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वीज़ा प्रणाली में बदलाव से लोग परेशान

प्रदर्शनकारी
ब्रिटेन में दूसरे देशों में आए पेशेवर लोगों के सिलसिले में वीज़ प्रणाली बदल दी गई है
ब्रिटेन में भारत, नेपाल, बांग्लादेश, पाकिस्तान, नाइजीरिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड सहित कई देशों से आए पेशेवर कर्मचारी इन दिनों होम ऑफ़िस यानी गृह मंत्रालय को फ़ोन लगा-लगाकर परेशान हैं.

मामला है एचएसएमपी का यानी हायली स्किल्ड माइग्रेशन प्रोग्रैम के तहत आए लोगों का.

दो महीने पहले ब्रिटेन के गृह मंत्रालय ने कहा था कि बेहद पढ़े लिखे पेशेवर लोग अगर अपना वीज़ा बढ़ाना चाहते हैं तो इन्हें कुछ और शर्तें पूरी करनी होंगी.

इन शर्तों में ये बात महत्वपूर्ण होगी कि पेशेवर लोगों की उम्र 30 साल से कम हो और वे 35,000 से 40,000 पाउंड प्रतिवर्ष कमाते हों.

नुकसान

 हमने भारत, नेपाल, पाकिस्तान और बांग्लादेश के उच्चायोगों में बात की है, सबने मदद का वादा भी किया लेकिन अभी तक कुछ नतीजा नहीं निकला है. हम तो लोगों को यही कहेंगे कि ब्रिटेन में आने के बारे में मत सोचिए. कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में जाइए जहाँ की सरकारों की नीति ज़्यादा स्थिर है.
अमित कपाड़िया

ब्रिटेन सरकार की इस नीति का विरोध करने के लिए इन पेशेवरों ने एक संगठन बनाया है – एचएसएमपी.

फ़ोरम के संस्थापक सदस्य और ब्रिटेन में काम कर रहे अमित कापड़िया का कहना है, “ हमने भारत, नेपाल, पाकिस्तान और बांग्लादेश के उच्चायोगों में बात की है, सबने मदद का वादा भी किया लेकिन अभी तक कुछ नतीजा नहीं निकला है. हम तो दूसरे देशों से ब्रिटेन आने के बारे में सोच रहे लोगों को यही कहेंगे कि यहाँ आने के बारे में मत सोचिए. कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में जाइए जहाँ की सरकारों की नीति ज़्यादा स्थिर है. ”

इस बदलाव से जिन लगभग 50,000 लोगों का नुक्सान होगा उनमें से सबसे ज़्यादा भारतीय हैं और 85% एशियाई हैं.

नेपाल में नौकरशाह( अंडरसेक्रेटरी) के पद पर रहे किरण कार्की दो साल से ब्रिटेन में हैं. वे यहाँ घर ख़रीद चुके हैं, उनके बच्चे यहाँ पढ़ रहे हैं.

अब ब्रिटेन की नीति में लाए गए इस बदलाव को वे एक विश्वासघात की तरह देखते हैं

किरण कार्की कहते हैं, “ मैं नेपाल में अंडरसेक्रेटरी के पद पर पर्यावरण मंत्रालय में काम करता था, दो साल पहले मेरे बच्चों ने यहाँ आकर पढ़ना शुरू किया, मैंने यहाँ आकर मकान ख़रीदा. अब अचानक मैं अपनी पूरी ज़िंदगी को पूरी तरह कैसे बदल दूँ.”

'ज़िंदगी से खिलवाड़'

 सरकार का अचानक ये कहना है कि माफ़ कीजिए हमारा मन बदल गया है, हम नियम बदल रहे हैं – ये एक धोखा देने की तरह है. मैं ब्रिटेन सरकार को याद दिलाना चाहता हूँ कि आप लोगों की ज़िंदगियों के साथ खिलवाड़ रहे हैं
गैरी डगलस

न्यूज़ीलैंड के गैरी डगलस अपना कंप्यूटर का व्यापार बेचकर ब्रिटेन में नौकरी करने आए और वे कहते हैं कि नवंबर में हुए ये बदलाव एक क्रूर मजा़क की तरह हैं.

