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बिगड़ते हालात का ज़िम्मेदार कौन? | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
उन्मादी नारे, हिंसक भीड़ और सड़कों पर बहता लहू- राजस्थान के राजमार्गों ने चार दिन तक वो खूनी दृश्य देखे कि लोगों की रुह कांप गई. साढ़े तीन साल पहले राजस्थान के मतदाताओं ने मुख्यमंत्री के रूप में वसुंधरा राजे का राजतिलक किया तो उन्होंने उम्मीद की थी कि वे राज्य को एक परिवार की तरह चलाएँगी. लेकिन हालात कुछ और ही गवाही देते हैं. इस परिवार में कभी जाति के नाम पर विखंडन हुआ तो कभी सियासत में आवाम को क्षेत्र के नाम पर विभाजित किया गया. अब आरक्षण के नाम पर दो समुदायों में संघर्ष के हालात बन गए हैं. स्थिति बेकाबू हुई तो सरकार ने कहा गूजरों से आरक्षण का कोई वायदा नहीं किया गया था. जबकि गूजर नेता डॉ. विक्रम सिंह कहते हैं, '' वसुंधरा राजे मुख्यमंत्री बनने से पहले जब परिवर्तन यात्रा पर गईं थी तो उन्होंने कहा था कि मैं आपकी समधन हूँ और अगर मैं सरकार में आई तो आपको अनुसूचित जनजाति का दर्जा दूंगी, आप मुझे वोट दो. इसलिए आज जो हालात बन गए हैं उसके लिए पूरी तरह से राजस्थान की मुख्यमंत्री ज़िम्मेदार हैं.'' इससे पहले दक्षिणी राजस्थान में आदिवासियों और जैन समाज में टकराव हुआ तो कभी जाट-राजपूतों का द्वंद्व सतह पर आया. कभी सिख समाज और मुस्लिम समुदाय में रिश्ते बिगड़े तो नहर के पानी के लिए किसानों में क्षेत्रीय विभाजन हुआ. इस सामाजिक बिखराव पर समाजशास्त्री डॉ. राजीव गुप्ता कहते हैं, ''इनकी जो सामंती सोच है और जो सामंती जीवन शैली है, वही इनके शासन करने के तरीक़े में भी है.'' 'मुख्यमंत्री का रवैया'
राजीव गुप्ता आगे कहते हैं, ''जैसे सामंत प्रजा के बीच में विभाजन करके अपनी सामंतशाही को बरकरार रखने की कोशिश करते थे ठीक उसी तरह से इन्होंने राजस्थान के समाज को कई हिस्सों में बाँट दिया. इसके लिए उन्होंने भावनाओं का इस्तेमाल किया और लोगों को बरगलाया. कभी कहती हैं कि मैं किसी की बहू हूँ, कभी कहती है कि मैं किसी की बेटी हूँ.'' गूजर आरक्षण आंदोलन में फूटी हिंसा ने लोगों को हिलाकर रख दिया. हालात बिगड़ने के लिए पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सरकार को ज़िम्मेदार बताते हैं, ''मुख्यमंत्री ने वादाख़िलाफ़ी की. चुनाव जीतने के लिए जो सभी समाज के लोगों से वादे किए, जातियों को भड़काने का काम किया उसका ये परिणाम है.'' गहलोत कहते हैं, ''दूसरा लापरवाही की पराकाष्ठा हुई मुख्यमंत्री के स्तर पर जब गूजर समाज ने अल्टीमेटम दे दिया तब भी ये लोग नहीं संभले और लापरवाही की.'' समाज, जात और बिरादरी के सांचे में ढला तो राजनीति भी इससे अछूती नहीं रही. सत्तारूढ़ पार्टी में गूजर विधायक दल का उदय हुआ तो आदिवासी विधायकों ने भी जाति का बाना पहना और अपने विधायक दल को मोर्चे पर ला खड़ा किया. मंदिर आंदोलन में जिस पार्टी ने हिंदू हितों का नारा गूंजित किया उसकी सरकार के मंत्री अपनी-अपनी जाति की भाषा बोलते सुने गए. पुरानी माँग ग्रामीण विकास मंत्री कालूलाल गूजर कहते है, ''ये सरकार काम की नहीं है. मैं तो एक ही बात कहता हूँ कि काफ़ी लंबे समय से गूजर समाज आंदोलन कर रहा था. इसके बाद भी सफलता नहीं मिली लेकिन अभी जो जान-माल की क्षति हुई हैं उससे हमारा मन बहुत दुखी है.'' आदिवासी मीणा समाज के नेता और खाद्य मंत्री किरोड़ीलाल मीणा कहते हैं, ''जनजाति आरक्षण में गूजरों का कोई हक़ नहीं है. अटल बिहारी वाजपेयी जब सीकर आए थे तो घोषणा कर गए थे कि हम जाटों को पिछड़े वर्ग का दर्जा देंगे और जैसी ही सरकार आई पिछड़े वर्ग का दर्जा दे दिया.'' वे कहते हैं, ''गूजर पिछड़े वर्ग में आ गए. जब गूजरों को पहले से ही आरक्षण है तो इस नाते अनुसूचित जनजाति के लिए उनका कोई हक़ नहीं बनता. आज गूजर आरक्षण मांग रहें है तो कल हिंसा फैलाकर कोई और आरक्षण मांगेगा.'' पिछले चुनावों के दौरान भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की परिवर्तन यात्रा निकली तो रथ पर सवार नेताओं ने रंगीन साफे बंधवाए, चुनरी ओढ़ी, मोहक वादों की बरसात की और सपने बाँटे. लेकिन