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उत्साह की कमी किसी के लिए शुभ संकेत नहीं | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
उत्तर प्रदेश उत्तम प्रदेश है कि नहीं इस पर अंतिम निर्णय तो मतदाताओं का होगा और नतीजे की घोषणा 11 मई को होगी. नतीजा क्या हो सकता है इसका कुछ आभास हमें अवश्य हुआ जब करीब एक सप्ताह पूर्व दिल्ली स्थित कुछ अन्य संपादकों के साथ मैने उत्तर प्रदेश की चुनावी गर्मी और गहमागहमी के बीच चार दिन बिताए. मैं चुनाव के संभावित नतीजे पर टिप्पणी करने की गुस्ताख़ी तो नहीं करूँगा, परंतु उन पहलुओं पर चर्चा अवश्य करूँगा जो चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं. सबसे पहले जिस बात पर ध्यान जाता है वह है चुनावी माहौल में एक अजीब सी बेरुखी और सुस्ती. कुछ तो चुनाव आयोग का डंडा और कुछ आम लोगों का चुनावी प्रक्रिया से जैसे अनमना होना, सभी राजनीतिक दलों के लिए कुछ अच्छा संकेत नहीं है. लोगों में उत्साह की कमी कम-से-कम उन लोगों के लिए तो शुभ समाचार नहीं है जो उत्तर प्रदेश की शक्ल बदलने का दावा करते हैं. पर साथ ही आपको सड़क पर जनआक्रोश या असंतोष भी उबलता नज़र नहीं आएगा, जो सत्ता की दावेदार विपक्षी पार्टियों का हौसला बढ़ाए. तो फिर इसका अर्थ क्या निकालें. एक तो यह कि शायद किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलेगा और हम उत्तर प्रदेश में त्रिशंकु विधानसभा की ओर बढ़ रहे हैं. फिर भी नंबर एक दल कौन होगा विधानसभा में सीटों के आधार पर. शायद वो जो अपने पक्ष में अधिक से अधिक मतदान करवाने में सफल रहेगा, उसकी ही सबसे अधिक सीटें भी होंगी. मुसलमान वोट चूँकि चुनाव आयोग का डंडा चल रहा है, मतलब धांधली की गुंजाइश कम है. ऐसे में फ़र्जी मतदान कम होगा और समाज के उस वर्ग को खुलकर मतदान करने का मौका मिलेगा जो सबसे कमज़ोर माना जाता है.
अधिकांश प्रेक्षकों का मानना है कि इस माहौल का लाभ बसपा को मिलेगा. एक और मिथक इन चुनावों में टूट रहा है, वह है मुस्लिम मतदाताओं के बारे में यह सोच कि अल्पसंख्यक वोट एकमुश्त पड़ता है और दर्जनों सीटों पर हार-जीत का निर्णय करता है. बात सही है अगर सब मुसलमान एकमुश्त मतदान करें किसी एक पार्टी के पक्ष में. लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है और इसका सबसे ज़्यादा नुक़सान समाजवादी पार्टी (सपा) को हो रहा है. फ़ायदा बसपा, भाजपा और कुछ हद तक कांग्रेस को भी हो रहा है. पर मुस्लिम वोट विभाजन का सबसे ज़्यादा लाभ भाजपा को हो रहा है. मुलायम सिंह यादव कितने ही उस्ताद पहलवान हों, इस चुनाव में उन्हें एंटी इनकमबेंसी यानी सरकार में रहने पर जो कुछ नुक़सान होता है, उन हालात से भी निबटना पड़ रहा है. उत्तर प्रदेश के यह चुनाव एक और तथ्य की ओर इंगित कर रहे हैं. बहुत ज़्यादा नहीं, लेकिन कुछ सीमा तक चुनावी गणित पर जातीय शिकंजे के ढीले पड़ने के संकेत हमें मिल रहे हैं. कुछ इसी तर्ज पर जैसे मुस्लिम वोट एकमुश्त नहीं पड़ रहा. अभी यह शुरुआत सभी जातियों में नहीं मिल रही है. दलित और मुस्लिम मतदाता अभी भी बसपा और सपा के साथ जुड़ा दिख रहा है. पर अन्य जातियां कुछ-कुछ इस संकीर्ण समीकरण से बाहर निकलने के संकेत दे रही हैं और अगर यह धारा ज़ोर पकड़ती है तो आने वाले चुनाव शायद ज़्यादा स्वस्थ वातावरण में लड़े जाएँगे. एक बात और जिस पर लंबी चर्चा फिर कभी करेंगे, लेकिन उत्तर प्रदेश से लौटते समय इस बार यह अहसास अवश्य हो रहा था कि उत्तर प्रदेश की राजनीतिक प्रभुसत्ता के दिन शायद लौटने वाले हैं और एक अंतराल के बात शायद इन चुनावों के नतीजे यह तय करेंगे कि दिल्ली के तख्त पर किसका कब्जा होता है. |
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