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'देश के क़ानून को अंतिम मानना चाहिए' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
जाने-माने इस्लामी विद्वान और दिल्ली स्थित इस्लामिक केंद्र के अध्यक्ष मौलाना वहीदुद्दीन ख़ान का कहना है कि अगर शरिया क़ानून और देश के क़ानून में टकराव होता है तो देश के क़ानून को अंतिम माना जाना चाहिए. हाल ही में इमराना मामले में उठे विवाद के बारे में आपकी बात बीबीसी के साथ कार्यक्रम में बोलते हुए उन्होंने ये बात कही. दूसरी तरफ मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के ज़फरयाब जिलानी ने कहा कि शरिया को संविधान का संरक्षण प्राप्त है. एक सवाल के जवाब में मौलाना वहीदुद्दीन ख़ान ने कहा कि भारत के मुसलमानों के लिए अलग क़ानून हों यह उचित नहीं है. उनका कहना था कि मुसलमानों को अपनी अलग क़ानूनी दुनिया बनाने की ज़रूरत नहीं है. मौलाना वहीदुद्दीन ने कहा कि यह सही है कि मुसलमानों की इबादत का तरीका अलग है. लेकिन जब क़ानून की बात आती है तो जो सब पर लागू होगा, वह मुसलमानों पर भी लागू होगा. मौलाना ने साफ़ तौर से कहा कि भारत में सबको स्वतंत्रता हासिल है लेकिन यह तब तक है जब तक देश के क़ानून से उसका टकराव नहीं होता है. उनका कहना था कि यदि किसी मुद्दे पर टकराव होता है तो अदालत का फ़ैसला ही अंतिम होगा. एक सवाल के जवाब में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ज़फरयाब जिलानी ने कहा कि भारत का संविधान हमारे मजहब की रक्षा करता है. उनका कहना था कि वो पहले भी यह कहते आए हैं कि संविधान है तभी मजहब है, इसमें टकराव की बात कहाँ है. |
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