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मंगलवार, 10 जुलाई, 2007 को 13:45 GMT तक के समाचार
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'टटोलकर देखा कि हर अंग वहीं है या..'

अशोक सिंघल
अशोक उन ज़िंदा बचे लोगों में से हैं जो विस्फोट के वक्त उन्हीं डिब्बों में मौजूद थे
मुंबई की ट्रेनों में 11 जुलाई, 2006 को हुए बम धमाकों में जहाँ 187 लोगों ने अपनी जान गंवाई वहीं कइयों ने इन लाचार, मजबूर लोगों को तड़पड़ते-मरते देखा. सैकड़ों ज़िंदगियों की अंतिम सिसकियों के एक ऐसे ही गवाह बने अशोक सिंघल.

अशोक सिंघल पेशे से शिपिंग कार्पोरेशन ऑफ़ इंडिया में मैनेजर हैं और उस दिन मुंबई की जीवन रेखा कही जाने वाली लोकल ट्रेन पर सवार थे.

अशोक हर रोज़ की तरह 11 जुलाई, 2006 की शाम 5.15 पर चर्च गेट पहुँचे और 5.36 पर बोरीवली जाने वाली लोकल ट्रेन पकड़ी. वो आगे वाले फ़र्स्ट क्लास के डब्बे में बैठे.

लेकिन कुछ ही देर बाद अशोक का दिल दहल उठा क्योंकि इस रोज़मर्रा के सफ़र में एक बड़ा मोड़ आ गया था. जोगेश्वरी पहुँचते ही ट्रेन में ज़ोरदार बम धमाका हो गया था.

अशोक बताते हैं, "जब लोकल क़रीब 45 मिनट बाद जोगेश्वरी पहुँची तो एक ज़ोर का धमाका हुआ. ये क़रीब 6.20-6.25 की बात है. जैसे ही आँख खोली डिब्बे में कोई भी आदमी जिंदा नहीं दिखा. मैं बम से बहुत पास आठ फ़ीट की दूरी पर था. ट्रेन का आधा हिस्सा गायब हिस्सा था."

अशोक सिंहल को लगा कि उस पूरे डिब्बे में वही अकेले जिंदा बचे हैं. उन्होंने उंगली के इशारे से ट्रेन के पास इकट्ठा हुए लोगों को बुलाया. डब्बे का दृश्य बहुत भयानक था.

काँप गई रूह

उन्होंने बताया, "मृत शरीरों के टुकड़ों के बीच से मुझे खींचकर निकाला गया और एक स्ट्रेचर पर डालकर मुझे कूपर अस्पताल लाया गया."

बम धमाके के बाद अपने जिंदा बचे होने पर भी अशोक को शक होने लगा. उन्होंने अपने पूरे शरीर को टटोलकर देखा कि हर अंग वहीं है या...

वो बताते हैं, "जब बम फटा तो मैंने सबसे पहले सिर को 'फ़ील' किया तो लगा कि सिर ठीक है. फिर अपने पैरों को हाथ लगाया और 'फ़ील' किया कि मेरे पैर भी ठीक-ठाक हैं. तब जाकर मुझे लगा कि मैं जिंदा हूँ. मैं ऊपर से नीचे तक ख़ून से भीगा हुआ था और बम के रसायन और धातुओं के टुकड़े मेरी जेब में भर हुए थे."

 जब बम फटा तो मैंने सबसे पहले सिर को 'फ़ील' किया तो लगा कि सिर ठीक है. फिर अपने पैरों को हाथ लगाया और 'फ़ील' किया कि मेरे पैर भी ठीक-ठाक हैं. तब जाकर मुझे लगा कि मैं जिंदा हूँ. मैं ऊपर से नीचे तक ख़ून से भीगा हुआ था और बम के रसायन और धातुओं के टुकड़े मेरी जेब में भर हुए थे

अशोक के कपड़े पूरी तरह से फट चुके थे और उन्हें बुरी तरह से चोटें आईं थीं.

