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शुक्रवार, 27 अप्रैल, 2007 को 13:30 GMT तक के समाचार
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'सबसे ज़्यादा मृत्युदंड पाकिस्तान में'
परवेज़ मुशर्रफ़
संगठन ने मुशर्रफ़ से ऐसी सज़ा पर रोक लगाने की अपील की है
मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने कहा है कि दुनिया में क़रीब 20 हज़ार क़ैदी ऐसे हैं जिन्हें मौत की सज़ा दी जानी है और इसका एक तिहाई मामला पाकिस्तान में है.

इन 20 हज़ार क़ैदियों में से 91 फ़ीसदी लोग सिर्फ़ छह देशों में हैं. ये देश हैं- पाकिस्तान, इराक़, ईरान, सूडान, अमरीका और चीन. मृत्युदंड पर आई एमनेस्टी इंटरनेशनल की वार्षिक रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2006 में 2005 के मुक़ाबले थोड़ी सी कमी आई है.

लेकिन पाकिस्तान ऐसा देश हैं जहाँ ऐसे मामलों में बढ़ोत्तरी हुई है. एमनेस्टी इंटरनेशनल का कहना है कि पाकिस्तान में मृत्युदंड का बढ़ता मामला चिंता पैदा करता है.

संगठन ने सलाह दी है कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ को मृत्युदंड के सभी मामलों पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए. हालाँकि पाकिस्तान की सरकार पहले ही ऐसे सलाह को ठुकरा चुकी है.

पाकिस्तान की जेलों में फ़िलहाल सात हजा़र क़ैदी ऐसे हैं जिन्हें फाँसी दी जानी है. एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इन आँकड़ों को हैरतअंगेज़ बताया है.

क़ानून का हवाला

लेकिन पाकिस्तान के गृहमंत्री आफ़ताब शेरपाव ने बीबीसी को बताया है कि पाकिस्तान के क़ानून में फाँसी की सज़ा का प्रावधान है और सरकार ये मानती है कि फाँसी की सज़ा से हत्या जैसे गंभीर अपराधों से रोका जा सकता है.

 सभी देशों को अपनी न्याय व्यवस्था पर पैनी नज़र डालने की ज़रूरत है. आप देखेंगे कि कोई भी मौत की सज़ा ऐसी नहीं होगी जिसमें ख़ामियाँ ना हों. पाकिस्तान जैसे देश जहाँ दोहरी न्याय व्यवस्था है, एक शरिया क़ानून और एक देश का क़ानून, लेकिन दोनों ही भ्रष्टाचार के चलते न्याय नहीं कर पाती. मेरे भाई ने अपनी आँखों के सामने 50 से ज़्यादा लोगों को फाँसी के फंदे पर ले जाते हुए देखा है, और उनमें से ज़्यादातर लोग निर्दोष थे
अमजद हुसैन

एमनेस्टी इंटरनेशनल का कहना है कि दुनिया जहाँ मौत की सज़ा पर पूर्ण रूप से पाबंदी लगाने की तरफ़ बढ़ रही है, वहीं पाकिस्तान में मौत की सज़ा पाने वाले लोगों की संख्या दुनिया भर के कुल मामलों का एक तिहाई है.

दुनिया के 30 देश मौत की सज़ा को ख़त्म कर चुके हैं. पिछले साल पाकिस्तान की जेल से एक ब्रिटिश नागरिक मिर्ज़ा ताहिर हुसैन को 18 साल बाद छोड़ दिया गया.

लेकिन उन 18 सालों में कई बार उन्हें फाँसी देने की तारीख़ निकली और कई बार आगे बढ़ा दी गई. मिर्ज़ा ताहिर हुसैन को छोड़ने के लिए पड़े अंतराऱाष्ट्रीय दबाव के आगे राष्ट्रपति मुशर्रफ़ को झुकना पड़ा.

मिर्ज़ा ताहिर हुसैन के भाई अमजद हुसैन ने बीबीसी को बताया कि मौत की सज़ा में हमेशा किसी भूल की गुंजाइश रहती है.

उन्होंने कहा, " सभी देशों को अपनी न्याय व्यवस्था पर पैनी नज़र डालने की ज़रूरत है. आप देखेंगे कि कोई भी मौत की सज़ा ऐसी नहीं होगी जिसमें ख़ामियाँ ना हों. पाकिस्तान जैसे देश जहाँ दोहरी न्याय व्यवस्था है, एक शरिया क़ानून और एक देश का क़ानून, लेकिन दोनों ही भ्रष्टाचार के चलते न्याय नहीं कर पाती. मेरे भाई ने अपनी आँखों के सामने 50 से ज़्यादा लोगों को फाँसी के फंदे पर ले जाते हुए देखा है, और उनमें से ज़्यादातर लोग निर्दोष थे."

कई मामले

एमनेस्टी इंटरनेशनल का मानना है कि मौत की सज़ा को बंद करवाने के लिए सरकारों पर अधिक दबाव बनाने की ज़रूरत है, जिससे वे अपने ही नागरिकों को मौत की सज़ा देना बंद करें.

सद्दाम हुसैन को फाँसी देने के तरीक़े पर भी सवाल उठे

बीबीसी संवाददाता डेमियन ग्रैमेटिकस का कहना है कि पिछले साल सद्दाम हुसैन की फाँसी की सज़ा को जिस तरह से अंजाम दिया गया, उसे इंटरनेट पर देख कर तो मौत की सज़ा के समर्थक भी सकते में आ गए थे.

उनका कहना है कि कुछ और ऐसे मामले हैं जिनमे लोगों को तकलीफ़देह मौत दी गई. सोमालिया में एक व्यक्ति को खंभे से बाँध कर चाकुओं से वार करके मौत की सज़ा दी गई.

श्रीलंका के एक नागरिक को कुवैत में फाँसी पर लटका कर ये सजा़ दी गई लेकिन उसकी जान पाँच घंटे बाद निकली.

फ़्लोरिडा में एक क़ैदी को मौत का इंजेक्शन दिया गया लेकिन वो जनलेवा रसायन आधे घंटे तक उसे तड़पाता रहा. ईरान में एक जोड़े को विवाहेतर संबंध बनाने के लिए पत्थर से मार-मार कर मौत की सज़ा दी गई.

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