|
अपने 'तालेबानों' से लड़ता पाकिस्तान | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पाकिस्तान में अफ़ग़ानिस्तान की सीमा से लगे हुए क्षेत्र में सात क्षेत्र हैं जिन्हें संघ प्रशासित क़बायली क्षेत्र कहा जाता है. इन पहाड़ी इलाक़ों में बरसों से विशेष क़ानून लागू रहे हैं जिन्हें अंग्रेज़ों ने लागू किया था. क़बायली इलाक़ों की आबादी लगभग 70 लाख है और वहाँ के लोग बड़े परंपरावादी हैं जिन्हें अपनी ज़िंदगी में किसी और की दखल नहीं सुहाती. क़बायली इलाक़े से लगे हुए सरहदी सूबे के पूर्व मुख्य सचिव ख़ालिद अज़ीज़ का कहना है कि पाकिस्तान सरकार इन क्षेत्रों को हमेशा एक राजनीतिक योजना के तहत शासित करती रही है. इसके तहत कभी सरकार इन इलाक़ों को वित्तीय पुरस्कार देती रही तो कभी उन्हें धमकाती रही. लेकिन उसने कभी हिंसा का सहारा नहीं लिया. ख़ालिद अज़ीज़ कहते हैं,"अभी के समय में क्षेत्र में शांति क़ायम रखने के लिए सदियों से प्रयोग में लाई जाती राजनीतिक प्रक्रिया छिन्न-भिन्न हो चुकी है". अंतरराष्ट्रीय परिस्थिति ख़ालिद अज़ीज़ को 1970 के दशक में क़बायली इलाक़ों में शांति लाने का श्रेय दिया जाता है जब अफ़ग़ानिस्तान में सरदार दाऊद की सरकार ने क़बायलियों को पाकिस्तानी सुरक्षाबलों के साथ संघर्ष के लिए उकसाया था. ख़ालिद अज़ीज़ कहते हैं,"समस्या की मुख्य वजह ये है कि सातों क़बायली इलाक़ों में केंद्र के जो प्रतिनिधि होते थे उनका नियंत्रण या उनकी स्वायत्तता वैसी नहीं रही जैसी हुआ करती थी". मगर वे कहते हैं कि इसके लिए पाकिस्तान सरकार के ढीले रवैये से अधिक अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियाँ ज़िम्मेदार थीं.उस समय इन सातों क़बायली क्षेत्रों में से अधिकतर में अमरीका और पाकिस्तान समर्थक ऐसे मुजाहिदीनों ने अपने अड्डे बना लिए थे जो अफ़ग़ानिस्तान पर सोवियत संघ के क़ब्ज़े का विरोध कर रहे थे. 1989 में सोवियत सैनिक तो अफ़ग़ानिस्तान से बाहर निकल गए लेकिन तब तक अधिकतर अफ़ग़ान और अरब मुजाहिदीनों ने स्थानीय लोगों से निकट संबंध बना लिए थे. कई अफ़ग़ान, अरब और मध्य एशियाई लोगों ने स्थानीय लोगों के साथ विवाह संबंध कायम कर लिए थे इसलिए बात व्यक्तिगत संबंध तक पहुँच गई थी. सैनिक कार्रवाई 2003 में जब पाकिस्तान ने क़बायली इलाक़ों से अफ़ग़ान तालेबान और अल क़ायदा के सदस्यों को बाहर निकलने के लिए अपने सैनिकों को वहाँ भेजना शुरू किया. पाकिस्तान सरकार ने इस दौरान भी पुरानी 'पुचकारने और लताड़ने की नीति' अपनाई. मगर स्थानीय लोग बताते हैं कि उसने अपना ध्यान अरबी और मध्य एशियाई विदेशी लड़ाकुओं पर ही केंद्रित रखा जिसमें उसे कामयाबी भी मिली. मगर उसने स्थानीय और अफ़ग़ानिस्तान के तालेबान सदस्यों को खुश करने के लिए उनपर कोई लगाम नहीं लगाई. बदले में सरकार उनसे ये गारंटी चाहती थी कि वे इस क्षेत्र में विदेशी लड़ाकुओं को शह नहीं देंगे. तालेबान को लाभ इस क्षेत्र में बीबीसी के वरिष्ठ पत्रकार रहीमुल्ला युसूफ़ज़ई बताते हैं कि इससे तालेबान को लाभ हुआ और वे बिना सेना की कोई मदद किए जो मन चाहे वो करते रहे. लेकिन पाकिस्तानी सेना आख़िर तालेबान के विदेशी लड़ाकुओं से संबंधों से तंग आ गई और उसने अचानक अपनी नीति बदल डाली. सेना ने उन लोगों के ख़िलाफ़ बल का प्रयोग शुरू कर दिया जिनपर संदेह था कि उनके विदेशी चरमपंथियों से संबंध हैं. पत्रकार इलियास ख़ान कहते हैं,"इसके बाद दूसरा संघर्ष शुरू हो गया और तालेबान के लोगों ने स्थानीय जिर्गा का विरोध शुरू कर दिया जो सेना की मदद कर रहे थे". इसके बाद वहाँ हिंसा भड़क उठी और पत्रकारों को उस क्षेत्र से भगा दिया गया. ऐसे ही एक पत्रकार बीबीसी के दिलावर ख़ान वज़ीर का कहना है कि तालेबान के लड़ाकुओं ने 2005 में क़बायली इलाक़ों में लगभग 100 ऐसे लोगों की हत्या कर दी जो पाकिस्तान सरकार के समर्थक समझे जाते थे. |
इससे जुड़ी ख़बरें पाकिस्तान में 45 'चरमपंथी' मारे गए02 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस अफ़ग़ान सीमा पर पाकिस्तानी हमला01 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस 'हमले में विदेशी चरमपंथी मारे गए थे'17 जनवरी, 2006 | भारत और पड़ोस पाक-अफ़ग़ान सीमा पर धमाका, 18 मरे13 जनवरी, 2006 | भारत और पड़ोस सेना और चरमपंथियों में संघर्ष, 21 मरे10 जनवरी, 2006 | भारत और पड़ोस पाक सेना: 17 संदिग्ध चरमपंथी मारे गए 17 जुलाई, 2005 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||