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बुधवार, 09 मई, 2007 को 12:33 GMT तक के समाचार
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'टाला जा सकता था 1857 का विद्रोह'

विद्रोह
विद्रोह को कुचलने के लिए अंग्रेज़ों ने बर्बरतापूर्ण तरीके अपनाए
वर्ष 1857 में दोनों ही तरफ सही नेतृत्व नहीं था अगर ऐसा होता तो विद्रोह को टाला जा सकता था.

विद्रोह के समय मिर्ज़ा ग़ालिब दिल्ली में रहते थे और उन्होंने अपनी डायरी 'दस्तंबो' में लिखा है इसकी ज़रूरत नहीं थी.

हो सकता है कि आप उनके विचार से सहमत न हों लेकिन उस समय ये दिल्ली और बंगाल के बहुत सारे सभ्रांत लोगों के विचार थे.

सारे इतिहासकार इस मत पर एकमत थे कि भारतीय विद्रोहियों में समन्वय, एकता और संसाधनों की कमी थी. जबकि उनके सामने एक साधन संपन्न और आधुनिक हथियारों से सुसज्जित सेना थी.

देखने वाली बात ये है कि जहाँ-जहाँ से सैनिकों का विरोध सबसे अधिक हुआ (बंगाल, अवध, दिल्ली और बिहार) वहाँ ब्रिटिश रेज़िमेंट थी ही नहीं, भारतीय सैनिक ही थे

 जिस प्रकार भारतीय विद्रोहियों में नेतृत्व का अभाव था उसी प्रकार अंग्रेज़ों के पास भी कोई कुशल नेतृत्व नहीं था. उस समय वायसराय लॉर्ड कैनिंग ने भी कोई रूचि नहीं ली.

बंगाल, जहाँ से बग़वत शुरू हुई वहाँ ज़्यादातर अवध के ब्राह्मण सैनिक थे. इसलिए जानवरों की चर्बी वाले कारतूस को लेकर तीखी प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी.

बाद में कमांडर इन चीफ बने रॉबर्ट्स ने भी माना था कि कारतूस में जानवरों की चर्बी का प्रयोग होता है लेकिन उसने कहा कि आप मुँह के बजाय हाथ लगाएं.

वर्ष 1857 के विद्रोह के समय 73-74 साल का एन्सन कमांडर इन चीफ था और वो उस समय शिमला में पड़ा था. तेरह दिन बाद तो वो अंबाला पहुँचा. शतंरज, ताश और घुड़दौड़ में उसकी रूचि थी. कोई दूसरा कमांडर इन चीफ होता तो ऐसी स्थिति नहीं आती.

इसके अलावा कमिश्नर हेली लॉरेंस ने सलाह दी थी कि अवध को अपने साम्राज्य में न मिलाया जाए लेकिन डलहौजी नहीं माने.

तो जिस प्रकार भारतीय विद्रोहियों में नेतृत्व का अभाव था उसी प्रकार अंग्रेज़ों के पास भी कोई कुशल नेतृत्व नहीं था. उस समय वायसरय लॉर्ड कैनिंग ने भी कोई रूचि नहीं ली.

इतिहास लेखन

ये ठीक है कि विद्रोह विफल हो गया लेकिन इसका प्रभाव काफ़ी दूरगामी रहा. थोड़े ही समय कांग्रेस का जन्म हुआ और अंग्रेज़ों को समझ में आ गया कि बहुत लंबे समय तक भारतीयों पर राज नहीं किया जा सकता है.

विद्रोह
विद्रोहियों ने एक 82 वर्षीय बुज़ुर्ग मुग़ल को अपना बादशाह माना

जहाँ तक 1857 के इतिहास लेखन की बात है तो हर इतिहासकार से समझता है कि वो ईमानदारी से काम कर रहा है और अपना नज़रिया देता है.

वर्ष 1957 में विद्रोह की 100 वीं वर्षगांठ पर भारत सरकार ने उस समय सुंदर कुमार सेन को इस पर किताब लिखने को कहा था. इसी तरह इस पर आर सी मजूमदार, पीसी जोशी और एस पी चौधरी ने भी लिखी.

लेकिन एक चीज़ हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि इतिहास में एकरूपता नहीं होती हर इतिहासकार अपने हिसाब से चीज़ों को सामने रखता है.

इसके बाद देखा जाता है कि कोई नया नज़रिया आ रहा हा कि नहीं. इसके अलावा इतिहास में जो काम हो चुका है उसका भी मूल्यांकन होना चाहिए. इससे पता चलेगा कि नया मुद्दा क्या है.

मैं ये कतई मानने को तैयार नहीं हूँ कि ये राष्ट्रीयता स्वाधीनता का पहला संग्राम था. जवाहर लाल नेहरू तकनीकी रूप से इतिहासकरा नहीं थे लेकिन वे भी मानते हैं कि स्वाधीनता के लिए भारतीयों का संग्राम था.

सेन कहते हैं कि इसकी शुरुआत सिपाहियों के ग़दर से हुई और बाद में अवध में ही थोड़ी बहुत राष्ट्रीयता की भावना दिखाई देती है.

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