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दो समाजवादी दोस्तों की तक़रार | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
‘बाबूजी’ पुकारे जाने वाले मुलायम सिंह यादव के 30 साल पुराने समाजवादी मित्र बेनी प्रसाद वर्मा आजकल उनसे इतने नाराज हैं कि उन्हें ‘देश का भ्रष्टतम मुख्यमंत्री’ कह रहे हैं. समाजवादी पार्टी महासचिव अमर सिंह की पार्टी पर मजबूत होती पकड़ से पहले से क्षुब्ध बेनी बाबू का हाल में उत्तरप्रदेश सरकार में मंत्री वक़ार अहमद शाह से मतभेद इतना तीव्र हो गया कि उन्होंने पार्टी से नाता तोड़ दिया. इसके बाद उन्होंने अपना एक अलग राजनीतिक दल, समाजवादी क्रांति दल तैयार कर लिया और अपने उम्मीदवार चुनावी मैदान में उतार दिए. लगभग 15 दिन पुरानी यह पार्टी बिना किसी निश्चित चुनाव चिन्ह के चुनाव लड़ रही है. साथ ही उसने अनुसूचित जाति के नेता उदित राज की जस्टिस पार्टी से भी समझौता किया है. बेनी प्रसाद वर्मा के गृह क्षेत्र बाराबंकी के मतदाताओं का एक वर्ग कह रहा है कि इस क्षेत्र में विकास का पूरा श्रेय ‘बाबूजी’ को ही जाता है इसीलिए उनके उम्मीदवार का जनता का पूरा समर्थन प्राप्त है. दशकों से सक्रिय राजनीति में रहे बेनीप्रसाद वर्मा कई बार उत्तरप्रदेश और केंद्र सरकार में मंत्री रह चुके हैं. उत्साहित अपनी पार्टी की सफलता को लेकर वह स्वयं भी अतिउत्साहित हैं और कहते हैं, ‘‘कांग्रेस को इस चुनाव में 150 तक सीटें मिल सकती हैं और वह भी 100 सीटें जीतेंगे.’’ तो क्या उत्तरप्रदेश में उनकी और कांग्रेस पार्टी की सरकार बनने की संभावनाए हैं? उनका जवाब है,‘‘ संभावनाएँ नहीं, निश्चित ही उत्तर प्रद्रेश में कांग्रेस और समाजवादी क्रांति दल की सरकार बनेगी.’’ हाल में जब कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी एक चुनावी रैली में बाराबंकी आईं थीं तब भी उनके और बेनी प्रसाद वर्मा की मुलाक़ात की चर्चा हर तरफ गर्म थी. हालाँकि यह मुलाक़ात हुई नहीं लेकिन कांग्रेस के कुछ नेताओं का कहना है कि कांग्रेस और समाजवादी क्रांति दल में एक चुनावी तालमेल की बात हुई है. बेनी प्रसाद वर्मा ने फैज़ाबाद विधानसभा क्षेत्र से अपना नामांकन भी दाखिल कर दिया है. लेकिन कांग्रेस से तालमेल करने वाले समाजवादी क्रांति दल सुप्रीमो ने इधर पहले कांग्रेस फिर बहुजन समाज पार्टी और बाद में भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए आरिफ़ मोहम्मद खान से भी हाथ मिला रखा है. आरिफ़ मोहम्मद ख़ान की पत्नी रेशमा आरिफ़ बहराइच सदर से समाजवादी क्रांति दल की उम्मीदवार हैं. संभावनाएँ आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ख़ुद अपने साथ बेनी प्रसाद वर्मा और उदित राज के आने में बड़ी राजनीतिक संभावनाओं की बात करते हैं. हालाँकि वह स्वयं इस समीकरण की व्याख्या नहीं करते लेकिन माना जा रहा है कि वह पिछड़ी जाति से ताल्लुक रखने वाली कुर्मी जाति जिससे बेनी प्रसाद वर्मा का ताल्लुक है और मुस्लिम वोटों के मिलान की बात कर रहे हैं. पूर्वी उत्तर प्रदेश में बाराबंकी, बहराइच और लखीमपुर ज़िलों को बेनी प्रसाद वर्मा का प्रभाव क्षेत्र बताया जाता है जहाँ कुर्मी वोट बड़ी तादाद में हैं.
बहराइच निवासी जितेंद्र प्रसाद गुप्ता कुर्मी जाति में बेनी प्रसाद वर्मा की पकड़ का उदाहरण रामभुवन वर्मा की हत्या के हवाले से देते हैं जो बेनी प्रसाद के बहुत क़रीबी थे. उनका कहना था,‘‘बेनी प्रसाद वर्मा ने इस हत्या को यादवों के हाथों एक कुर्मी की हत्या का रंग देने की कोशिश की लेकिन इससे कुर्मियों में कोई हलचल नहीं मची जबकि दूसरा पक्ष ज़रूर गोलबंद हुआ.’’ समाजवादी पार्टी छोड़ने के पहले बेनी प्रसाद वर्मा ने बहराइच के पार्टी विधायक और मुसलमानों में ख़ासी पैठ रखने वाले वक़ार अहमद शाह पर भी कई प्रकार के आरोप लगाए थे. विरोध मदरसा नरूल उलूम के प्रबंधक मौलाना मोहम्मद उमर कहते हैं कि मुसलमान वोटर इसे बनी प्रसाद द्वारा एक मुस्लिम नेता की तरक्की न पचा पाने के तौर पर देख रहे हैं. वो कहते हैं, ‘‘और रही आरिफ़ मोहम्मद ख़ान की बात तो वो भारतीय जनता पार्टी में जा चुके हैं, मुसलमान उनके साथ क्यों कर हो?’’ मगर इस सबके बावजूद समाजवादी क्रांति दल के समाजवादी पार्टी के वोट बैंक में सेंध लगाने की बात भी कही जा रही है जिससे मुलायम सिंह यादव के उम्मीदवारों को नुक़सान पहुँचेगा. कुछ जगहों पर चुनाव के बाद बेनी प्रसाद वर्मा को केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार में मंत्री पद दिए जाने की बात भी हो रही है. उनकी पार्टी का शरद पवार के राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी से भी संबंध कायम हुआ था हालाँकि बेनी प्रसाद वर्मा कह रहे हैं कि अब वह समझौता खत्म हो गया है. |
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