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उत्तर प्रदेश में उड़ती अनिर्णय की धूल | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अजीब रेतीले दिन हैं. लगता है रेत के उड़ते बगूलों ने पिछले दो दशक के खंडित जनादेश से त्रस्त उत्तर प्रदेश को एक बार फिर अपनी ज़द में लेने का फ़ैसला कर लिया है. 403 सदस्यों वाली विधानसभा के लिए हुए चुनाव के चार चरणों में अब तक 233 सीटों पर मतदान हो चुका है यानी आधी से अधिक विधानसभा तो मतपेटियों में बंद होकर 'गठित' भी हो चुकी. 28 अप्रैल को और 58 क्षेत्रों में चुनाव था मगर एक उम्मीदवार की मृत्यु की वजह से फिलवक़्त 57 क्षेत्रों में वोट डाले जाएंगे. इसके बाद 3 मई और 8 मई को क्रमश: 52 और 59 क्षेत्रों में मतदान के आख़िरी दो चरण होंगे. राजधानी लखनऊ की प्रतिष्ठा वाली सीटों पर 28 अप्रैल को मतदान होगा और इस दिन मध्य उत्तर प्रदेश और बाक़ी बचे पूर्वी उत्तर प्रदेश की सीटों पर फ़ैसला शेष दो चरण में 3 और 8 मई को होगा. इस बात के लक्षण कम ही दिखाई देते हैं कि इन शेष तीन चरणों के जनादेश की प्रकृति अब तक मिले चार चरणों के जनादेश के रुख़ से भिन्न होगी. इसका मतलब साफ़ है कि जैसे इन चार चरणों के बाद भी मुख्य प्रतिस्पर्धी दलों बसपा, सपा और भाजपा में कोई यह दावे से कहने की स्थिति में नहीं है कि वही सबसे बड़े दल के तौर पर उभरेगा, चाहे दावा अब तक अकेले बल पर सरकार बनाने का सभी करते रहे हों. असंतुलन दरअसल पिछले चार चरणों के मतदान ने एक अजीब तरह का असंतुलन दिखाया है. मीडिया अनुमानों के मुताबिक यदि पहले चरण में बसपा को बढ़त मिली तो दूसरे चरण में सपा का जोर दिखा और तीसरे चरण तक आते-आते भाजपा का वर्चस्व बढ़ता मिला. कांग्रेस जो अब तक पूरी तरह हाशिए पर थी. ज़रा सा खिसककर मूलधारा के क़रीब आती दिखी और अपने इस सीमित लक्ष्य की ओर बढ़ी कि चुनाव के बाद के परिदृश्य में उसकी भूमिका रहे यानी जो भी दल सरकार बनाने की पहल करे, वह कांग्रेस की उपेक्षा न कर सके. सपा की चुनावी मशीनरी तो इसे बढ़ती उम्र और भारी भागदौड़ से उपजी थकान कहकर इस तर्क को काटने की कोशिश में लगी रहती है कि मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की बॉडी लैंग्वेज एक आहत योद्धा की सी दिखाई देती है. दूसरी ओर मायावती अर्से बाद आक्रमक तेवर दिखा रही हैं और अगर उनकी राय पर यक़ीन किया जाए तो फ़ैसला तो हो चुका है, अब केवल घोषणा बाक़ी है. यह बात अलग है कि उनके ही दल के सतीश चंद्र मिश्र और स्वामी प्रसाद मौर्य सरीखे नेता बसपा सुप्रीमो की बात से एक हद तक ही सहमत हैं और उनकी नज़रें पूर्वी उत्तर प्रदेश पर टिकी है, जहाँ भाजपा एक ज़बर्दस्त चुनौती बनकर उभरी है. अब भाजपा मुलायम का वोट काटकर मायावती को बढ़त दिलाती है, मायावती के दावों को झूठलाकर सपा आगे बढ़ती है या स्वयं भाजपा इन दोनों क़ीमत पर सीटों को अपनी झोली में भरती है, यह देखने की बात है. आश्वस्त कल्याण कल्याण सिंह के भाषण में विजयी नेता का दर्प झलकने लगा है. वे संभवत: स्वयं को आश्वस्त कर चुके हैं कि प्रदेश का नेतृत्व उनके हाथों में आने को ही है लिहाज़ा अपनी जनसभाओं में वे कहने लगे हैं वोट माँग रहा हूँ, भीख नहीं. आपका एक-एक वोट ब्याज सहित क्षेत्र का विकास करके लौट दूँगा. अब ऐसे वचन देने का मनोबल उनके पास आ गया है. भाजपा के शिविर में जरूरत से ज्यादा उत्साह है.
