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सोमवार, 02 अक्तूबर, 2006 को 16:21 GMT तक के समाचार
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आरोप-प्रत्यारोप से बढ़ा है अविश्वास

मुंबई में ट्रेनों में हुए धमाकों में 160 से अधिक लोग मारे गए थे
भारत और पाकिस्तान के बीच आरोप-प्रत्यारोप और खंडनों का जो दौर इस सप्ताहांत चला है उससे यह आशंका फिर उभरने लगी है कि पहले ही संकट में घिरी शांति प्रक्रिया पर इसकी छाया ज़रूर पड़ेगी.

शनिवार को मुंबई के पुलिस कमिश्नर एएन रॉय ने एक संवाददाता सम्मेलन में आरोप लगाया कि 11 जुलाई को मुंबई की ट्रेनों में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों की साज़िश पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई ने रची थी, उनके कहने की देर थी कि दोनों तरफ़ से वाकयुद्ध छिड़ गया.

मुंबई में रेलों में हुए धमाके में 186 लोग मारे गए थे और सैकड़ों लोग घायल हो गए थे.

मुंबई के पुलिस कमिश्नर एन रॉय का कहना है कि इन हमलों की साज़िश पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी ने रची थी और धमाके करने का काम पाकिस्तान से चलने वाले चरमपंथी संगठन लश्करे तैबा ने किया था.

कड़ा बयान
 भारत पाकिस्तान के बारे में अपनी राय उसकी बातों के आधार पर नहीं बल्कि उसके कामों के आधार पर बनाएगा
शिवशंकर मेनन, भारत के विदेश सचिव

मुंबई पुलिस का ये भी कहना है कि स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ़ इंडिया (सिमी) का भी इन धमाकों में हाथ था.

जैसा कि हर बार होता है पाकिस्तान ने इन सभी आरोपों को तत्काल ही बेबुनियाद बताते हुए खारिज कर दिया लेकिन पाकिस्तान के सूचना राज्य मंत्री तारिक़ अज़ीम ख़ान ने एक बयान देकर स्थिति और उलझा दिया.

उनके बयान का आशय यह था कि भारत को अपने गिरेबान में झाँककर देखना चाहिए और अपने देश के भीतर पनप रहे अलगाववाद के कारणों का पता लगाना चाहिए.

पाकिस्तानी मंत्री के इस बयान से भारत में विदेश नीति के जानकारों को यही मतलब निकाला कि पाकिस्तान एक बार एक बेहद संवेदनशील मुद्दे को छेड़ने की कोशिश कर रहा है, वह ये कि भारत के मुसलमान भारत की नीतियों की वजह से ख़ुद को पीड़ित और असुरक्षित महसूस कर रहे हैं जिसकी वजह से चरमपंथी गतिविधियों में शामिल हो रहे हैं.

पाकिस्तान का इशारा जिस तरफ़ है वैसी बात और लोग भी करते हैं जिनका मानना है कि मुंबई में रेलों में हुए धमाके गुजरात में हुए दंगों का बदला है जिसमें 2000 से ज्यादा लोग मारे गए थे जिनमें से ज़्यादातर अल्पसंख्यक मुसलमान थे.

प्रतिक्रिया

इस्लामाबाद के इस प्रत्यारोप के बाद भारत की तरफ से भी कड़ी प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं और ये प्रतिक्रिया भारत के शीर्ष कूटनयिक यानी विदेश सचिव की तरफ़ से आ रही है.

अली दुर्रानी
पाकिस्तानी सूचना मंत्री अली दुर्रानी कहते हैं कि मामला सही मंच पर उठाया जाना चाहिए था

पिछले महीने तक पाकिस्तान में भारत के उच्चायुक्त रहे नवनियुक्त विदेश सचिव शिव शंकर मेनन बहुत नाप-तौलकर बोलने वाले कूटनयिक के रूप में जाने जाते रहे हैं लेकिन रविवार को पद संभालते ही उन्होंने अपनी छवि के विपरीत बहुत खुलकर और काफ़ी सख़्ती से इस मामले पर अपनी टिप्पणी दी.

उन्होंने कहा कि ‘‘ भारत पाकिस्तान के बारे में अपनी राय उसकी बातों के आधार पर नहीं बल्कि उसके कामों के आधार पर बनाएगा.’’

मेनन पाकिस्तान के इस बयान पर भी सवाल उठाए हैं जिसमें पाकिस्तान ने कहा था कि मुंबई में ट्रेनों में हुए बम धमाकों का कोई पुख्ता सबूत मुंबई पुलिस ने उनके सामने नहीं रखे हैं.

आरोप
 हम पहले भी पाकिस्तान को पुख्ता सबूत दे चुके हैं लेकिन उन्होंने कभी साथ नहीं दिया
जी पार्थसारथी, पूर्व राजनयिक

विदेश सचिव मेनन ने कहा कि भारत के पास जितने भी सबूत हैं वे पाकिस्तान के सामने पेश किए जाएँगे, उन्होंने इस बारे में पूछे जाने पर स्पष्ट रूप से कहा कि "हम यह मामला पाकिस्तान के साथ ज़रूर उठाएँगे."

भारत का आरोप चाहे जितना भी सही हो, चाहे वह जितने ही 'अकाट्य सबूत' उपलब्ध होने का दावा कर ले लेकिन समाचार माध्यमों के ज़रिए जो बयानबाज़ी हो रही है उससे दोनों तरफ़ खाई तो बढ़ ही रही है.

पहले भी कई मौकों पर पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा है कि वे मीडिया के ज़रिए लगाए गए आरोपों की सफ़ाई नहीं देंगे.

