगेट रेलवे स्टेशन. यहाँ से लोकल ट्रेनें शहर में काम करने वालों को लेकर सभी छोटे-बड़े स्टेशनों के लिए जाती हैं. आज से एक साल पहले 11 जुलाई के दिन इसी स्टेशन से यात्रियों के साथ-साथ सात और लोग सात अलग-अलग ट्रेनों पर सवार हुए. वो अपनी ट्रेनों पर अपने साथ लाए सामानों को रखकर उतर गए. कुछ ही समय बाद उन सातों ट्रेनों पर ज़बर्दस्त धमाके हुए. डिब्बों और पटरियों पर लाशों का ढेर लग गया. मुंबई की जीवन रेखा कही जाने वाली ट्रेन सेवाएँ ठप्प हो गईं. शहर में अफ़रा-तफ़री मच गई. पूरे शहर में यातायात रुक गया. चरमपंथियों ने अपना काम सफलतापूर्वक कर दिखाया. इस धमाकों में 187 लोग मारे गए और 700 से अधिक घायल हुए. हमले की क़ीमत घायल होने वालों में 21 साल के अमित सिंह भी हैं. वो अबतक होश में नहीं आए हैं और मुंबई के जसलोक अस्पताल में कोमा में पड़े हैं.
अमित के पिता दिनेश सिंह कहते हैं,"हमारा बेटा खड़ा हो जाए हमें बस यही चाहिए." अशोक सिंहल 'शिपिंग कार्पोरेशन ऑफ़ इंडिया' में कर्मचारी हैं. धमाके की आवाज़ आज भी उनके कानों में गूँजती रहती है. वो बताते हैं,"इस 11 जुलाई को एक साल हो जाएगा. मुझे आज भी रात को जब भी नींद पूरी नहीं आ रही होती है, उससे पहले, मुझे उसी धमाके की आवाज़, उतनी ही तेज़ी से सुनाई देती है. कभी-कभी ऐसा लगता है कि मेरा सर फट जाएगा." उस दिन मीडिया और सुरक्षा विशेषज्ञों ने इतनी ज़बर्दस्त तबाही और अफ़रा-तफ़री को देखकर कहा था, मुंबई फिर से ऐसा नहीं हो पाएगा. लेकिन आठ घंटों बाद ही जन-जीवन सामान्य हो गया. ट्रेनें उन्हीं पटरियों पर रेंगने लगीं जिन पर आठ घंटे पहले धमाके हुए थे. तब लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि मुंबई वालों की हिम्मत का कोई मुक़ाबला नहीं. बॉलीवुड के एक संगीत निर्देशक संजीव कोहली ने मुंबई के इस बुलंद हौसले को एक गाने में पिरोया और कई गायकों से गवाकर सबसे पहले बीबीसी को भेंट किया. इस गाने की एक लाइन मुझे आज भी याद है, "आतंक के आगे हमने सीखा नहीं घुटने टेकना....मुंबई के हैं बुलंद हौसले फिर दौड़ेगीं ट्रेनें तुम देखना." सलाम मुंबई पिछले 20 साल की रिपोर्टिंग के दौरान मैंने चरमपंथियों के हमलों का असर कश्मीर, असम, मणिपुर, पंजाब, हरयाणा और दिल्ली में देखा और इस पर रिपोर्टिंग की है. लेकिन 2003 के 'दोहरे बम धमाकों' और पिछले साल ट्रेनों में हुए बम धमाकों के बाद जितनी ज़ल्दी मुंबई संभला है उतनी ज़ल्दी शायद ही कोई शहर संभल सका है. हालांकि हौसलों के अलावा ये मुंबईवासियों की मजबूरी भी हो सकती है. अनन्था हर रोज़ इन्हीं ट्रेनों पर सफर करके दफ़्तर आती हैं. वो बताती हैं, "अगर फिर से धमाके हुए तो फिर से मुंबई उसी दिन सामान्य हो जाएगा. हमारे पास तो कोई दूसरा विकल्प भी नहीं है...ट्रेन में जाना ही है." चर्चगेट से विरार की ट्रेन में घुसने वाली एक महिला कहती हैं कि मुंबई अभी सुरक्षित नहीं है. वो बताती हैं, "कुछ भी तो नहीं बदला है. सुरक्षाकर्मी किसी की जांच भी नहीं करते. लोग थैलियाँ लिए चढ़ते हैं. किस थैले में बम है, किसी को पता नहीं चलेगा. विस्फोट फिर से हो सकता है." शायद इस महिला की बातों में दम हो. एक बानगी देखने हम चर्चगेट रेलवे स्टेशन गए. कितनी है तैयारी चर्चगेट स्टेशन के अंदर आने के लिए कई दरवाजे हैं लेकिन एक ही दरवाजे पर मुसाफ़िरों की जाँच हो रही है. एक और मशीन अंदर लग रही है. एक मुसाफ़िर की जांच की जाती है लेकिन 10 बिना जांच के ही प्लेफ़ॉर्म पर जा रहे हैं.
बान्द्रा स्टेशन में घुसते ही एक मशीन लगी है. कुछ पुलिस वाले भी बैठे हैं लेकिन वो केवल आपस में बातें ही किए जा रहे हैं. धमाकों के बाद मुंबई रेलवे पुलिस आयुक्त ने मुझसे कहा था कि हर दिन 50 लाख लोग इन ट्रेनों पर सफर करते हैं. सब को चेक करना असंभव है. धमाकों की जांच-पड़ताल की ज़िम्मेदारी सौंपी गई मुबंई के आतंकवाद निरोधक दस्ते(एटीएस) के मुखिया पीके रघुवंशी को. उनका पहला बयान था, "पाकिस्तानी संगठन लश्कर-ए-तोएबा का इसमें हाथ है." अब उनकी जांच ख़त्म हो गई है और इस महीने के अंत से मुक़दमा अदालत में चलना शुरू हो जाएगा. क्या अब भी वो पाकिस्तान को दोष देते हैं? दोष किसका..? रघुवंशी कहते हैं, "मैं तो एक अधिकारी हूँ. यह भारत सरकार के स्तर की बात है लेकिन जो साक्ष्य पाकिस्तान ने मांगे थे वो हमने यानी भारत सरकार ने पाकिस्तान को दे दिया था. उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं आया. हाँ, जो बात हमने शुरू में कही थी वो अभी भी सही है." अबतक एटीएस ने 13 लोगों के ख़िलाफ़ चार्जशीट दायर की है और 14 आरोपी फ़रार हैं. जिनमें नौ पाकिस्तानी शहरी हैं. इस बीच धमाकों की पहली सालगिरह के मौक़े पर पश्चिमी रेलवे ने मुसाफ़िरों का विश्वास बढ़ाने के लिए और चरमपंथियों को करारा जवाब देने के लिए एक दिलचस्प कार्यक्रम बनाया है. जिन सात डिब्बों में धमाके हुए थे उनमें से कुछ की मरम्मत रेलवे ने कर ली है. उनमें से दो को 11 जुलाई को ठीक शाम छह बजे फिर से शुरू किया जा रहा है. अशोक सिंघल जो जोगेश्वरी वाले धमाके में जिंदा बचे अकेले आदमी हैं, इस डिब्बे में बैठने के लिए बेताब हैं. अशोक कहते हैं, "मैं उस दिन का इंतजार कर रहा हूँ कि मैं उस डिब्बे की उसी सीट पर फिर से यात्रा करूँ". |
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