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क्रांति की कहानी बयाँ करते सिक्के | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सिक्कों का संबंध हमेशा से हुकूमत से रहा है, इसलिए जब भारतीयों ने विदेशी सत्ता के विरुद्ध प्रथम स्वाधीनता संग्राम का एलान किया तो उसका एक प्रतीक सिक्के भी बने. वर्ष 1857 में विद्रोह की जो चिंगारी बैरकपुर से उठी उसकी जद में पूरा देश में आ गया. 11 मई को ईस्ट इंडिया कंपनी के भारतीय सिपाही मेरठ से दिल्ली तक बढ़ गए और वहाँ अंग्रेज़ सेना को हराकर नगर पर अपना कब्ज़ा कर लिया.
कहते हैं कि 12 मई को बागियों ने जब बहादुर शाह ज़फ़र को बादशाह घोषित कर दिया तो फ़ौरन उन्होंने सोने का सिक्का जारी किया, जिस पर अंकित फ़ारसी बैत यानी दोहे का अर्थ था, '' विजय के प्रतीक के रूप में सोने का सिक्का बनवाया, सिराजउद्दीन बहादुर शाह ग़ाज़ी ने.'' कहते हैं कि इसके साथ ही एक और फ़ारसी बैत लिखी गई थी जिसका अर्थ था,'' राजा बहादुर शाह हिंदुस्तान का राजा है और जो ईश्वर की कृपा से दुनिया का ज़ेवर है. '' इन दोनों फ़ारसी बैतों का रचयिता दिल्ली के प्रसिद्ध शायर मिर्ज़ा ग़ालिब को माना जाता है. जब अंग्रेज़ों ने विद्रोह का दमन कर दिया तो ग़ालिब को भी गिरफ़्तार कर लिया गया. ग़ालिब ने इस आरोप का खंडन किया कि उन्होंने ये बैत लिखी थीं. अपने एक मित्र मुहम्मद बाकिर को लिखे पत्र में ग़ालिब ने दावा किया कि इसके रचयिता उनके प्रतिद्वंद्वी कवि मुहम्मद इब्राहीम ज़ौक़ थे. वैसे आज तक सोने का ऐसा कोई सिक्का मिला नहीं जिसपर ये बैतें लिखी हों. वर्ष 1857 के एक प्रत्यक्षदर्शी अब्दुल लतीफ़ ने अपनी डायरी में लिखा है कि चांदनी चौक के क़रीब स्थित कटरा मशरू में एक टकसाल की स्थापना की गई थी और उसके संचालन का ज़िम्मा मुंशी अयोध्या प्रसाद को सौंपा गया था. अंग्रेज़ों के जासूस की रिपोर्ट से यह भी पता चलता है कि महल में उपलब्ध सोने-चांदी की तमाम चीजों को टकसाल में सिक्के बनाने के लिए भी भेजा गया था. बहादुर शाह ज़फ़र के नाम पर जारी किया गया चांदी का एक सिक्का जरूर मिला है जिसपर पहली बैत अंकित थी. आशा के विपरीत इस सिक्के पर दिल्ली, जिसे उस समय शाहजहांनबाद कहते थे, का नाम अंकित नहीं मिलता है. इस पर विद्रोह के एक अन्य महत्वपूर्ण केंद्र सूबा अवध (लखनऊ) का नाम मिलता है. बिर्जीस कद्र के सिक्के लखनऊ अवध के नवाबों की राजधानी था. 1857 में बागियों ने वाजिद अली शाह के 13 वर्ष के बेटे बिर्जीस कद्र को अवध का शासक घोषित कर दिया और उनकी माँ बेगम हज़रत महल को उनका संरक्षक बना दिया था. लखनऊ के बागी सरदारों का फ़ैसला था कि सिक्के बहादुर शाह ज़फ़र के नाम पर ही जारी किए जाएं. उन्होंने प्रस्तावित सिक्के का एक नमूना अपने प्रतिनिधि अब्बास मिर्ज़ा के हाथ मुगल बादशाह की मंजूरी के लिए भेजा था. हकीम अहसानउल्ला ख़ान ने अपनी गवाही में बताया था कि इस सिक्के को बाद में पंजाब के कमिश्नर के पास जमा करवा दिया था. बाद में इस स्वर्ण मुहर का क्या हुआ कोई नहीं जानता. संडीला के राजा दुर्गा प्रसाद लिखित बोस्तान-ए-अवध में दर्ज है कि बहादुर शाह ज़फ़र के पास प्रतिनिधिमंडल जो सोने का सिक्का लेकर आया था उसे 22 अगस्त 1857 से अवध के नए सिक्के के रूप में जारी किया जाना था लेकिन इस बीच घटनाक्रम तेज़ी से बदला और दिल्ली और लखनऊ पर अंग्रेज़ों का फिर से कब्ज़ा हो गया. लखनऊ में बिर्जीस कद्र के आदेश से एक टकसाल की स्थापना की गई. इसमें एक नए सिक्के का निर्माण हुआ जो आम चलन में भी आया. इन सिक्कों पर मछली का निशान अंकित था और लखनऊ के सर्राफों की भाषा में 'बिर्जीस कद्र के रुपए' कहा जाता था. चांदी से बनाए गए सिक्के यानी रुपए और सोने से बने मुहर या अशरफ़ी पर एक समान ही फ़ारसी लेख मिलते हैं.
