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बुधवार, 09 मई, 2007 को 17:24 GMT तक के समाचार
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बैरकपुर: इतिहास का एक फटा पन्ना

बैरकपुर
सुरक्षित बची चीज़ों में लेडी कैनिन की यह कब्र है
डेढ़ सौ साल पहले जिस जगह से पूरे उत्तर भारत में विद्रोह की आग फैली थी, आज वहाँ की कई ख़ूबसूरत ऐतिहासिक इमारतें एक पूरे युग की याद लिए मिट्टी में मिलती जा रही हैं.

कोलकाता से 22 किलोमीटर दूर बैरकपुर की इन औपनिवेशिक इमारतों को ऊँची-ऊँची जंगली घास ने ढँक लिया है, दीवारों और छतों को तोड़कर बरगद और पीपल की जड़ें और जटाएँ फूट आई हैं.

राहगीर इन इमारतों की बग़ल से गुज़रते हुए अब यह सोचना भी छोड़ चुके हैं कि इनसे भारत की आज़ादी का इतिहास जुड़ा हुआ है.

बैरकपुर भारत में अंग्रेज़ों की बसाई पहली छावनी है. वर्ष 1757 के प्लासी युद्ध के बाद जब औपनिवेशिक शासकों को भारत में पाँव जमाने की जगह मिली तो वर्ष 1765 में उन्होंने बैरकपुर में ही अपना फ़ौजी अड्डा बनाया.

कोलकाता से कुछ दूर हुगली नदी के हरितिमा भरे सुरम्य तट पर पहुँचते ही अँग्रेज़ों को इंग्लिश कंट्रीसाइड की याद आई और उन्होंने धीरे-धीरे यहाँ बड़े-बड़े बंगले और इमारतें बनाईं.

इतिहास का पन्ना

ईस्ट इंडिया कंपनी के सिपाही मंगल पांडे ने बैरकपुर में ही 29 मार्च 1857 को एक अँग्रेज़ अफ़सर पर गोली चलाई और अपने साथियों से बग़ावत करने की अपील की.

इस घटना को ही 1857 के विद्रोह की शुरुआत माना जाता है. बैरकपुर परेड ग्राउंड में मंगल पांडे ने क्वार्टर गार्ड से निकल कर गोली चलाई थी और अपने साथियों को हुंकारा था– “निकलि आव पलटुन, निकलि आव हमार साथ”.

बैरकपुर
मंगल पांडे इसी बैरकपुर से अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ बंदूक उठाकर विद्रोह के नायक बन गए

बाद में इसी परेड ग्राउंड में उन्हें आठ अप्रैल 1857 को फाँसी पर चढ़ा दिया गया. लेकिन अब ये किसी को मालूम नहीं है कि उन्हें ठीक किस जगह मृत्युदंड दिया गया.

आज बैरकपुर एक बेतरतीब और भुला दिए गए क़स्बे में बदल चुका है.

जिन इमारतों में भारतीय सेना के दफ़्तर हैं, वे तो फिर भी किसी तरह बची हुई हैं लेकिन दूसरी इमारतों की ओर न प्रशासन की नज़र है और न सरकार की.

बैरकपुर छावनी बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी केवी नागिरेड्डी ने कहा, “इन इमारतों के पुनर्निर्माण की फ़िलहाल कोई योजना नहीं है क्योंकि इनमें से कई हमारे अधिकार क्षेत्र में नहीं हैं.”

इसके अलावा नागिरेड्डी के मुताबिक़ कई इमारतें और ज़मीनें मुक़द्दमों में फँसी हुई हैं इसलिए उनको जस का तस छोड़ दिया गया है.

पहला रेसकोर्स

भारत का पहला रेसकोर्स भी बैरकपुर में अँग्रेज़ों ने 1806 में बनाया और आज भी इस रेसकोर्स में “साहब और मेमसाहबों” के बैठने के लिए स्टेडियम-नुमा बैंचे लगी हुई हैं.

लेकिन इसका कोई रखरखाव नहीं होता और रेसकोर्स स्टेडियम जर्जर हालत में खड़ा है. और इतना तय है कि ये बहुत लंबे समय तक बना नहीं रहेगा.

बैरकपुर के सौंदर्यीकरण का काम लॉर्ड वैलेज़ली ने किया था. इसके तहत उन्होंने मोती झील और उसके ऊपर इंग्लिश स्थापत्य शैली में एक पुल का निर्माण करवाया.

आज बरगद के एक पेड़ ने इस पुल के बग़ल वाली एक छोटी इमारत को पूरी तरह अपनी जकड़न में ले लिया है.

औपनिवेशिक धरोहर

पर हुगली नदी के तट पर भारत के पहले गवर्नर जनरल लॉर्ड कैनिंग की घोड़े पर सवार विशालकाय मूर्ति अब भी खड़ी है. उनकी पत्नी लेडी कैनिंग की क़ब्र भी पास ही में है.

बैरकपुर
इन्हीं इमारतों से कभी विद्रोह का बिगुल बजा था

स्थानीय महादेबानंद कॉलेज में इतिहास के अध्यापक डॉक्टर कन्हाईपद राय इसे भी अपनी धरोहर का हिस्सा मानते हैं.

उन्होंने कहा, “कुछ लोग कहते हैं इतिहास के पुराने निशान मिटा दिए जाने चाहिए, लेकिन मैं कहता हूँ लॉर्ड कैनिंग और लेडी कैनिंग भी हमारे इतिहास के पात्र हैं इसलिए उनके निशानों को यहाँ बने रहना चाहिए.”

छावनी से कुछ ही दूर पर बैरकपुर किसी अन्य क़स्बे की तरह ही भीड़ भरा और बेतरतीब है.

1857 के विद्रोह के 150 साल मनाने के लिए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थानीय इकाई ने शहर में जगह-जगह पर आम सभाएँ की हैं, नारे और पोस्टर लगाए हैं.

उनकी नज़रों के सामने ही 1857 के इतिहास से जुड़ी धरोहर विलुप्त होने के कगार पर है. उसे बचाने के लिए कोई नारे लगाने को भी तैयार नहीं है.

लेकिन नारे लगाने से भी ये धरोहर कहाँ बचने वाली है.

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