|
उत्तराखंड चुनाव पर 'निर्दलीय हमला' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
उत्तराखंड की कुल 70 विधानसभा सीटों के लिए 256 निर्दलीय उम्मीदवार मैदान में उतर आए हैं. चुनाव के लिए नाम वापसी का मौक़ा बीत जाने के बाद बचे कुल 806 प्रत्याशियों में से लगभग तिहाई से ज्यादा ऐसे होंगे जिनकी किसी राजनीतिक दल या विचारधारा से कोई प्रतिबद्धता नहीं है और जो महज निरंकुश सत्ताभिलाषी हैं. इन निर्दलियों में अनेक ऐसे हैं जिन्हें दोनों राष्ट्रीय दलों कांग्रेस और भाजपा से चाहकर भी उम्मीदवारी नहीं मिल पाई या वे लोग हैं जिन्हें बड़े दलों के ऐसे उम्मीदवारों से शह मिली जो स्वयं तो अपनी पार्टी का मनोनयन हासिल नहीं कर पाए मगर जिनकी ईर्ष्या को यह भी गँवारा नहीं है कि जिन्हें उनकी जगह पार्टी का नामांकन मिला है, वह जीत जाएं. वे ऐसी हरचंद कोशिश करेंगे कि उनके बैरी की जीत की राह सुगम न रह पाए. इन निर्दलियों में कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें किसी जाति-विशेष या धर्म-विशेष के वोट बाँटने के लिए मुख्य प्रतिस्पर्धी उम्मीदवारों में से ही किसी ने खड़ा कर दिया है. अब ये 'डमी उम्मीदवार' केवल इस उद्देश्य की पूर्ति के काम आएँगे कि उसकी जाति या धर्म के जो मत सामान्य रूप से प्रतिस्पर्धी के पास जाते उनमें से काफ़ी ज्यादा बँट जा सकते हैं और इस तरह प्रतिस्पर्धी की स्थिति कमज़ोर की जा सकती है. शुभ संकेत नहीं निर्दली उम्मीदवारों का इतनी बड़ी संख्या में चुनावी मैदान में उतरना उत्तराखंड की भावी सरकार के लिए कोई शुभ संकेत नहीं है क्योंकि इन निर्दलियों का कोई राजनीतिक या वैचारिक चरित्र नहीं होता. उत्तराखंड में जैसे हालात बनते दिख रहे हैं वहाँ सरकार बनाने के दोनों प्रबल दावेदारों- कांग्रेस और भाजपा में से किसी को भी दो टूक जनादेश मिलने के आसार कम ही हैं. इन निर्दलियों की कोई राजनीतिक रीढ़ हो या नहीं मगर इनकी एक बड़ी खासियत यह है कि चुनावों के खत्म होते ही ये लामबंद होने लगते हैं और संभव हुआ तो अपने गुट के लिए ‘प्रगतिशील मोर्चा’ या ‘विकास मंच’ जैसा कोई विशेषण ढूँढकर सत्ता की सौदेबाजी में लग जाते हैं. कई बार तो इनका मनोबल इतना बढ़ जाता है कि ये मांग करने लगते हैं कि उनके गुट के सभी विधायकों को मंत्रिमंडल में जगह दी जाए और बड़ा राष्ट्रीय दल बाहर रहकर इनका समर्थन करें. बड़े राष्ट्रीय दलों में आपसी प्रतिस्पर्धा इतनी तेज होती है कि अपनी सरकार नहीं बन सकने की स्थिति देख वे ऐसा समझौता करने को भी तैयार हो जाते हैं. इन चुनावोत्तर संभावनाओं पर इनकी ‘गिद्ध-दृष्टि’ चुनाव पूर्व से ही लगी रहती है. अनुशासन का अभाव उत्तराखंड में अभी हालात ऐसे नहीं हुए हैं कि निर्दली उम्मीदवारों की इन रणनीतिक विशिष्टताओं पर आगे भी चर्चा बढ़ाई जाए मगर इतना तो साफ़ है कि उत्तराखंड में दोनों बड़े राजनीतिक दलों के आंतरिक अनुशासन खंड-खंड हो गए हैं. भाजपा और कांग्रेस की क्रमश: 17 एवं 15 और उत्तराखंड क्रांति दल नामक क्षेत्रीय दल की लगभग सात सीटों पर बगावती उम्मीदवारों की तलवारें खिंच गई हैं. नाम वापसी के समय तक भाजपा और कांग्रेस दोनों ने हरचंद कोशिश की कि सीट बँटवारे पर उबलते आक्रोश को दबाया जाए मगर इसमें बस आंशिक सफलता ही मिल पाई. कुछ उम्मीदवार आलाकमान या अपने प्रांतीय नेताओं के दबाव तले बैठ ज़रूर गए मगर उनकी गतिविधियाँ यही दरसा रही हैं कि वे अपने नेताओं से कह सकें कि फ़ैसला उनके हक़ में होता तो पार्टी को यह दिन नहीं देखना पड़ता. (घनश्याम पंकज 'दिनमान' और 'स्वतंत्र भारत' के पूर्व प्रधान संपादक हैं) | इससे जुड़ी ख़बरें उत्तरांचल नहीं, अब उत्तराखंड29 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस केरल और बंगाल में लाल की लहर12 मई, 2006 | भारत और पड़ोस उपचुनावों में कांग्रेस को मिली सफ़लता07 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस तीन राज्यों में फ़रवरी में होंगे चुनाव29 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस प्रदेश का अभूतपूर्व विकास हुआ है: तिवारी01 नवंबर, 2003 | भारत और पड़ोस उत्तरांचल चुनाव:प्रतिष्ठा का मुद्दा11 मई, 2004 | भारत और पड़ोस उत्तरांचल में कांग्रेस मुश्किल में01 मई, 2004 | भारत और पड़ोस एन डी तिवारी की इस्तीफ़े की पेशकश04 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||