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जश्न-ए-आज़ादी के दिन भी 'अपमान' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
आज़ादी की 59वीं सालगिरह जैसा शुभ दिन भी पटना के गाँधी मैदान वाले बाबा अब्दुल ग़फ़्फार के लिए दुर्दिन साबित हुआ. मैदान के फ़ुटपाथ पर सो रहे इस 80 वर्षीय बूढ़े आदमी को पुलिस वालों ने 15 अगस्त के दिन पौ फटते ही वहाँ से खदेड़ दिया था. गंदी-फटी चादर ओढ़े बीमार भिखारी से दिख रहे ग़फ़्फार वहाँ तिरंगा फहराने आ रहे सरकार बहादुर के गुलाबी मूड को बिगाड़ सकते थे. शायद इसलिए जबरन दरकिनार कर दिए गए. जश्न-ए-आज़ादी के दो दिन बाद वह गाँधी मैदान में फिर मिले. बताया सारा हाल कि कैसे उन्हें और उनके अन्य फ़ुटपाथवासी ग़रीबों को डाँट-डपटकर भगाया गया. अपनी टूटी बाँह के बारे में बताया कि दवा खाने से दर्द घटा है पर चिंता बढ़ी है. मैंने पूछा कैसी चिंता? इस सवाल पर वो कुछ देर खामोश रहे फिर बोले, "दो तीन दिनों तक रोज़ी-रोटी मारी गई. एक हाथ से काम भी ठीक से नहीं होता. किसी पर बोझ बनना ठीक नहीं. डॉक्टर साहब ने आप से क्या कहा? इस (टूटे) हाथ से अब कभी काम कर पाऊँगा या नहीं?" दरअसल मैं जिस निजी अस्पताल में उन्हें ले गया था वहाँ एक्स-रे कराने के बाद पता चला कि उनकी बाँह और बाएँ कंधे के जोड़ (ज्वाइंट) के पास एक हड्डी पूरी तरह टूटी हुई है. दवा और अन्य उपचार ठीक से चले तो एक महीने में सुधार संभव है. मैंने ग़ौर किया कि उनके माथे पर चिंता की लकीरें थोड़ी और गहरी हो गईं. आत्मसम्मान मैंने बताया कि कई लोग उनकी मदद करना चाहते हैं. इस बात से वह थोड़ा सशंकित हो उठे. कहने लगे, "पैसे कम ही मिले तो ठीक है. बहुत धन लेकर क्या होगा? उधार उतना ही लें, जितना कमाई करके इज़्ज़त के साथ चुका सकें. सिर पर ज़्यादा कर्ज़ा ठीक नहीं होता." घोर कष्ट और ग़रीबी में भी आत्मसम्मान से लबरेज ऐसा सहज संतोष. सचमुच एक चौंकाने वाला अनुभव था मेरे लिए. मैंने जब ज़ोर डाला कि रहम दिल इंसान से मिल रही मदद क़बूल करने में क्या बुरा है तब नरम हुए और बोले, "हमें कहीं रहने की जगह भर मिल जाए, बस इतना मंज़ूर कर लेंगे." पिछले दिनों एक अख़बार (प्रभात ख़बर) ने ‘बीबीसी हिंदी ऑनलाइन’ की इस समाचार कथा को उद्धृत करके छापा. मैंने भी राज्य सरकार से सूचना जनसंपर्क विभाग तक यह बात पहुँचाई. लेकिन अब तक सरकारी स्तर से ऐसा कुछ देखने-सुनने को नहीं मिला है कि ग़रीबी रेखा के अत्यंत नीचे रहने वाले इस बेघर भूमिहीन बुज़ुर्ग का दुख-दर्द इस सरकार के लिए क़ाबिल-ए-ग़ौर भी है या नहीं. इस बाबत एक अधिकारी ने अपना नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा, "सनसनी के बिना अब कोई ख़बर या रिपोर्ट न तो पब्लिक में ‘हिट’ होती है और न ही सरकार की नज़र में कार्रवाई के लिए ‘फिट’ होती है. ग़फ़्फार की ग़रीबी में कहाँ है सनसनी." लेकिन इस बूढे आदमी की व्यथा-कथा पर जो ढेरों प्रतिक्रियाएँ दुनिया भर से लगातार मिल रही हैं, उन्हें देख लगता नहीं कि मानवीय संवेदना और सहानुभूति कभी बेअसर होगी. यहीं बता दूं कि बिहार में एक जनशिकायत कोषांग (सेल) भी है. राज्य सरकार इसके ज़रिए आमंत्रित जनशिकायतों पर त्वरित कार्रवाई का दावा करती हैं. आप चाहें तो अब्दुल ग़फ़्फार के बारे में ई-मेल के ज़रिए अपनी बातें बिहार सरकार तक पहुँचा सकते हैं. ई-मेल पता है- pat_cmoff@sancharnet.in |
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