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वसुंधरा के लिए सांप छछूंदर वाली स्थिति

वसुंधरा राजे सिंधिया
तीन साल के कार्यकाल में वसुंधरा के लिए सबसे कठिन परिस्थिति है
राजस्थान में आरक्षण को लेकर गूजरों और मीणा समुदाय की भिड़ंत सत्तारुढ भारतीय जनता पार्टी और ख़ासकर मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया के लिए सांप छछूंदर वाली स्थिति पैदा कर दी है.

स्थिति कुछ यूं है कि न गूजरों को अनुसूचित जनजाति में शामिल करते बनता है न उन्हें छोड़ते बनता है.

इस मांग को लेकर छिड़े विवाद में 20 से अधिक लोग मारे गए हैं जबकि इसका विरोध कर रहे मीणा समुदाय के साथ झड़प में भी मौतें हो चुकी हैं.

हालात यहां तक पहुंच चुके हैं कि पार्टी में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया के विरोधी उन्हें हटाने की मांग भी कर रहे हैं.

मसला जाति का है और राजस्थान में आपकी जाति और जाति की राजनीति मायने रखती है.

गूजर राजस्थान की आबादी का चार प्रतिशत हैं और उनके विधायकों की संख्या आठ है जबकि पहले से ही अनुसूचित जनजाति में शामिल मीणा आबादी का 14 प्रतिशत हैं और उनके 31 विधायक हैं.

इतना ही नहीं राज्य के आला पुलिस अधिकारियों और अन्य अधिकारी वर्ग में मीणा समुदाय का ख़ासा दबदबा है.

मीणा नहीं चाहते कि एक बड़ा वर्ग भी उसमें शामिल हो.

गूजर-मीणा संघर्ष ने जहां आरक्षण की पूरी मांग को बेमानी करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है वहीं राजनीतिक दलों ने इस पर बहस की बजाय अपनी राजनीतिक रोटी सेंकनी शुरु कर दी है.

राज्य में विपक्षी कांग्रेस पार्टी ने जहां पूरे विवाद से खुद को दूर रखा है वहीं केंद्र सरकार ने सुरक्षा के उपाय करने के बाद इसे राज्य का मामला बताकर पल्ला झाड़ लिया है.

सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी में इस मुद्दे पर अंदरुनी राजनीति का घमासान शुरु हो चुका है. पार्टी ने मुद्दे के समाधान के लिए एकजुट होकर रणनीति बनाने की बजाय बलि का बकरा खोजना शुरु कर दिया है.

मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की बेलौस कार्यशैली से नाराज़ पार्टी नेताओं ने उन्हें हटाए जाने की मांग तक की है.

उधर मुख्यमंत्री गूजरों से बातचीत के साथ साथ आंदोलन को किसी भी तरह ( साम दाम दंड भेद) के ज़रिए फिलहाल रोकने की पूरी कोशिश कर रही है क्योंकि उनकी कुर्सी अब दांव पर है.

बीबीसी के राजस्थान संवाददाता नारायण बारेठ कहते हैं कि फिलहाल वसुंधरा को हटाना इतना आसान नहीं होगा लेकिन आने वाले दिन महारानी के लिए बहुत अच्छे शायद ही हों.

यानी कि राजस्थान में वही हो रहा है जो भारतीय राजनीति में कई बार हो चुका है. असली मुद्दे ( आरक्षण ) से ध्यान हटाया जाए और इसे राजनीति से ऐसा जोड़ा जाए कि किसी को असली मुद्दा याद ही न रह पाए.

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