कांग्रेस अभी सड़कों पर ही है. 'रोड शो' के ज़रिए राहुल गांधी मतदाताओं को प्रभावित जरूर कर रहे हैं मगर कांग्रेस के पास ज़िले-ज़िले में वह संगनाठत्मक ढांचा नहीं है जो ऐसी पहल को पार्टी के लिए वोट तक ले जा सके. पुराने कांग्रेसी इस चौथी पीढ़ी के नेतृत्व की तरफ गदगद भाव से देख जरूर रहे हैं लेकिन इससे ज़्यादा कुछ करने के लिए कांग्रेस को अगले दो वर्षों में यानी लोकसभा चुनावों तक कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी. अभी तो कांग्रेस भी कुछ वैसा ही कह रही है जैसे सपा केंद्र के लिए कहती रहती है कि केंद्र में कोई भी सरकार हमारी उपेक्षा करके टिकी नहीं रह सकती. सोनिया, राहुल और प्रियंका के चरणों के बाद कांग्रेसियों ने भी यह कहना शुरू कर दिया है कि उत्तर प्रदेश में कोई भी सरकार हमारी मदद के बिना नहीं बन सकती. बैठक का औचित्य चौथे चरण के ख़त्म होते होते चुनावोत्तर परिदृश्य पर नज़रे गड़ गई हैं. न जाने किस रणनीति के तहत मुलायम सिंह ने 30 मई को विधानसभा का अधिवेशन बुलाया है. जब चुनावी प्रक्रिया उरूज़ पर हो तब निवर्तमान होते सदन की बैठक बुलाने का क्या औचित्य है. यह किसी की समझ में नहीं आ रहा है मगर मुलायम के ऐसे दांव हमेशा ही अजूबे की तरह आते हैं. विधानसभा का सत्रावसान न कर उसे छह-छह आठ-आठ महीने तक सत्रासीन रखने की क्या कैफ़ियत हो सकती है. सिवा इसके कि पिछले मौक़ों की तरह इस बार भी मुलायम सत्र का इस्तेमाल चुनाव आयोग अथवा केंद्र सरकार पर चुनावी धांधलियों का आरोप लगाने के लिए करें? एक ऐसा प्रस्ताव पारित कराने की कोशिश भी हो सकती है जिसमें मतदान के कम प्रतिशत और केंद्रीय बल द्वारा 'आतंक' के विरुद्ध सदन की चिंता, निंदा, भर्त्सना व्यक्त की जाए. ऐसे किसी घटनाक्रम पर राज्यपाल और चुनाव आयोग सहित अन्य सभी राजनीतिक दल चौकन्ने हैं. मतगणना 11 मई को शुरू होगी और चूँकि ईवीएम के ज़रिए मतदान हुआ है इसिलए 11 तारीख़ की रात तक लगभग सभी चुनाव परिणाम मिल जाएंगे. 11 मई की रात से 13 मई की रात तक नई सरकार के लिए दावा पेश करने का फ़ैसलाकुन चरण रहेगा. यह आशंका बनी हुई है कि मुलायम सिंह जैसा चतुर खिलाड़ी इन दो दिनों का इस्तेमाल व्यापक उथल-पुथल के लिए कर सकता है. 14 मई को नई सरकार गठित होनी है और हर कोई जानता है कि अगर राजनीतिक दलों में से से किसी ने तब तक अकेले दम पर अथवा आपसी तालमेल के ज़रिए नई सरकार के गठन का कोई ऐसा प्रस्ताव राज्यपाल के समक्ष नहीं रखा जो प्रदेश को 'स्थाई सरकार' दे सके तो 14 तारीख़ को ही राष्ट्रपति शासन की सिफ़ारिश की जा सकती है. इसमें कोई शक नहीं है कि सभी दल ऐसी किसी आशंका को सहन नहीं करना चाहेंगे मगर यह तो मतपेटियाँ ही बताएंगी कि उत्तर प्रदेश के राजनीतिक भाग्य में क्या बदा है और कि अनिश्चय की धूल छंट पाएगी या नहीं. |
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