लोग अब उन वादों का हिसाब माँग रहे हैं. बीजेपी के प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर कहते हैं, ''हमारे घोषणा-पत्र में ये मुद्दा नहीं था. लेकिन फिर भी ये भी सही है कि ये मुद्दा जब उठा तो हमने वादा किया था कि इसकों हम अंजाम तक पहुंचाएगे. अब अंजाम तक पहुंचाने की जो प्रकिया है वह संविधान में के अनुसार काफ़ी लंबी है.'' गूजर समाज को लगता है कि अनुसूचित जनजाति का आरक्षण उसका हक़ है. डॉ. विक्रम सिंह गूजर कहते हैं, ''गूजर जाति के लिए जो आदिम जाति के लक्षण हैं जिन्हें केंद्र सरकार ने तय किया है, उन्हें हम पूरा करते हैं. हमारी अपनी एक अलग संस्कृति है, अपने देवी-देवता हैं, हम शुरू से ही शहरी क्षेत्रों से कटे रहें हैं, जंगल और पहाड़ों में हमेशा रहें हैं, विनिमय के हमारे अपने तरीके हैं. इसलिए हम अनुसूचित जनजाति के सारे लक्षणों को पूरा करते है और हमें आरक्षण मिलना चाहिए.'' 'परिवर्तन मंज़ूर नहीं' उधर आदिवासी मीणा समाज के नेता चुनौती भरे लहजे में कहते हैं कि आरक्षण के मौजूदा स्वरूप में कोई परिवर्तन स्वीकार नहीं किया जाएगा. मीणा विधायक दल के अध्यक्ष नंदलाल मीणा कहते हैं, ''गूजर समुदाय जनजाति दर्जे का हक़दार नहीं हैं.'' वे कहते हैं, ''माँग करना कोई बुरी बात नहीं है लेकिन इसके लिए क़ानून हाथ में लेना और जिस वर्ग में आप शामिल होने की बात कर रहें हैं उस वर्ग के सरकारी सेवा में कार्यरत लोगों को चुन-चुन कर मारना और महिलाओं के कपड़े उतरवा लेना लोकतंत्र का खुलेआम मज़ाक है.'' नंदलाल मीणा कहते हैं, ''अनुसूचित जनजाति के कुल 31 विधायक हैं. हम सबने फ़ैसला लिया है कि गूजरों की माँग न संवैधानिक, न क़ानूनी, न भौगोलिक और न ही व्यावहारिक दृष्टि से उचित है.'' जात-बिरादरी और मज़हब के नाम पर समाज बँटता है तो कई बार इंसानियत भी बँट जाती है. सदियों पुराना संबंधों का सेतु टूटा और राजमार्गों पर फँसी ज़िंदगी का फ़ैसला जाति करने लगी कि कौन अपना, कौन पराया. खाद्य मंत्री किरोड़ीलाल मीणा कहते हैं कि वे इस विभाजन के लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं. वे कहते हैं,''हमने तो समाज का विभाजन कभी नहीं किया. मैंने लोकसभा का चुनाव दौसा से लड़ा था. 30-35 प्रतिशत से ज़्यादा मीणा समुदाय के लोगों ने राजेश पायलट साहब को वोट दिया था. जातिगत कटुता मीणा समुदाय के दिमाग में कभी थी ही नहीं, गूजर जान-बूझकर ऐसा कर रहें हैं तो इसका कोई उपाए नहीं है, खाई तो वो ही पैदा कर रहें हैं.'' ऐसे में सवाल उठता है कि क्या आरक्षण राजनीति का एक हथियार बन गई है. जातिगत महत्वाकांक्षाएं इस सवाल के जवाब में समाजशास्त्री राजीव गुप्ता कहते हैं, ''वाकई कुछ जातियाँ और जनजातियाँ ऐसी दबी-कुचली हैं जिनकी माँगों के केंद्र में उनकी जाति होने के बावजूद कोई जातिवादी चीज नज़र आती हैं. अगर मुझे कहीं घुसने नहीं देते है, मेरी ज़मीन पर अधिकार करते हैं तो इसके ख़िलाफ़ आवाज़ जातिवाद पर आधारित हो सकती है लेकिन ये शोषण का विद्रोह है.'' वे कहते हैं, ''कुछ लोग वाकई इसे राजनीति के रूप में इस्तेमाल करने लगे हैं ताकि उनका सियासी कद ऊँचा हो सके. प्रशासनिक पद सिर्फ़ इसलिए चाहिए ताकि उनकी जाति का कद ऊँचा हो सके और ये कहा जा सके कि देखिए ये जाति यहाँ पर राजनीतिक और प्रशासनिक रूप से ताकतवर है.'' इस स्थिति पर चिंता जताते हुए राजीव गुप्ता कहते हैं, ''अफ़सोसजनक स्थिति है कि इस सरकार ने जाति के उपर आक्रमण करने के बजाए जाति के ढांचे को अवसर संरचना में बदल दिया और उसका राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश की है. लेकिन ये दांव उनको अब उल्टा पड़ रहा है. मुझे ऐसा लगता है कि ये जो जातीय उन्माद उभरा है, ये उन्माद राजस्थान में ही नहीं समूचे देश में बीजेपी की राजनीति के लिए ख़तरे की घंटी है. ये इनके पतन की शुरुआत है.'' भारतीय सेना को राजस्थान ने बहुता से योद्धा दिए हैं. ये धरती हर साल अपने सैकड़ों बेटों को सेना में भेजती रही है लेकिन इस बार सेना गाँव-कस्बों में पहुँची क्योंकि इस धरती के बेटे कहीं आपस में न लड़ लें. |
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