गैरी डगलस कहते हैं, “सरकार का अचानक ये कहना है कि माफ़ कीजिए हमारा मन बदल गया है, हम नियम बदल रहे हैं – ये एक धोखा देने की तरह है. मैं ब्रिटेन सरकार को याद दिलाना चाहता हूँ कि आप लोगों की ज़िंदगियों के साथ खिलवाड़ रहे हैं, लोग अपना सब कुछ छोड़कर आपके बुलावे पर आपके देश में आए और अब आप मनमाने तरीके से उन्हें दूध से मक्खी की तरह फ़ेंक रहे हैं. हम इसके विरुद्ध अपील भी करना चाहें तो वक़ील सिर्फ़ मामला देखने के लिए 10,000 पाउंड माँग रहा है.”

सो ढेरों पैसे लगाकर ही ये पेशेवर कर्मचारी ब्रिटेन में हाई कोर्ट के स्तर पर मामला लड़ सकेंगे जिसके प्रयास जारी हैं.

राजनीतिक तौर पर दिलचस्प बात ये है कि ब्रिटेन में सत्ताधारी लेबर पार्टी के सांसद एंड्रयू डिसमोर ने भी इन लोगों को अपना समर्थन दिया है.

यहाँ तक कि विदेश से नौकरियों के लिए ब्रिटेन आने वालों के मामले देखने वाले विपक्षी कॉन्ज़र्वेटिव पार्टी के प्रमुख नेता डेमियन ग्रीन ने कहा है कि वर्तमान गृह मंत्री जॉन रीड ने जो ग़लतियाँ की हैं उनमें से ये एक बड़ी ग़लती है.

ब्रिटेन के शैडो इमिग्रेशन मिनिस्टर डेमियन ग्रीन का कहना है कि सब लोग जानते हैं कि ऐसे लोगों ने ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था को अपना विशेष योगदान दिया है और इनका वीज़ा न बढ़ाना बड़ी भूल है.

अंतरराष्ट्रीय प्रयास

ब्रिटेन में आ कर काम कर रहे पेशेवर लोग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपना मामला उठा रहे हैं

लेकिन इस समर्थन के बावजूद ब्रिटेन सरकार अपने रुख़ पर अडिग है और नीतियों में कोई बदलाव नहीं किया गया है.

बीबीसी हिंदी के प्रयासों के बावजूद अभी तक हमें ब्रिटेन के गृहमंत्रालय का जवाब नहीं मिल सका है.

आप्रवासियों के लिए काम करने वाली अंतरराष्ट्रीरय संस्था आईओएम यानी इंटरनेशनल ऑर्गेनाइज़ेशन फ़ॉर माइग्रेशन के दुनिया में 120 सदस्य देश हैं.

तो ऐसे मामलों में आईओएम की भूमिका क्या होती है?

जीनिवा स्थित मुख्यालय में लेबर माइग्रेशन डिपार्टमेंट के प्रमुख नीलिम बरुआ का कहना है, “हाँ, हम कुछ तो कर सकते हैं. ये बात अजीब लगती है.जैसा कि इन लोगों का दावा है कि इनसे पहले वादा किया गया कि अगर आर्थिक गतिविधि जारी रही तो उन्हें वीज़ा मिल जाएगा पर अब कहा जा रहा है कि ये शर्तें बदल रही हैं. लेकिन हम विश्व व्यापार संगठन की तरह ताकतवर नहीं हैं, हम ब्रिटेन जैसे देशों को सलाह तो दे सकते हैं – उसे मानने या न मानने का फ़ैसला उस देश का होता है.”

एचएसएमपी फ़ोरम का कहना है कि इससे कम से कम ब्रिटेन पर अंतरराष्ट्रीय दबाव तो बढ़ेगा.

लेकिन जानकार कहते हैं कि पहले डॉक्टरों का मामला और अब इस मामले से एक बात साफ़ है कि जैसे जैसे यूरोपीय संघ के देश यूरोपीय लोगों को प्राथमिकता देते जाएँगे, यूरोप के बाहर के लोगों के लिए अवसर धीरे धीरे कम होते जा सकते हैं.

और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानकों और नियमों के अभाव में सेवा क्षेत्र से जुड़े लोगों की परेशानियाँ भी बढ़ सकती हैं.

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30 अप्रैल, 2005 | पहला पन्ना
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