उन्होंने बताया, "पाँच या छह घंटे बाद मुझे पता चला कि मुझे कानों से सुनाई नहीं दे रहा है. मुझे दाहिनी तरफ बहुत-सी चोटें आईं थीं. डॉक्टरों ने बताया कि मेरी खोपड़ी से सैकड़ों धातुओं के टुकड़े निकले और मेरी पसली की हड्डियों में फ़्रैक्चर हो गया था."

अशोक सिंघल शिपिंग कार्पोरेशन के कर्मचारी हैं इसलिए उपचार का सारा पैसा कंपनी ने ही दिया. उनके उपचार को गंभीर चोट का दर्जा दिया गया. उन्हें भारत और महाराष्ट्र सरकार से कुछ महीनों बाद 50-50 हज़ार रुपए मिले.

इस 11 जुलाई को बम धमाकों के एक साल पूरे हो रहे हैं लेकिन आज भी अशोक सिंघल उन धमाकों की आवाज से बेचैन हो जाते हैं.

वो बताते हैं, "इस 11 जुलाई को एक साल हो जाएगा. मुझे आज भी रात को जब नींद नहीं आ रही होती तो उस धमाके की आवाज उतनी ही तेज़ी से सुनाई देती है. कभी-कभी ऐसा लगता है कि मेरा सिर फट जाएगा."

नहीं बदला रेलवे

अशोक को लगता है कि इतने भयानक बम धमाकों के बाद भी मुंबई की रेलवे सुरक्षा में कोई बदलाव नहीं आए हैं.

 इस 11 जुलाई को एक साल हो जाएगा. मुझे आज भी रात को जब नींद नहीं आ रही होती तो उस धमाके की आवाज उतनी ही तेज़ी से सुनाई देती है. कभी-कभी ऐसा लगता है कि मेरा सर फट जाएगा

उनके अनुसार,"आज भी उस तरह के धमाके आसानी से किए जा सकते हैं. सुरक्षा बिल्कुल भी अच्छी नहीं है. पुलिस वाले दिखते हैं मगर कोई जांच नहीं होती है. इस तरह कुछ नहीं होने वाला है."

अगर नींद में बेचैनी की बात छोड़ दी जाए तो अशोक सिंघल को अब डर नहीं लगता. उनकी एक बार फिर से उसी डिब्बे में बैठने की इच्छा है जिसमें वो बम धमाके के समय बैठे हुए थे.

वो कहते हैं,"रोज़ाना अख़बार में देख रहा हूँ कि जिन सात डिब्बों में बम धमाके हुए थे उनमें से पाँच को रिपेयर करके फिर से शुरू किया जा रहा है. और दो डब्बे 11 जुलाई से शुरू हो जाएंगे. जोगेश्वरी जाने वाली मेरी ट्रेन का डब्बा भी जल्द ही शुरू होगा. मैं उस दिन का इंतजार कर रहा हूँ जब मैं उस डब्बे में उसी सीट पर फिर से यात्रा कर पाउँगा."

अशोक सिंघल को पूरा यकीन है कि बम धमाकों के मामले की सुनवाई में ज़ल्द कुछ निकल कर आने वाला नहीं है.

उनके अनुसार,"मामला सुलझ सकता है लेकिन ज़ल्दी नहीं. यहाँ क़ानून का जो तरीका है उसमें कुछ भी ज़ल्दी होना मुश्किल है. जितने भी बड़े मामले हैं उनमें बहुत समय लगा है. कुछ न कुछ समस्या आ ही जाती है. मुंबई में 1993 में हुए बम विस्फोट भी बड़ा मामला था जिसमें सैकड़ों लोग पकड़े गए. उसमें भी 15 साल लगे. इस मामले को तो अभी एक ही साल हुआ है.

भारत की लचर क़ानून व्यवस्था से दुखी अशोक कोर्ट से बहुत आशा नहीं करते हुए कहते हैं,"ये इंडिया का सिस्टम है...यहाँ ऐसा ही होता है. आशावादी सोच का कोई फ़ायदा नहीं है."

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