इन सिक्कों का नूमना लखनऊ में पूर्व प्रचलित सिक्कों से लिया गया था जिन पर हिजरी की तिथि तो वास्तविक होती थी लेकिन राज्यारोहण की तिथि समान रूप से 26 ही होती थी. ख़ान बहादुर ख़ान के सिक्के 31 मई 1857 को अंग्रेज़ों के भारतीय सैनिकों ने बरेली में भी विद्रोह कर दिया और फिर सर्वसम्मति से रोहिला सरदार ख़ान बहादुर ख़ान को अपना नेता चुना. उसी दिन ख़ान बहादुर ख़ान ने ख़ुद को मुगल बादशाह के अधीन बरेली का विधिवत सूबेदार घोषित कर दिया. ख़ान बहादुर ख़ान की सरकार ने अपनी क्रांति का एक प्रतीक सिक्कों को भी बनाया और नए सिक्के अंकित कराने का फ़ैसला भी किया. काफ़ी विचार के बाद यह तय हुआ कि सिक्के पूर्व मुगल शासक शाह आलम द्वितीय के नाम पर जारी किए जाएं लेकिन तिथि बदल दी जाए. सिक्कों के लिए निश्चित शुद्धता वाली चांदी और तय वज़न की टिकली बनाई गईं और इनपर ठप्पे अंकित कर इन्हें सिक्के का रूप दिया गया. ख़ान बहादुर ख़ान ने इन सिक्कों के प्रचलन के लिए जो आदेश जारी किए थे उसके मुताबिक एक रुपया ताँबे के 40-40 दो पैसे के बराबर होता था. इस बात के भी प्रमाण मिले हैं कि ख़ान बहादुर ख़ान ने पुराने रुपयों की अनुकृति कर अपने सिक्के जारी किए जिस पर टकसाल का नाम बरेली और तिथि 1274 हिज़री (सन् 1857) अंकित करवाई. 6 मई 1858 को अंग्रेज़ सेना ने बरेली पर फिर से अधिकार कर लिया और ख़ान बहादुर ख़ान अपने कुछ सहयोगियों के साथ नेपाल भागने में सफल रहे. 9 दिसंबर, 1859 को नेपाल के राजा राणा जंग बहादुर ने ख़ान बहादुर ख़ान को बंदी बनाकर अंग्रेज़ों को सौंप दिया और 24 जनवरी 1860 को बरेली में उन्हें फाँसी दे दी गई. | इससे जुड़ी ख़बरें 'टाला जा सकता था 1857 का विद्रोह'09 मई, 2007 | भारत और पड़ोस 'आर्थिक कारणों से भी भड़का विद्रोह'09 मई, 2007 | भारत और पड़ोस नहीं दिखता है आम भारतीय का इतिहास09 मई, 2007 | भारत और पड़ोस विद्रोह की याद में एक सरकारी आयोजन07 मई, 2007 | भारत और पड़ोस सेल्युलर जेल की 100वीं वर्षगांठ10 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस नष्ट हो रही है गाँधी जी की धरोहर02 अक्तूबर, 2004 | भारत और पड़ोस सीमा पर भी जली मिलाप की ज्योत15 अगस्त, 2004 | भारत और पड़ोस राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का अभियान31 मार्च, 2004 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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