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विद्रोह की याद में एक सरकारी आयोजन | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ब़ागियों में बू रहेगी जब तलक ईमान की, तख़्ते लंदन तक चलेगी, तेग हिंदोस्तान की. बहादुर शाह ज़फ़र के इसी शेर के साथ वर्ष 1857 के शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए एक रैली का आयोजन उत्तर प्रदेश के मेरठ ज़िले में हुआ. नेहरू युवा केंद्र संगठन के संयोजन में शुरू हुई इस रैली में देशभर से 30 हज़ार युवा हिस्सा ले रहे हैं. सोमवार को क़रीब 10 हज़ार युवाओं की रैली दिल्ली के लिए रवाना हो चुकी है. इस रैली को उत्तर प्रदेश के राज्यपाल टी राजेश्वर और केंद्रीय खेल एवं पंचायती राज मंत्री मणिशंकर अय्यर ने सोमवार सुबह मेरठ के ऐतिहासिक विक्टोरिया पार्क से झंडा दिखाकर रवाना किया. इस रैली में शामिल होने के लिए नेहरू युवा केंद्र ने देशभर के सभी राज्यों से युवाओं को बुलाया है. ग़ौरतलब है कि मेरठ के जिस विक्टोरिया पार्क से इस रैली की शुरुआत हुई, वहीं से डेढ़ सौ वर्ष पहले 10 मई को भारतीय सिपाहियों के अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ विद्रोह की शुरुआत हुई थी. यह रैली अगले पाँच दिनों तक मोदीनगर, मुरादनगर, ग़ाज़ियाबाद और यमुना पुश्ता में पड़ाव डालते हुए 11 मई को दिल्ली के लाल क़िले पहुँचेगी. सरकारी ताना-बाना बड़ा पंडाल, बड़े बड़े होर्डिंग, बेहिसाब सरकारी वाहन और बसें, हज़ारों की तादाद में युवा लोग और सरकारी मुलाजिमों के काफ़िले- कुछ इस तरह का दृश्य था मेरठ से इस रैली की शुरुआत का. मणिशंकर अय्यर की अगुवाई, जावेद अख़्तर की कविताएं, फ़ारूक़ शेख़ का भाषण और दुर्गा जसराज की प्रस्तुतियों के बीच इस रैली की औपचारिक शुरुआत रविवार की रात एक भव्य समारोह में कर दी गई. यह बात और है कि मुख्य मंच के ठीक पीछे पिछले वर्ष इसी मैदान में हुए भीषण अग्निकांड का काला-झुलसा पंडाल आज भी प्रशासन को मुंह चिढ़ा रहा था. रैली चली तो रास्ते में जमकर पानी की बोतलें भी बांटी गईं. पानी पिया गया और बोतलें सड़कों पर ही फेंक दी गई. रैली के साथ कुछ कचरा बीनने वाले बच्चे भी चल रहे थे ताकि रैली का यह लाभ उनकी आज की रोटी तय कर सके. रैली शहर के कई ख़ास इलाकों से गुज़री पर शहीदों के लिए आयोजित इस रैली में मेरठ के शहीद स्मारक की याद किसी को नहीं आई. सजावट-सम्मान तो दूर, प्रशासन सफ़ाई तक नहीं करा सका शहीदों की इस निशानी के पास. यहाँ फ़ासले से मिला करो... जहाँ आयोजक इसे एक सफल और क्रांतिकारियों को सच्ची श्रद्धांजलि देने वाला कार्यक्रम बता रहे थे वहीं कुछ लोग इसे नेहरू युवा केंद्र और कांग्रेस पार्टी के ईर्द-गिर्द सिमटा हुआ कह रहे थे.
तिस पर से एक आरोप मेरठ के आम अवाम की उपेक्षा और कामकाज के प्रशासनिक तरीके का, जिसमें लापरवाहियों की ख़ासी शिकायतें लोगों की ज़ुबान पर थीं. मेरठ के लोगों को अपनी मिट्टी के शहीदों की याद तो है पर साथ ही अफ़सोस है कि उनके शहर में हुए इस आयोजन में उन्हें ही शामिल नहीं किया गया. शायद यही वजह थी कि विक्टोरिया पार्क से रैली की रवानगी सरकारी बैंड, मंत्री, अधिकारियों और घुड़सवारों के साथ हुई, स्थानीय जनता वहाँ कहीं नहीं थी. हाँ, शहर से गुज़रते वक्त ज़रूर दूध की बाल्टियों और ब्रेड के पैकेटों के साथ सुबह देख रहे मेरठ ने कौतुहल, जिज्ञासा और उत्साह के साथ इस रैली को देखा. हमसे बातचीत के दौरान मणिशंकर अय्यर ने माना कि कुछ कमियाँ रह गई हैं और आगे से होने वाले आयोजनों में उनका ध्यान रखा जाएगा पर ऐसा नहीं है कि इससे इसका महत्व कम हो जाता है, ऐसे आयोजन होते रहने चाहिए. ग़ौरतलब है कि पिछले दिनों मणिशंकर अय्यर अपने उस बयान को लेकर चर्चा में थे जिसमें उन्होंने कहा था कि एशियाई खेलों जैसे बड़े और ख़र्चीले आयोजनों को प्राथमिकता नहीं देनी चाहिए. हमने वक़्त रहते यह सवाल भी उठा दिया तो जबाव मिला, देशभक्ति की कोई क़ीमत नहीं होती. वाकई देशभक्ति की कोई क़ीमत नहीं होती पर देशभक्ति के लिए बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ती ही है. चाहे वो 1857 में चुकानी पड़ी हो, चाहे 1947 में या फिर आज. |
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