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शुक्रवार, 29 दिसंबर, 2006 को 08:58 GMT तक के समाचार
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उत्तरांचल नहीं, अब उत्तराखंड

उत्तरांचल विधानसभा
चुनाव से पहले उत्तरांचल का नाम बदलने को लेकर लोग सवाल भी उठा रहे हैं
उत्तरांचल का नाम बदलकर उत्तराखंड करने के विधेयक पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर करने के साथ ही सारी औपचारिकताएं पूरी हो गई हैं. अब उत्तरांचल को उत्तराखंड के नाम से जाना जाएगा.

ग़ौरतलब है कि लोकसभा और राज्यसभा में ये विधेयक पहले ही पारित हो गया था.

इसके साथ ही अब ये भी तय दिखाई दे रहा है कि राज्य में फ़रवरी में होने वाले चुनावों में नाम परिवर्तन एक बड़ा मुद्दा होगा.

सत्ताधारी कांग्रेस जहां अपना चुनावी वादा पूरा करने पर अपनी पीठ थपथपा रही है, वहीं विपक्ष इसे चुनावी स्टंट करार दे रहा है.

 ''राज्य की जनता के लिए एक खुशी का मौका है. नाम बदलकर उत्तराखंड होने से शहीद आंदोलनकारियों का सपना साकार हो गया है
मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी

मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी खुश हैं और उनके मुताबिक उनकी सरकार ने लोगों को नए साल का एक अनमोल तोहफ़ा दिया है, ''राज्य की जनता के लिए एक खुशी का मौका है. नाम बदलकर उत्तराखंड होने से शहीद आंदोलनकारियों का सपना साकार हो गया है.''

हालाँकि नाम बदलने से राज्य के राजकोष पर करीब 400 करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ पड़ने की उम्मीद है जो कि पहले से ही 16000 करोड़ के घाटे को झेल रहा है.

लेकिन चुनावी अंकगणित में सत्ताधारी कांग्रेस के लिए ये एक फायदे का सौदा होगा, ऐसा कांग्रेस समझती है.

विपक्ष का आरोप

पार्टी नेताओं का मानना है कि अगर ख़र्च आता भी है तो उसपर कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए क्योंकि यह मसला जनता की भावनाओं से जुड़ा है.

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष हरीश रावत कहते हैं, "कांग्रेस ने जनता से किया गया अपना वायदा पूरा कर दिया है.''

उनका मानना है कि इससे ये साबित हो गया है कि कांग्रेस सिर्फ़ कोरी घोषणा में यकीन नहीं करती.

उधर प्रमुख विपक्षी दल भाजपा ने ऐन चुनाव के पहले हुए इस नाम परिवर्तन पर कांग्रेस को आड़े हाथों लिया है और आरोप लगाया कि तिवारी सरकार जनता की भावनाएं भुनाना चाहती है.

विपक्ष के नेता मातवर सिंह कंडारी कहते हैं, "जनता विकास चाहती है नाम परिवर्तन करके उसे खुश नहीं किया जा सकता."

 जनता विकास चाहती है नाम परिवर्तन करके उसे खुश नहीं किया जा सकता
विपक्ष के नेता मातवर सिंह

उत्तराखंड आंदोलन में अग्रणी रहे उत्तराखंड केंद्रीय दल ने नाम परिवर्तन का तो स्वागत किया है लेकिन इसके समय पर सवाल उठाए हैं. दल के अध्यक्ष काशी सिंह ऐरी कहते हैं, "आखिर इतनी देर क्यों हुई?"

उधर, लोगों में इसकी मिलीजुली प्रतिक्रिया हुई है. कुछ लोग इससे बेहद खुश हैं कि अलग राज्य के आंदोलन के अनुरूप अब यहाँ का नाम बदल गया है तो कुछ का कहना है कि नाम में कुछ नहीं रखा है और विकास और रोज़गार असली मसले हैं.

राजधानी का मुद्दा

दरअसल ये मुद्दा यहाँ की जनभावनाओं से जुड़ा है. अगर इतिहास के पन्नों में जाएँ तो कॉमरेड पीसी जोशी ने पहली बार 1952 में उत्तर प्रदेश को बांटकर उत्तराखंड बनाए जाने की माँग की थी.

पहाड़ की उपेक्षा की आवाज़ उठाकर 1979 में उत्तराखंड आंदोलन शुरू हुआ. वर्ष 1994 में इसने एक तरह से व्यापक जन आंदोलन का स्वरूप ले लिया जिसमें कई लोग शहीद भी हुए.

देहरादून घंटाघर
कई संगठन राजधानी देहरादून से हटाकर गैरसैंण करने की माँग कर रहे हैं

वर्ष 2000 में राज्य तो बना लेकिन तत्कालीन भाजपा सरकार ने इसका नाम उत्तरांचल रखा. इसके बाद से राज्य का नाम बदलने की मांग समय समय पर उठती रही है.

एक दूसरा संवेदनशील मसला स्थायी राजधानी का है और शायद तिवारी सरकार को जनता के बीच उसका भी जवाब देना होगा.

नौ नवंबर, 2000 को जब राज्य का गठन हुआ था तो देहरादून को अस्थायी राजधानी रखा गया था और ये कहा गया था कि राज्य की निर्वाचित सरकार इस मसले को हल करेगी.

आंदोलनकारी संगठन उत्तरांचल की राजधानी गैरसैंण को बनाने की माँग कर रहे हैं लेकिन सरकार ने इस विषय में समिति और आयोग गठित करके एक तरह से इस मुद्दे को लटकाए रखने की कोशिश की है.

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