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साधु-संत और फ़ीलगुड | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
‘इंडिया शाइनिंग’ और ‘फ़ीलगुड फ़ैक्टर’ के बारे में साधु-संत और धर्माचार्य क्या सोचते हैं और क्या सोचकर वो वोट डालेंगे. संतों की नगरी हरिद्वार में उनसे यही सवाल पूछा हमने... मानव कल्याण आश्रम के स्वामी कल्याणानंद कहते हैं “हम तो उस पार्टी को वोट देंगे जो भारत की संस्कति को समझे.” मतलब- क्या बीजेपी? पूछे जाने पर वो तपाक से कहते हैं, “जब से वाजपेयी आए हैं भारत चमक तो रहा ही है.सड़कें बन रही हैं ,पाकिस्तान से संबंध सुधर रहे हैं,नदियों को जोड़ने के सपने देखे जा रहे हैं.अब हथेली पर सरसों तो उगाया नहीं जा सकता.” लेकिन स्वामी ब्रहमस्वरूप ब्रह्मचारी एक सिरे से इस तर्क को खारिज कर देते हैं, “ये भाजपा का देश की जनता को गुमराह करने का नारा है. क्या हिन्दुस्तान में इनके आने से पहले कुछ अच्छा नहीं था. पंडित नेहरू ने भाखड़ा बांध बनवाया, भारी उद्योग लगाए, क्या इन्होंने ऐसा कोई काम किया है.” परमार्थ निकेतन के स्वामी चिदानंद महाराज का कहना है कि, “अगर कुछ लोगों को छोड़ दें तो अस्सी से नब्बे फीसदी लोग सद्भाव में जीना चाहते हैं. तोगड़िया जैसे लोगों को समझना चाहिए कि हमारा चेहरा इन्क्लूसिव है एक्सक्लूसिव नहीं. राजसत्ता कम से कम इतना तो कर रही है कि सद्भाव टूटे नहीं. कहीं कोई रोज़ गोधरा नहीं बन रहा है.” हरिद्वार में इन दिनों अर्द्धकुंभ चल रहा है और देश भर के साधू समाज संत और धर्माचार्य यहां जुटे हैं. इनकी बातों से ऐसा नहीं लगता कि किसी गैर राजनीतिक व्यक्ति से बात हो रही है. राजनीतिक रूप से ये भी उतने ही धुरंधर कहे जा सकते हैं. हरिद्वार के एक साधु स्वामी परमानंद परमातीर्थ कहते हैं, “हम तो विकास के नाम पर वोट डालेंगे. अब आप हरिद्वार को ही देखिए. इतने महत्वपूर्ण तीर्थस्थल का जैसा विकास होना चाहिए वो नहीं हो रहा है. गंगा की सफाई, बिजली की सुचारू सप्लाई और हर की पैड़ी का सौंदर्यीकरण हो तो अच्छा रहेगा.” गंगा तट पर धूनी रमाए कुछ साधुओं के सामने जब ये सवाल रखा गया कि क्या भारत चमकता हुआ दिख रहा है इस पर एक ने कहा, “भारत हमेशा से चमकता रहा है. ये आज की बात नहीं.” एक साधू ने कहा, “ये किसी एक राजनैतिक दल का मुद्दा नहीं होना चाहिए, सभी को इस दिशा में काम करना चाहिए.”
हरिद्वार सहित उत्तरांचल की पांच लोकसभा सीटों के लिए दस मई को वोट डाले जाएंगें. हरिद्वार में छह हज़ार से भी ज़्यादा आश्रम और धार्मिक संस्थाएं हैं. यहां की राजनीति पर आश्रमों और अखाड़ों का खासा असर है. राजनैतिक गतिविधियों से हरिद्वार उतना ही तपा रहता है जितना वो धर्म,कर्मकांड और श्रद्धा भाव से सराबोर रहता है. यहां कहा जाता है कि धर्म और राजनीति कल कल बहती पतित पाविनी गंगा के दो किनारे हैं. महत्वाकांक्षा और स्वार्थ के अदृश्य घाट पर कभी ये किनारे मिल भी जाते हैं. |
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