BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
बुधवार, 09 मई, 2007 को 09:32 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
'आर्थिक कारणों से भी भड़का विद्रोह'

विद्रोह
अधिकतर सिपाही किसान परिवारों से थे और इसलिए उनमें भी विद्रोह बढ़ा
किसी भी ऐतिहासिक घटना के तात्कालिक कारण कुछ और होते हैं और लंबे समय के कारण कुछ और. ये बात वर्ष 1857 के विद्रोह में भी लागू होती है. अंग्रेज़ों की नीतियों के कारण समाज के सभी वर्गों में असंतोष था और इसकी वजह से एक बार सिपाहियों का विद्रोह शुरू होने के बाद सब उनके साथ हो गए.

सेना का सबसे बड़ा वर्ग तब भी और आज भी किसानों के बीच से आता था. अंग्रेज़ी राज में किसानों में काफ़ी अंसतोष था क्योंकि ज़मीन पर लिया जाने वाला लगान बढ़ा दिया गया था और अंग्रेज़ इसे बहुत सख़्ती से वसूलते भी थे. इसलिए किसानों का असंतोष सेना तक पहुँचना लाजिमी था.

अंग्रेज़ों की नीति थी कि हिंदुस्तान में शासन-प्रशासन के लिए जो भी ख़र्च होता था वे यहीं से वसूलते थे. उनके राजस्व का 50 प्रतिशत हिस्सा किसानों से वसूले गए लगान से आता था.

पुरने वक़्त में फ़सल ख़राब होने पर एक बार ज़मींदार तो लगान माफ़ या कम कर देता था लेकिन अंग्रेज़ कोई नरमी नहीं दिखाते थे. इसकी वजह से कई बार किसानों को महाजनों से कर्ज़ लेना पड़ता था.

 अंग्रेज़ों की नीति थी कि हिंदुस्तान में शासन-प्रशासन के लिए जो भी ख़र्च होता था वे यहीं से वसूलते थे. उनके राजस्व का 50 प्रतिशत हिस्सा किसानों से वसूले गए लगान से आता था.

इससे उनके हाथ से ज़मीन निकलती जा रही थी. इसके अलावा ज़मींदारों के हाथ से भी ज़मीन छिनती जा रही थी.

शहरी इलाक़े में दस्तकार और बुनकर भी अंग्रेज़ी राज में कम परेशान नहीं थे.

मशीनों से तैयार मालों की देश में आमद शुरू हो गई थी और इससे उनकी बिक्री प्रभावित हो ही रही थी.

दूसरा अंग्रेज़ों की साम्राज्यवादी नीतियों की वजह से राजवाड़े और ज़मींदारी घटती जा रही थी. इससे उनके कर्मचारियों की संख्या भी कम होती जा रही थी.

और यही वर्ग बुनकरों से कपड़े ख़रीदा करता था लेकिन इनकी दिनोंदिन घटती संख्या से उन पर दोहरी मार पड़ी.

अंग्रेज़ अपना ज़्यादातर सामान ब्रिटेन से ही लाते थे और इससे छोटे दुकानदार भी ख़ुश नहीं थे.

साम्राज्यवादी नीति

वर्ष 1855 से पहले लॉर्ड डलहौजी की नीतियों के तहत अंग्रेज़ों का साम्राज्यवादी अभियान पूरे जोरों पर था. इससे एक के बाद एक राजवाड़े ख़त्म हो रहे थे. इससे उनके कारिंदे भी बेरोज़गार हो रहे थे. लिहाज़ा इस वर्ग में भी असंतोष था.

विद्रोह
कई वर्गों का असंतोष इस विद्रोह की ताकत बना

इसके अलावा अंग्रेज़ों ने ज़्यादा राजस्व कमाने के चक्कर में ज़मीदारों से ज़मीन लेना शुरू कर दिया था ताकि उन्हें किराया न देना पड़े. यह ख़ासकर अवध में काफ़ी हुआ.

बंगाल में किए गए स्थायी बंदोबस्त से भी वहाँ के ज़मीदारों में काफ़ी नारज़गी थी.

राजवाड़े ख़त्म होने से पंडितों और मौलवियों को भी वजीफ़े मिलने बंद हो गए थे.

किसी भी शासक के ख़िलाफ़ खड़ा होना आसाना नहीं होता इसलिए ये लोग चुप थे लेकिन एकबार जब सेना ने बग़ावत शुरू कर दी तो समाज के सभी तबकों के लोग उनके साथ आ गए.

ये ठीक है कि पुराने रियासत अपने स्वार्थ के लिए विद्रोह में शामिल हुए लेकिन एक बार जब वे खड़े हो गए तो सब बड़ी बहादुरी से लड़े और इतिहास में ऐसा ही होता है.

(बीबीसी संवाददाता पाणिनी आनंद से बातचीत पर आधारित)

तात्या टोपेशहीदों का मेला
1857 के ग़दर के शहीदों के रिश्तेदारों का मेला मध्य प्रदेश में लग रहा है.
अब्दुल गफ़्फ़ारगफ़्फ़ार बाबा का दर्द
जश्न-ए-आज़ादी गाँधी मैदान के गफ़्फ़ार बाबा के लिए दुर्दिन साबित हुआ.
तिरंगाआज़ाद भारत: कालचक्र
आज़ाद भारत के छह दशकों में उपलब्धियाँ और प्रमुख घटनाओं का कालचक्र.
अब्दुल गफ़्फ़ारनिगाहें, जो साक्षी हैं
आज़ादी का सूरज देखने वाले अस्सी वर्षीय अब्दुल गफ़्फ़ार की व्यथा-कथा.
भगत सिंहभगत सिंह के सवाल
क्या शहीद भगत सिंह के साथ देश ने न्याय किया, उनके भांजे की राय.
इससे जुड़ी ख़बरें
'टाला जा सकता था 1857 का विद्रोह'
09 मई, 2007 | भारत और पड़ोस
नष्ट हो रही है गाँधी जी की धरोहर
02 अक्तूबर, 2004 | भारत और पड़ोस
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>