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'उद्योग जगत ज़िम्मेदारियाँ समझे' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने व्यापार जगत से कहा है कि उसके सामने यह चुनौती है कि आर्थिक प्रगति का लाभ ग़रीब आदमी तक पहुँचे और उद्योग जगत को आम आदमी के प्रति अपनी ज़िम्मेदारियां याद रखनी चाहिए. भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) की सालाना आम बैठक को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि आर्थिक विकास का लाभ आम आदमी को मिलना बहुत ज़रुरी है और उद्योग जगत को पश्चिमी देशों की ख़र्चीली जीवनशैली से बचना चाहिए. प्रधानमंत्री ने कहा कि उनकी सरकार कारोबार के अनुकूल माहौल बनाना जारी रखेगी लेकिन उद्योग जगत को आर्थिक प्रगति से जो लाभ हुआ है उन्हें आम लोगों का जीवन सुधारने की दिशा में भी अपनी भूमिका निभानी चाहिए. ग़ौरतलब है कि भारत की आबादी लगभग एक अरब दस करोड़ है और उसकी 40 प्रतिशत आबादी एक डॉलर यानी क़रीब 40 रुपए प्रतिदिन से भी कम रक़म पर गुज़ारा करती है. प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह ने कहा, "पश्चिमी दुनिया की ख़र्चीली जीवनशैली को अपनाना हमारे लिए संभव नहीं है. सामाजिक रूप से यह कारगर नहीं है क्योंकि इससे ग़रीब लोगों में असंतोष की भावना के बीज पड़ते हैं." प्रधानमंत्री ने कहा, "भारत ने हमें बनाया है इसलिए हमें भी भारत के निर्माण में अपना योगदान करना चाहिए." उन्होंने इसके लिए दस सूत्री चार्टर की भी वकालत की और कहा कि इसके ज़रिए आर्थिक विकास का लाभ आम लोगों तक पहुंच सकेगा. प्रधानमंत्री का कहना था, "व्यापार जगत की सामाजिक ज़िम्मेदारी टैक्स नीतियों तक ही सीमित नहीं है. व्यापार जगत को सामाजिक ज़रुरतों का ख़याल रखना होगा और जिस क्षेत्र में व्यापार केंद्रित है उस इलाक़े के लोगों की ज़रुरतों का ध्यान रखना ज़रुरी है." मुनाफ़े से हटकर मनमोहन सिंह का कहना था कि जब तक मज़दूरों को यह नहीं लगेगा कि उनके काम की क़द्र की जा रही है तब तक बेहतर श्रम क़ानूनों के लिए राष्ट्रीय सहमति बनाना मुश्किल है और जबतक बेहतर श्रम कानून नहीं होंगे तब तक हमारी उद्योग इकाइयाँ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकेंगी. प्रधानमंत्री ने स्पष्ट करते हुए कहा कि कुछ कंपनियां मिलकर मूल्यों को बढ़ाए रखना चाहती हैं और ऐसा नहीं होने दिया जाएगा. उनका कहना था, "यह बिल्कुल स्वीकार नहीं किया जा सकता कि कुछ कंपनियां प्रतिस्पर्धा को रोकें वो भी ऐसे देश में जहाँ ग़रीब लोग बढ़ती क़ीमतों से परेशान है." पिछले चार साल में भारत की अर्थव्यवस्था में आठ प्रतिशत की दर से वृद्धि हुई है जिसमें आउटसोर्सिंग और प्रोद्योगिकी क्षेत्र का काफ़ी योगदान है. जानकारों का कहना है कि आर्थिक प्रगति के माहौल में एक तबका ऐसे लोगों का बन गया है जो नवधनाढ्य हैं और जिनके पास इतना धन है कि वे विदेशों में छुट्टियाँ बिताने जाते हैं, महंगे फ़ैशन के कपड़े पहनते हैं, विदेशों से आयात की हुई महंगी कारें चलाते हैं और शादी जैसे मौक़ों पर भारी-भरकम रक़म ख़र्च करते हैं. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस बेतहाशा और दिखावटी ख़र्च की आलोचना करते हुए कहा कि अगर यह असामानता इसी तरह से बढ़ती रही और इसे रोकने के लिए क़दम नहीं उठाए गए तो तो इससे सामाजिक, पर्यावरण और आर्थिक समस्याएँ बढ़ सकती हैं. उन्होंने उद्योग जगत के पड़े पदाधिकारियों से अनुरोध किया कि वे ख़ुद को और अपने सहयोगी अधिकारियों को भारी-भरकम वेतन और सुविधाएँ देने से बचें. उन्होंने कुछ कंपनियों के बारे में कहा कि वे रोज़मर्रा की चीज़ों की क़ीमतें ऊँची रखने की साज़िश में भी लगी नज़र आती हैं. प्रधानमंत्री ने कहा, "मुनाफ़ा कमाने में भी एक हद होनी चाहिए." उन्होंने कहा कि उद्योग जगत को एक ऐसा माहौल बनाने की दिशा में कोशिश करनी चाहिए कि सभी नागरिकों को यह लगे वे देश की आर्थिक प्रगति में समान रूप से शामिल हैं और हर आदमी को एक बेहतर भविष्य की उम्मीद नज़र आए. | इससे जुड़ी ख़बरें विकास दर 7.8 प्रतिशत रहेगी: आईएमएफ़12 अप्रैल, 2007 | कारोबार बढ़ती ब्याज दर और भारतीय अर्थव्यवस्था03 अप्रैल, 2007 | कारोबार भारतीय अर्थव्यवस्था: एक नज़र24 फ़रवरी, 2007 | कारोबार आर्थिक विकास की होड़ में भारत 18 फ़रवरी, 2007 | कारोबार भारत में रिकॉर्ड विकास दर की उम्मीद07 फ़रवरी, 2007 | कारोबार 'भारत ब्रिटेन को पीछे छोड़ देगा'24 जनवरी, 2007 | कारोबार वतन लौट रहे हैं ब्रिटेन में बसे भारतीय14 दिसंबर, 2006 | कारोबार 'दूसरे देशों से पूँजी निवेश नियंत्रित हो'23 अक्तूबर, 2006 | कारोबार इंटरनेट लिंक्स बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है. | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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