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उत्तरांचल चुनाव:प्रतिष्ठा का मुद्दा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
उत्तरांचल छोटा राज्य ज़रूर है लेकिन यहाँ से तीन केंद्रीय मंत्री होने से भारतीय जनता पार्टी के लिए ये चुनाव प्रतिष्ठा का सवाल हैं तो राज्य में सत्तारुढ़ कांग्रेस के लिए अपनी सरकार की साख बचाए रखने की चुनौती है. विधान सभा चुनावों और पंचायत चुनावों में हारने के बाद भाजपा के लिए पहाड़ में अपने जनाधार को बनाए रखने का सवाल है तो स्पष्ट बहुमत के साथ सत्ता में आई कांग्रेस सरकार के लिए ये चुनाव एक तरह से उसके कामकाज के लिए जनादेश होंगे. अलग राज्य बनने के बाद उत्तरांचल में ये पहले लोकसभा चुनाव हैं. जब तक उत्तरांचल उत्तरप्रदेश का हिस्सा था तो यहाँ लोकसभा चुनावों में प्रमुख मुद्दा उत्तराखंड का निर्माण रहता था लेकिन इस बार ये चुनाव प्रमुख रूप से राज्य के विकास के मुद्दे पर लड़ा गया. हरिद्वार को छोड़कर राज्य की 5 में 4 सीटों पर कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधा मुक़ाबला है. हरिद्वार में सपा और बसपा के बीच काँटे की टक्कर है और भाजपा और कांग्रेस में तीसरे स्थान के लिए लड़ाई है. भाजपा मतदाताओं को ये समझाने में लगी रही कि विशेष राज्य का दर्जा और आर्थिक पैकेज देकर केंद्र ने उत्तरांचल के विकास की बुनियाद डाली. तिवारी सरकार पर आरोप लगे कि केंद्र से मिले धन का सही उपयोग नहीं किया. जबकि कांग्रेस ने ये मुद्दा उठाया कि केंद्र राज्य की अनदेखी कर रहा है और विकास के लिए ज़रूरी धन केंद्र से नहीं मिला है. जबकि सपा, बसपा और यूकेडी ने राज्य में विकास की कमी के लिए बीजेपी और कांग्रेस को बराबर का निशाना बनाया. दो जनरलों की लड़ाई सबसे ज़्यादा चर्चित सीट रही पौड़ी. भाजपा के भारत उदय प्रचार के महत्वपूर्ण बिंदु 'स्वर्णिम चतुर्भुज योजना' की वास्तविक परीक्षा यहीं होगी क्योंकि सड़क परिवहन मंत्री रिटायर्ड मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूरी यहीं से चुनाव लड़ रहे हैं.
ये मुक़ाबला दो जनरलों की लड़ाई के रूप में भी देखा गया क्योंकि कांग्रेस ने उनके ख़िलाफ़ सेना में उनसे एक पद ऊंचे रहे लेफ्टिनेंट जनरल टीपीएस रावत को उतारा जो राज्य सरकार में मंत्री हैं. हरिद्वार में पिछले महीने पुलिस और व्यापारियों के बीच हुए दंगे काँग्रेस को भारी पड़े. समाजवादी पार्टी ने इसे पहाड़ बनाम मैदान का मामला बनाया और मुलायम सिंह ने हरिद्वार को उत्तरांचल से अलग करने की मांग की. चुनाव प्रचार में एनडीए के फीलगुड के जवाब में एन डी तिवारी ने फील बैटर का मुहावरा उछाला. टिहरी के राजा मानवेंद्र शाह को ड्रीम गर्ल हेमामालिनी का सहारा लेना पड़ा तो कांग्रेस ने असरानी और ज़ीनत अमान के रोड शो कराए. आख़िरी दिनों में हरिद्वार में मुलायम सिंह की रैली ने वहाँ के चुनावी समीकरण उलट दिए और भाजपा को तीसरे स्थान पर धकेल दिया. अब यहाँ मुख्य मुक़ाबला सपा और बसपा के बीच है. पूरे प्रदेश में 48-50 फ़ीसदी मतदान हुआ जबकि पिछले लोकसभा चुनावों और उससे पहले भी इस क्षेत्र में क़रीब 55 फ़ीसदी मतदान होता रहा है. राजनैतिक जानकारों को हैरानी है कि राज्य बनने के बाद क्या लोगों की वोट देने में दिलचस्पी घट गई है? |
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