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वज़ीरिस्तानः एक 'युद्धक्षेत्र'

वज़ीरिस्तान में क़बायली
चरमपंथियों के ख़िलाफ़ शुरू हूआ अभियान क़बायलियों के ख़िलाफ़ अभियान बन गया
पाकिस्तान का वज़ीरिस्तान इलाक़ा - पाकिस्तान की शक्तिशाली सेना और वहाँ के 'बिगड़ैल'क़बायली लोगों के लिए ये इलाक़ा एक युद्धक्षेत्र जैसा है.

दूर-दूर तक पहाड़ियों से भरे इस क्षेत्र में बाहर के लोगों के लिए आवाजाही कर सकना लगभग असंभव है.

यहाँ पत्रकारों को भी नहीं जाने दिया जाता और मुख्य शहर वाना तो बिल्कुल क़िले जैसा लगता है.

पिछले कई वर्षों से यहाँ झड़प, बारूदी सुरंगों का फटना, गोली-बारी और कभी-कभी हवाई हमले होना लगभग रोज़ की सी बात बन चुके हैं.

हमलों में दोनों ही तरफ़ के लोग, सुरक्षाकर्मियों और विद्रोहियों, की जानें जाती रहती हैं.

संघर्ष में विदेशी और स्थानीय दोनों ही चरमपंथी मारे जाते रहे हैं लेकिन ये भी स्पष्ट होता गया है कि इस अघोषित युद्ध में बड़ी संख्या में वहाँ के स्थानीय क़बायली भी चपेट में आते रहे हैं.

अभियान

वज़ीरिस्तान में सुरक्षाकर्मी
वज़ीरिस्तान का इलाक़ा दुर्गम है जो पहाड़ियों से घिरा हुआ है

वैसे इन इलाक़ों में जो सैनिक कार्रवाई हो रही है वह अल क़ायदा के विरूद्ध छेड़े गए अभियान का हिस्सा है.

अमरीका की अगुआई वाले सैनिक अक्सर पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान सीमा पर गश्त लगाते रहे हैं.

पाकिस्तान सरकार भी मानती है कि अमरीकी सेना से उसे निगरानी के काम में और संपर्क साधने में मदद मिलती रही है.

दोनों सेनाओं के बीच ये तालमेल मुख्य रूप से अल क़ायदा के नेताओं ओसामा बिन लादेन और अयमन अल ज़वाहिरी को पकड़ने के लिए की जा रही है.

समझा जाता रहा है कि अल क़ायदा के ये दो शीर्ष नेता और उनके कई सहयोगी इसी क्षेत्र की दुर्गम पहाड़ियों में छिपे हुए हैं और शायद वहीं से अपना काम-काज चला रहे हैं.

पाकिस्तानी सेना ने जब से इस क्षेत्र में अपना अभियान शुरू किया है तभी से उसके सैनिक अधिकारी ये कहते रहे हैं कि इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में उज़्बेक, चेचन और अरब चरमपंथी सक्रिय रहे हैं.

लेकिन स्थानीय क़बायलियों ने सैनिक कार्रवाई को अपनी ही आज़ादी और संप्रभुता पर हमला मान रहे हैं.

क़बायली नाराज़

क़बायली लोग
क़बायली लोगों ने काफ़ी समझाने-बुझाने पर आधे मन से सेना को आने दिया था

पिछले साढ़े पाँच दशक में पहली बार जुलाई 2002 में पाकिस्तानी सेना ने इस इलाक़े में क़दम रखा था जब उसके सैनिकों ने ख़ैबर इलाक़े में तिराह घाटी में प्रवेश किया.

इसके बाद सेना उत्तरी वज़ीरिस्तान में शावल घाटी और फिर दक्षिणी वज़ीरिस्तान में गई.

और ये संभव हो सका विभिन्न क़बायली गुटों के साथ लंबी बातचीत के बाद जिन्होंने इस भरोसे के बाद आधे मन से हरी झंडी दी कि सेना के आने से वहाँ धन आएगा और विकास के काम होंगे.

लेकिन जैसे ही दक्षिणी वज़ीरिस्तान में कार्रवाई शुरू हुई वहाँ के कई कबायलियों ने इसे उनको दास बनाने का एक प्रयास बताना शुरू कर दिया.

सेना ने उनको मनाने की कोशिश की कि वे विदेशी चरमपंथियों को उनके हवाले कर दे लेकिन ये कोशिश नाकाम रही.

फिर कुछ अधिकारियों से भी असावधानी हुई जिसका नतीजा है कि जो अभियान संदिग्ध अल क़ायदा चरमपंथियों के विरूद्ध शुरू हुआ था वह सुरक्षाबलों और विद्रोही कबायलियों के संघर्ष में बदल गया.

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