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'दूसरे देशों से पूँजी निवेश नियंत्रित हो' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद ने चीन, पाकिस्तान और बांगलादेश सहित कई देशों की कंपनियों के भारत में विदेशी पूँजी निवेश को नियंत्रित करने के लिए एक क़ानून बनाने की सिफ़ारिश की है. इन देशों की सूची में अफ़ग़ानिस्तान, उत्तर कोरिया, हाँगकाँग, ताइवान और श्रीलंका के तमिल टाइगर समर्थित कोई भी कंपनी भी शामिल हैं. इस गोपनीय रिपोर्ट का नाम है 'सीधे विदेशी निवेश से भारतीय सुरक्षा को खतरा’ और इसमें सरकार से कहा गया है कि इस समय विदेशी निवेश कर रहे देशों और कंपनियों की सुरक्षा जाँच का कोई क़ानून नहीं है. जिस समय भारत सरकार विभिन्न आर्थक क्षेत्रों को विदेशी निवेश के लिए खोल रही है, एक क़ानून की ज़रूरत है जो विदेशी निवेश के हर पहलू को देखे. इस समय वर्ष 2000 में पारित एक सरकारी नियम के तहत बांगलादेश और पाकिस्तान से आ रहे विदेशी निवेश को नियंत्रित किया जाता है. लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद चाहती है कि अन्य देशों को भी इस सूची में शामिल किया जाए. परिषद ने अपनी रिपोर्ट में इस बात पर चिंता जताई है कि मौजूदा क़ानून के तहत एक पाकिस्तानी कंपनी उदाहरण के लिए दुबई में रजिस्ट्रेशन कराके, अंतर्राष्ट्रीय कर समझौतों का फ़ायदा उठाते हुए साइप्रस या मॉरिशस के ज़रिए भारत में निवेश कर सकती है. परिषद चाहती है कि क़ानून इस प्रकार से बनाया जाए कि वे देश जिनसे सुरक्षा को खतरा हो, वहाँ कि कंपनियाँ बिना जाँच के भारत के आर्थिक क्षेत्र जैसे कि टेलीकॉम, बंदरगाह, हवाई-अड्डे, समाचार माध्यमों में निवेश न कर पाएँ. चीन से निवेश और सुरक्षा लेकिन सबसे दिलचस्प टिप्पणी चीन पर की गई है. चीन इस समय अमरीका के बाद व्यापार से भारत में सबसे बड़ा सहयोगी है. भारतीय कंपनियाँ चीन में निवेश कर रही हैं. मगर सुरक्षा परिषद ने अपनी रिपोर्ट में सरकार को चीन से निवेश पर आगाह किया है. महत्वपूर्ण है कि चीन से भारत को कथित ख़तरे के संदर्भ में हाल में सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन ने कुछ महत्वपूर्ण विदेशी निवेश के प्रस्तावों पर रोक लगवाई है. चीन की एक बड़ी टेलीकॉम कंपनी - हुआवेई टेकनॉलॉजी अपनी भारतीय शाखा में छह करोड़ डॉलर का निवेश करना चाहती है. इस प्रस्ताव को भारत सरकार की स्वीकृति दिलाने के लिए चीन के बड़े नेताओं ने भारतीय नेताओं से बातचीत की है लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की राय पर इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है. इसी प्रकार से एक और चीन की कंपनी जेटीई कॉरपोरेशन ने भारत के टेलीकॉम क्षेत्र में अपने उत्पाद बेचने के लिए प्रस्ताव रखा है और उसे भी स्वीकृति नहीं मिली है. कुछ महीने पहले टेलीकॉम के क्षेत्र में हच्च-एस्सार में मिस्र की एक कंपनी ओर्सकॉम निवेश करना चाहती थी. लेकिन सुरक्षा सलाहकार ने उसे स्वीकृति न दिए जाने का आधार ये बताया कि ओर्सकॉम बांगलादेश और पाकिस्तान में सबसे बड़ी मोबाइल कंपनी चलाती है जिससे भारत की सुरक्षा पर असर पड़ सकता है. राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की यह रिपोर्ट अब विभिन्न मंत्रालयों के सचिवों को भेजी गई है जिसके बाद भारत सरकार नए क़ानून बनाए जाने के प्रस्ताव पर ग़ौर करेगी. |
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