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अवैध दक्षिण एशियाई आप्रवासियों की उम्मीदें
अमरीका के राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने अमरीका में ग़ैरक़ानूनी तौर पर रहे आप्रवासियों को काम करने के लिए वीज़ा दिए जाने की नई नीति का ऐलान कर के लाखों लोगों को उम्मीद की किरण दिखाई है. अमरीका में क़रीब एक करोड़ लोग ग़ैरक़ानूनी तौर पर रहते हैं और काम करते हैं. दक्षिण एशियाई मूल के लोगों की भी बड़ी तादाद अमरीका में ग़ैरक़ानूनी ढंग से रहती है. भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश से आए कोई 20 लाख लोग बग़ैर सही काग़ज़ात के अमरीका में रहते हैं और काम भी करते हैं. न्यूयॉर्क, लॉस एंजिल्स और शिकागो जैसे बड़े शहरों में इन लोगों की बड़ी तादाद है. कुछ लोग तो दस-दस साल से यहाँ पर ग़ैरक़ानूनी हैसियत से रह रहे हैं. वो अपने को आव्रजन अधिकारियों की नज़रों से बचाए रहते हैं और इसी तरह गुमनाम ज़िंदगी गुज़ारते रहते हैं. अब लगता है इनके मुश्किल के दिन ख़त्म हो जाएँगे. लोगों को काफ़ी उम्मीद है कि नए नियम के लागू होने के बाद ऐसे लोग अपने सही काग़ज़ात के साथ काम कर सकेंगे और उन्हें आव्रजन अधिकारियों से छुपना भी नहीं पड़ेगा. आशाएँ महिपाल सिंह भारत के पंजाब राज्य से आ कर न्यूयॉर्क में वकालत करते हैं.
वो इस नए आप्रवासी क़ानून की सराहना करते हैं, "लोगों को इस मौक़े का फ़ायदा उठाना चाहिए और काम करने की परमिट फ़ौरन ले लेनी चाहिए. इससे वो अपने मुल्क भी आ जा सकेंगे और चोरी-छुपे काम नहीं करना पड़ेगा." ये ग़ैरक़ानूनी तौर पे रहने वाले दक्षिण एशियाई वो नौकरियाँ करते हैं जो अमरीकी लोग नहीं करना चाहते. जैसे रेस्तराँ में बावर्ची, वेटर या प्लेटें धोने का काम, इमारतें बनाने वाले मज़दूर का काम, परचून की दुकान या सुपरस्टोर के कर्मचारी आदि. इन्हें रोज़गार देने वाले इनसे ज़्यादा देर तक और सख़्त काम लेते हैं क्योंकि उन्हें पता होता है कि इनके पास काग़ज़ात नहीं हैं. ऐसे मज़दूरों को औसत पाँच डॉलर प्रति घंटे की दर से मेहनताना दिया जाता है जो कि बहुत ही कम होता है. नई व्यवस्था के बारे में बांग्लादेश के महावाणिज्य दूत रफ़ीक़ खान कहते हैं, "कोई भी क़दम जिससे अवैध रूप से रहने वाले लोगों को वैधता मिल जाए, अच्छा क़दम है. इससे लाखों लोगों को परेशानियों से छुटकारा मिल जाएगा." आशंकाएँ लेकिन लाखों लोगों को ये डर भी है कि कहीं उनसे सारा रिकॉर्ड लेकर अधिकारी उन्हें तीन साल बाद अस्थाई वीज़े की मुद्दत ख़त्म होने के बाद अमरीका से निकाल न दें. इसके बावजूद लोगों में उम्मीद हैं.
भारत से आए विजय सेठ न्यूयॉर्क के एक रेस्तराँ में काम करते हैं. उन्होंने कहा, "यहाँ बहुत से लोग हैं जो सही काग़ज़ात ना होने की वजह से अपनी क्षमताओं के हिसाब से काम नहीं कर सकते. ऐसे लोगों को अब अपनी मर्ज़ी का काम करने का मौक़ा मिलेगा." कुछ लोगों का ये मानना है कि ये ऐलान बुश का एक राजनीतिक क़दम है. वो कहते हैं कि इसके ज़रिए स्पेनिश ज़बान बोलने वाले मेक्सिकन लोगों का वोट हासिल करने की कोशिश की गई है. स्पॉंसर करने के लिए नौकरी की शर्त पर भी कुछ लोगों को आपत्ति है. न्यूयॉर्क में आप्रवासी मामलों के वकील खालिद आज़म कहते हैं, "ये शर्त रखना ग़लत है. इससे लोगों को उनके मालिक या जो स्पॉंसर करता है उसके रहमोकरम पर छोड़ दिया जाएगा." |
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