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उत्तरांचल में कांग्रेस मुश्किल में | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दो पहाड़ी राज्यों-हिमाचल प्रदेश और उत्तरांचल में सिर्फ़ सीमा या एक जैसी भौगोलिक बनावट भर की समानता नहीं है. यहां की राजनीति और समाजों में भी काफी मेल है. दोनों राज्यों में वैसे तो कांग्रेस का शासन है पर यहां की अधिकांश लोकसभा की सीटों पर भाजपा का क़ब्ज़ा है. एक्ज़िट पोल के बाद अब भाजपा के लिए अपनी हर सीट को बचा कर रखना बहुत महत्वपूर्ण हो गया है और उस हिसाब से भाजपा इन दोनों ही प्रदेशों में रक्षात्मक लड़ाई में उलझी है. आँकड़े कांग्रेस के पक्ष में हैं. दोनों ही राज्यों में पिछले लोकसभा चुनाव के बाद जो विधानसभा चुनाव हुए उनमें कांग्रेस के शासकों ने भाजपा को गद्दी से हटा दिया. सिर्फ़ चौथाई हिस्सा पर जीत का फासला ज़्यादा न था. 2002 में उत्तरांचल में चुनाव हुआ था और कांग्रेस बस किसी तरह जीत पाई थी. उसे 70 में से 36 सीटें मिलीं. वोटों के हिसाब से उसे 26.9 फीसदी वोट मिले जो भाजपा से मात्र 1.4 फीसदी ज़्यादा थे. राज्य में कांग्रेस को अधिकांश सीटों पर वहां पड़े वोट में सिर्फ चौथाई हिस्सा पाकर भी जीत हासिल करने का श्रेय है जैसा कि मुल्क में और कहीं नहीं होता. उत्तराखंड आंदोलन के कई जमातों ने भी चुनाव में हिस्सा लिया था और इस चलते हर क्षेत्र में वोटों का बिखराव हुआ-बहुकोणीय मुकाबले हुए.
अगर विधानसभा जैसा मतदान हुआ तो कांग्रेस को प्रदेश की पांच में से तीन सीटें मिलेंगी, जबकि भाजपा और बसपा को एक-एक स्थान मिलेंगे. पर यहाँ दाँव बहुत नाज़ुक है. अगर राज्य सरकार के काम के प्रति नाराज़गी के चलते दो फीसदी मतदान भी कांग्रेस से दूर हुए तो उसकी सीटों की संख्या दो रह जाएगी. अगर नाराज़ लोगों का प्रतिशत चार हुआ तो कांग्रेस के हाथ लड्डू ही आएगा. सो उत्तरांचल में कांग्रेस की लड़ाई बहुत मुश्किल है. और यहाँ का इतिहास भी उसके पक्ष में नहीं है. 1990 के दशक से इस क्षेत्र में हर लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन खराब रहा है. इतिहास कांग्रेस के ख़िलाफ़ इन पाँच सीटों पर, जो बाद में उत्तरांचल की सीमा में आ गए, भाजपा ने हर दम अच्छा प्रदर्शन किया है. 1996 में भाजपा तो सिर्फ़ दो सीटों पर कांग्रेस (तिवारी) से, (जो अभी भी के मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के तब कांग्रेस से अलग होकर बनाई थी) तथा 1999 के चुनाव में एक सीट पर कांग्रेस से पराजित हुई थी. इनके अलावा भाजपा ने चारों लोकसभा चुनावों में इलाक़े की सभी सीटें जीती हैं. पर नया राज्य बन जाने के बाद यह संभव है कि पुराने इतिहास का मोल कुछ कम हो जाए. तब अलग उत्तरांचल भी एक मुद्दा होता था और भाजपा को उसका लाभ मिला. पिछले विधानसभा चुनाव में यहां समाजवादी पार्टी की भूमिका नगण्य हो गई थी जबकि उत्तरांचल क्रांति दल और बसपा ने महत्वपूर्ण भूमिका ले ली. अब यह देखना बाकी है कि लोकसभा चुनावों में भी यही परिदृश्य रहता है या नहीं. कांग्रेस ने ज़्यादातर नए उम्मीदवार उतारे हैं और इनको लेकर नाराज़गी है. हरिद्वार में हाल में हुई गड़बड़ भी कांग्रेस के चुनावी भविष्य पर प्रभाव डाल सकती है. इससे राज्य में भाजपा को कुछ लाभ हो सकता है. |
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