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उत्तराखंड चुनाव पर मौसम की मार | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
एक ओर आचार संहिता की सख्तियाँ और दूसरी ओर बर्फ़बारी और गला देनेवाली ठंड ने मिलकर उत्तराखंड चुनाव का मिज़ाज गड़बड़ा दिया है. चुनावी प्रचार के कम से कम चार महत्वपूर्ण दिन मौसम की भेंट चढ़ गए और जिन नेताओं के कार्यक्रम प्रभावित हुए उनमें सोनिया गाँधी, मनमोहन सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी जैसे स्टार प्रचारक हैं जिनकी बातें सुनकर मतदाता अपना मन स्थिर करते हैं. झंडे धुल गए, झंडियाँ तेज हवाएँ उड़ा ले गईं और बाँकी गीले पोस्टरों की लिखावट बांची नहीं जा सकती. उत्तराखंड में पिछले सप्ताह तक जो चुनावी ज्वार उमड़ रहा था उसमें यह व्यवधान किसी भी राजनीतिक दल को रास नहीं आया. सोनिया गाँधी ने पिछले चुनाव में भी उत्तरकाशी से अपने अभियान की शुरुआत की थी. इसे 'शुभ-शगुन' के रूप में दोहराया जा रहा है. इस बार भी टिहरी और उत्तरकाशी में एक ही दिन चुनावी सभाएँ आयोजित की गईं हैं. अंतर इतना ही है कि उनकी सभाएँ तीन दिन पहले होनेवाली थीं जो अब शुरु होगी, बशर्ते मौसम मेहरबान बना रहे. बड़े नेताओं के कई चुनाव क्षेत्रों के कार्यक्रम भी इसी हिसाब से संशोधित किए गए हैं जिससे कई उम्मीदवार खासे निराशा हैं. अटल बिहारी वाजपेयी चुनावी रैली में नहीं आ सके और बागेश्वर आदि भीतरी चुनाव क्षेत्रों में होनेवाली उनकी चुनाव सभाएँ रद्द कर देनी पडीं. प्रचार अभियान में हुए इस उलटफेर से संबंधित क्षेत्रों के भाजपाई उम्मीदवारों के दिल पर क्या गुजर रही होगी, यह आसानी से समझा जा सकता है. अटल बिहारी वाजपेयी भाजपा के सबसे प्रभावी प्रचारक हैं. हालाँकि उनकी अनुपस्थिति और पिछले कुछ दिनों से मौसम की ख़राबी से हुए नुक़सान की भरपाई करने के लिए लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, सुषमा स्वराज, रविशंकर प्रसाद जैसे नेताओं की टीम मैदान में उतर आई है. नारायण दत्त तिवारी ने भी रामनगर की रैली में ख़राब मौसम के बावजूद स्वयं उपस्थित होकर कार्यकर्ताओं में उत्साह जगाया. मौसम की मार मौसम में आए कुछ सुधार ने कार्यकर्ताओं में भी कुछ जोश तो जगाया है. नए झंडे लहराने लगे हैं, झाड़ियाँ-पताकाएँ नए सिरे से लटकाई जा रही हैं. मौसम ने हालांकि कई क्षेत्रों पर अपना दबाव घटाया है मगर शेष बचे इलाकों में अभी अपेक्षित सुधार आना बाकी है. मसूरी में दो दिनों से जारी भारी बर्फ़बारी ने देहरादून को भी प्रभावित किए बिना नहीं छोड़ा है. मगर मतदान में बचे सिर्फ़ चंद दिनों को देखते हुए राजनीतिक दल अपनी रैलियाँ और सभाएँ करने में अब मौसम की मार झेलने को भी तैयार हो गए हैं. रुद्रप्रयाग के 'समझदारों' ने मौसम की मार झेलने का नायाब नुस्खा खोज निकाला. वे उम्मीदवारों से (जिसमें सभी दलों के प्रत्याशी और संपन्न निर्दलीय भी शामिल हैं ) 'इंतज़ाम' की माँग करने लगे हैं. नतीजतन रुद्रप्रयाग सहित निकटवर्ती इलाकों में दूर-दूर तक देसी और विलायती शराब की कीमतों में तीन से चार गुना इजाफ़ा हो गया है. जब अधिकारियों का ध्यान इस ओर आकृष्ट किया गया तो उन्होंने त्वरित कार्रवाई का आश्वासन दिया ताकि किसी तरह का खलल न पड़े. सभी राजनीतिक दलों को इस बात का भी एहसास है कि पहाड़ी इलाकों में मतदान बहुत धीमा और कम होता रहा है. इस बार तो नैनीताल, अल्मोड़ा, रानीखेत जैसे पहाड़ी शहरों से लेकर हल्द्वानी, उधमसिंह नगर, रुद्रपुर, रामनगर जैसे मैदानी शहरों में भी ख़राब मौसम कहीं मतदाताओं को घरों से मतदान केन्द्रों तक जाने की राह में बाधा न बन जाए. मौसम के इस उठते गिरते ग्राफ ने इस आशंका को अब इतना बढ़ा दिया है कि इस बात को लेकर अटकलें लगाई जा रही हैं कि कम मतदान होने की स्थिति में लाभ सत्तारूढ़ दल को मिलेगा या विपक्ष को. नई सरकार के गठन के लिए 70 विधानसभाई क्षेत्रों में 60 लाख 42 हज़ार 628 मतदाताओं को फ़ैसला लेना है जिनमें से लगभग साढ़े उनतीस लाख महिलाएँ हैं और 80 हजार सर्विस (सैनिक) मतदाता हैं जो बजरिए डाक मतदान करेंगे. (घनश्याम पंकज 'दिनमान' और 'स्वतंत्र भारत' के पूर्व प्रधान संपादक हैं) | इससे जुड़ी ख़बरें चुनाव प्रचार भी बारात की तरह10 फ़रवरी, 2007 | भारत और पड़ोस उत्तराखंड चुनाव पर 'निर्दलीय हमला'08 फ़रवरी, 2007 | भारत और पड़ोस उत्तरांचल नहीं, अब उत्तराखंड29 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस तीन राज्यों में फ़रवरी में होंगे चुनाव29 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस प्रदेश का अभूतपूर्व विकास हुआ है: तिवारी01 नवंबर, 2003 | भारत और पड़ोस उत्तरांचल चुनाव:प्रतिष्ठा का मुद्दा11 मई, 2004 | भारत और पड़ोस उत्तरांचल में कांग्रेस मुश्किल में01 मई, 2004 | भारत और पड़ोस एन डी तिवारी की इस्तीफ़े की पेशकश04 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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