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पाकिस्तान के मदरसों पर उठे सवाल | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
इन ख़बरों के बाद कि लंदन के आत्मघाती हमलावरों ने पाकिस्तान के मदरसों में तालीम पाई थी, इसने धार्मिक शिक्षा और उससे कैसे लोग तैयार हो रहे हैं, इस विषय पर सवाल खड़े कर दिए हैं. लंदन बम धमाकों के ज़िम्मेदार युवकों में से एक शहज़ाद तनवीर के परिवार के लोगों का कहना है कि उसने लाहौर में दो महीने तक मदरसे में शिक्षा पायी थी. इसके बाद ब्रिटेन में ये ख़बरें प्रकाशित हुईं कि उसमें कहा गया कि संभवत उनका सोचने का तरीका ही बदल दिया गया होगा. ये माना जाता है कि ज़्यादातर मदरसे ग़रीब विद्यार्थियों को तालीम देते हैं और खाने व रहने की व्यवस्था उपलब्ध कराते हैं. यहाँ क़ुरान की शिक्षा दी जाती है. लेकिन सवाल उठने लगा है कि क्या कुछ मदरसे चरमपंथ के जनक हैं? ऐसा अनुमान है कि पाकिस्तान में लगभग 20 हज़ार मदरसे हैं. जबकि विभाजन के वक्त इनकी संख्या केवल 137 थी. बढ़ती संख्या पाकिस्तान के अख़बार द न्यूज़ के अनुसार इस समय लगभग 17 लाख ग़रीब ग्रामीण परिवारों के छात्र मदरसों में जाते हैं. इन मदरसों की संख्या 1979 में उस समय बढ़नी शुरू हुई थी जब सोवियत संघ ने अफ़ग़ानिस्तान पर कब्ज़ा कर लिया था. इस दौरान पश्चिम और खाड़ी के देशों से पाकिस्तान में बड़ी धनराशि आई थी. इसमें से एक बड़ा हिस्सा मदरसों को मिला और बाक़ी सोवियत विरोधी मुजाहिदीन गुटों के धार्मिक और सैन्य प्रशिक्षण में इस्तेमाल हुआ. मदरसों में तालीम पाए लोगों ने अफ़ग़ानिस्तान से सोवियत संघ को बाहर करने में मुजाहिदीन गुटों की भारी मदद की थी. पाकिस्तान के पत्रकार अहमद रशीद कहते हैं,''मदरसों के अनेक छात्र असहिष्णु... और दुनिया के बारे में संकुचित रुख़ अपना लेते हैं.'' उनका कहना है कि पाकिस्तान के कुछ कट्टरपंथी मदरसे अल-क़ायदा से सहानुभूति रखनेवाले शिक्षकों को रखते हैं जो छात्रों को कश्मीर और चेचन्या के चरमपंथी गुटों में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करते हैं. ब्रिटेन और पश्चिम के अनेक पुरातनपंथी परिवार अपने बच्चों को पाकिस्तान के मदरसों में छह से नौ महीने तक तालीम के लिए भेजते हैं. अहमद राशिद का कहना है कि लेकिन समस्या यह है कि वो वहाँ पहले कहीं अधिक भ्रमित हो जाते हैं. अमरीका में 11 सितंबर, 2001 के हमले के बाद पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने मदरसों के सुधार और पंजीकृत करने की बात कही थी. लेकिन बीबीसी के हारुन रशीद का कहना है कि इस दिशा में प्रगति के बहुत कम संकेत नज़र आ रहे हैं. |
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