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भारतीय मूल के डॉक्टरों पर गाज | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ब्रिटेन में भारतीय मूल के हज़ारों ऐसे डॉक्टरों को भारत वापिस लौटने का ख़तरा पैदा हो गया है जिन्होंने भारत से अच्छी डिग्रियाँ लेने के बाद ब्रिटेन की राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा यानी एनएचएस में रोज़गार हासिल किया था. बहुत से डॉक्टरों ने ब्रिटेन में नौकरी पाने के लिए निर्धारित परीक्षा भी पास कर ली थी और कामकाज या नौकरी मिलने का इंतज़ार कर रहे थे लेकिन अप्रैल 2006 में ब्रिटेन में ऐसे नियम लागू हो गए कि डॉक्टरों को नौकरी पाने के लिए वर्क परमिट हासिल करना होगा. ब्रिटेन चूँकि यूरोपीय संघ का सदस्य है इसलिए उसे भी यूरोपीय क़ानून लागू करने होते हैं और इन क़ानूनों के तहत अब अगर एनएचएस यूरोपीय संघ से बाहर किसी देश के डॉक्टर को नौकरी देती है तो उस यह साबित करना होगा कि उस क़ाबलियत का कोई डॉक्टर पूरे यूरोपीय संघ में नहीं मिल सका है. पहले क़ानून ये था कि बाहर के किसी डॉक्टर या व्यक्ति को नौकरी देने के लिए किसी कंपनी को सिर्फ़ यह साबित करना होता था कि सिर्फ़ ब्रिटेन में उस क़ाबलियत का कोई व्यक्ति उपलब्ध नहीं है. मार्च 2006 में घोषित नए संशोधनों के अनुसार ब्रिटेन में डॉक्टरों के लिए परमिट मुक्त प्रशिक्षण या नौकरी पाने की सुविधा समाप्त कर दी. ब्रिटेन में भारतीय मूल के डॉक्टरों के संगठन - बीएपीआईओ ने उन नए क़ानूनी संशोधनों के ख़िलाफ़ अपील की थी लेकिन ब्रिटेन के उच्च न्यायालय ने उस अपील को ख़ारिज कर दिया है और यह मानने से इनकार कर दिया है कि वे क़ानूनी संशोधन अवैध थे. बीएपीआईओ संगठन के अध्यक्ष डॉक्टर रमेश मेहता ने बीबीसी से बातचीत में कहा है कि इस फ़ैसले से भारतीय डॉक्टरों को भारी झटका लगा है और एनएचएस में काम कर रहे लगभग सोलह हज़ार डॉक्टरों की रोज़ी-रोटी पर ख़तरा मंडराने लगा है. डॉक्टर रमेश मेहता का कहना था कि इस फ़ैसले के बाद भारतीय मूल के डॉक्टरों को वर्क परमिट मिलना तो असंभव सा हो जाएगा क्योंकि तमाम कामकाज और नौकरियों में यूरोपीय संघ के डॉक्टरों को प्राथमिकता मिलेगी. उन्होंने अफ़सोस ज़ाहिर करते हुए कहा कि अब डॉक्टरों को नौकरियाँ उनकी क़ाबलियत के आधार पर नहीं बल्कि उनकी राष्ट्रीयता के आधार पर मिलेंगी जोकि अनुचित है. डॉक्टर रमेश मेहता का कहना था कि वह इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील करेंगे और इस बारे में क़ानूनी सलाह ली जा रही है. उन्होंने कहा कि भारतीय मूल के जो डॉक्टर ब्रिटेन में मौजूद हैं वे हिम्मत से काम लें और जो डॉक्टर भारत से ब्रिटेन में आकर काम करने की उम्मीद रखते हैं, वे यहाँ आने का फ़ैसला करने से पहले दस बार सोचें क्योंकि हालात बहुत बदल गए हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें वीज़ा प्रणाली में बदलाव से लोग परेशान16 जनवरी, 2007 | पहला पन्ना दुनिया में 19 करोड़ प्रवासी:संयुक्त राष्ट्र07 जून, 2006 | पहला पन्ना अमरीकी सीनेट में आप्रवासी विधेयक पास25 मई, 2006 | पहला पन्ना अवैध आप्रवासियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई21 अप्रैल, 2006 | पहला पन्ना 'प्रवासन से स्थानीय अर्थव्यवस्था को लाभ'22 जून, 2005 | पहला पन्ना अवैध आप्रवासियों की समस्या का सच30 अप्रैल, 2005 | पहला पन्ना शादियों के बहाने घपला25 अप्रैल, 2005 | पहला पन्ना लोग अमीर देशों का रुख़ कर रहे हैं21 जनवरी, 2004 | पहला पन्ना | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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