साझा व्यवस्था

पाकिस्तान के सूचना मंत्री मोहम्मद अली दुर्रानी ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि हवाना में गुट निरपेक्ष आंदोलन के शिखर सम्मेलन में आतंकवाद के मुद्दे पर जिस साझा व्यवस्था (एंटी टेररर ज्वाइंट मैकेनिज्म) के गठन की बात हुई थी उसी के तहत यह मुद्दा उठाया जाता तो बेहतर होता.

मुशर्रफ़ और मनमोहन सिंह
मुशर्रफ़ और मनमोहन सिंह ने साझा व्यवस्था पर हवाना में सहमति प्रकट की थी

लेकिन अब तो इस साझा व्यवस्था पर ही सवालिया निशान लग गया है, एक तरफ़ पाकिस्तान इस बात पर एतराज़ जता रहा है कि भारत ने मामले को सही मंच पर क्यों नहीं उठाया जबकि भारत के कई विश्लेषक ये दलील दे रहे हैं कि "एक ऐसे देश के साथ साझा व्यवस्था का क्या अर्थ है जो ख़ुद ही आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है."

इस्लामाबाद में भारत के उच्चायुक्त रह चुके सतीश चंद्रा तो मानते हैं कि हवाना समझौता एक गलती है. उन्होंने कहा कि ‘‘ इसका मतलब है कि भारत और पाकिस्तान आतांकवाद के मामले में बराबर हैं, इससे ज़्यादा हास्यास्पद बात कोई और हो ही नहीं सकती. आतांकवाद पाकिस्तान के लिए एक विदेश नीति का हिस्सा है जबकि ऐसा भारत के साथ कतई नहीं हैं.’’

हड़बड़ी?
 मुंबई पुलिस ने जिस तरह जल्दबाज़ी में प्रेस कॉन्फ्रेंस किया उसके बदले शायद उन्हें दिल्ली में संबंधित अधिकारियों को जाँच के निष्कर्षों के बारे में बताना चाहिए था, इसी तरह पाकिस्तान ने जिस तरह झटके में खंडन जारी किया उसके बदले उसे सबूत सामने आने तक इंतज़ार करना चाहिए था
सिद्धार्थ वरदराजन, विश्लेषक

इस्लामाबाद में भारत के उच्चायुक्त रहे जी पार्थसारथी भी कुछ इसी तरह की सोच रखते हैं. उन्होंने कहा कि "हम पहले भी पाकिस्तान को पुख्ता सबूत दे चुके हैं लेकिन उन्होंने कभी साथ नहीं दिया."

इसी तरह विपक्षी भारतीय जनता पार्टी भी खुलकर हवाना समझौते के ख़िलाफ़ अपनी राय व्यक्त कर रही है जिससे राजनीतिक मोर्चे पर सरकार के लिए स्थिति जटिल हो रही है.

सोमवार को भारत के अखबार द इकॉनॉमिक्स टाइम्स ने कहा कि हवाना में हुई शांति धुएँ में न गुम हो जाए. अखबार लिखता है कि बदली हुई परिस्थितियों में आतंकवाद के ख़िलाफ़ साझा व्यवस्था क़ायम करना आसान नहीं होगा.

एक और मौक़ा?

लेकिन इसके साथ ही कुछ लोग ये भी मानते हैं कि भारत पाकिस्तान के बीच आतंकवाद के खिलाफ़ साझा कोशिशों को एक और मौक़ा मिलना चाहिए.

द हिंदू अख़बार के रणनीतिक मामलों के संपादक सिद्धार्थ वरदराजन का कहना है कि मुंबई पुलिस और पाकिस्तान के अधिकारियों, दोनों ही ने मुंबई बम धमाकों की जाँच से निष्कर्ष निकालने में जल्दबाज़ी की.

मुंबई पुलिस ने पाकिस्तान का हाथ बताया था

उन्होंने कहा, "मुंबई पुलिस ने जिस तरह जल्दबाज़ी में प्रेस कॉन्फ्रेंस किया उसके बदले शायद उन्हें दिल्ली में संबंधित अधिकारियों को जाँच के निष्कर्षों के बारे में बताना चाहिए था, इसी तरह पाकिस्तान ने जिस तरह झटके में खंडन जारी किया उसके बदले उसे सबूत सामने आने तक इंतज़ार करना चाहिए था."

वरदराजन कहते हैं कि अगले महीने विदेश सचिव स्तर पर इस मामले पर साझा आतंकवाद विरोधी व्यवस्था के तहत चर्चा फिर भी होनी चाहिए.

विकल्प नहीं
 आतंकवाद के ख़िलाफ़ साझा व्यवस्था सफल हो या विफल लेकिन उसे एक अवसर तो देना ही चाहिए. वैसे भी शांति वार्ताओं का कोई और विकल्प है भी नहीं
नरेश चंद्रा, पूर्व कूटनयिक

भारत के अमेरिका में रहे पूर्व राजदूत नरेश चंद्रा मानते हैं कि बातचीत की प्रक्रिया को रोकने का सवाल ही नहीं उठ सकता.

उन्होंने कहा, "आतंकवाद के ख़िलाफ़ साझा व्यवस्था सफल हो या विफल लेकिन उसे एक अवसर तो देना ही चाहिए. वैसे भी शांति वार्ताओं का कोई और विकल्प है भी नहीं."

शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के अलावा शायद और कोई विकल्प न हो लेकिन ज़्यादातर विश्लेषक यह भी मानते हैं कि परस्पर अविश्वास और संदेह के इस माहौल में शांति वार्ताओं से भी कुछ ठोस हासिल होने की संभावना न के बराबर है.

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