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बदल रही है आतंक की परिभाषा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पिछले एक साल में भारत में कई चरमपंथी घटनाएँ हुई हैं. चाहे वो दिल्ली में दीवाली के मौके पर लोगों की भीड़ से भरे सरोजनी नगर और पहाड़गंज के विस्फोट हों या वाराणसी के संकटमोचन मंदिर में विस्फोट की घटना और या फिर बंगलौर के भारतीय विज्ञान संस्थान पर हुआ हमला हो. लेकिन पिछले साल 11 जुलाई को मुंबई की आधा दर्जन लोकल ट्रेनों में 13 मिनटों के अंदर लगातार विस्फोटों ने आतंक को एक नई परिभाषा दी. आज तो ये कहा जा रहा है कि मुंबई शायद दुनिया का ऐसा शहर है जिस पर सबसे ज़्यादा हमले हुए हैं. न्यूयॉर्क, टोक्यो, लंदन और मैड्रिड पर भी हमले हुए हैं लेकिन वहाँ इनको दोहराया नहीं गया. शायद हमलावरों का मानना है कि मुंबई पर हमलों के ज़रिए आसानी से अंतरराष्ट्रीय पहुँच बनाई जा सकती है क्योंकि बहुत से विदेशी निवेशकों के हित इस शहर से जुड़े हुए हैं. जाने माने सुरक्षा विश्लेषक ब्रह्म चेलानी कहते हैं,'' मुंबई भारत की आर्थिक राजधानी है और उसकी बहुत अहमियत है. जो हमले हुए हैं, उसके पीछे उद्देश्य साफ़ था कि उसकी अर्थव्यवस्था को पटरी से उतारा जाए." मुंबई ही क्यों? मुंबई हमलों के पीछे एक तर्क ये दिया जाता है कि यहाँ पर इस तरह की कार्रवाई करना अपेक्षाकृत ज़्यादा आसान है. भारत की खु़फ़िया एजेंसी आईबी के पूर्व प्रमुख अजीत कुमार डोवाल मानते हैं, "मुंबई के अंदर चरमपंथियों को लगता है कि वहाँ आसानी से काम अंज़ाम दिया जा सकता है." मुंबई के हत्यारे बहुत आसानी से वारदात के बाद लोगों की भीड़ में समा गए और अपने पीछे ये संदेश छोड़ गए - 'हम कभी भी हमला कर सकते हैं.' एक और बात की ओर ध्यान जाता है और वो ये कि 1993 के विस्फोटों में जहाँ चरमपंथी कई तरह के सबूत छोड़ गए थे, इस बार उन्होंने वारदात को बहुत पेशेवर अंदाज़ में अंजाम दिया है. खुफ़िया ब्यूरो के पूर्व संयुक्त निदेशक मलयकृष्ण धर दोनों घटनाओं का विश्लेषण करते हुए कहते हैं, "1993 में गुस्से में आकर उन्होंने ऐसा किया था. लेकिन इस बार बिल्कुल प्रशिक्षित ग्रुप है और वह योजना बनाकर काम करते हैं." दिल्ली, वाराणसी और अगर बंगलौर को छोड़ दिया जाए तो अब मुंबई में चरमपंथियों ने ऐसे स्थान और समय को चुना है जब वहाँ पर भारी भीड़ हो और लोगों को इसकी बिल्कुल भी उम्मीद न हो. दिल्ली में ये हमला होता है दीपावली से दो दिन पहले, वाराणसी में विस्फोट का स्थान है लोकप्रिय मंदिर और मुंबई में डेटोनेटर दबता है सबसे अधिक भी़ड़वाले समय पर. अजीत कुमार दोवाल कहते हैं,‘‘अगर मुंबई की घटना छह घंटे बाद होती तो हताहतों की संख्या 50 प्रतिशत कम होती. ये बड़ी घटना इसलिए नहीं क्योंकि इसमें 200 लोग मरे. ये बड़ी घटना इसलिए है क्योंकि इसमें सात जगह एक निश्चित समय पर धमाके किए गए.’’ निशाना दूसरा दृष्टिकोण ये है कि इन हमलों को दो वर्गों में बाँटा जा सकता है. खुफ़िया ब्यूरो के पूर्व संयुक्त निदेशक मलयकृष्ण धर कहते हैं, ‘‘मैं इसको दो श्रेणियों में बाटूंगा- अक्षरधाम, अयोध्या और वाराणसी. यह अलग चैनल है. सांप्रदायिक तनाव के लिए ऐसा किया जाता है. सरोजनी नगर, पहाड़गंज हो या मुंबई में धमाके जनता में भगदड़ फैलाने के लिए किए जाते हैं.’’
एक समय था कि चरमपंथी संगठन सरकार से जुड़े प्रतीकों को निशाना बनाते थे. अब ज़ोर आम लोगों को ‘हिट’ करने पर है ताकि इस बात को धता बताई जाए कि देश में सब कुछ सामान्य है. रॉ के पूर्व प्रमुख विक्रम सूद कहते हैं कि ऐसा शायद इसलिए हो रहा है कि भारत का सुरक्षा तंत्र पहले से ज़्यादा मज़बूत हो गया है. उनका कहना है,‘‘जिन्हें हाई प्रोफाइल टार्गेट आप कह रहे हैं जैसे संसद भवन या अन्य संस्थाएं हैं, इसको निशाना बनाना अब इन लोगों के लिए मुश्किल होता जा रहा है. दूसरी बात है कि आम जनता पर हमले करने का असर लोगों पर ज़्यादा पड़ता है.’’ डोवाल मानते हैं कि जनता को कम जोखिम उठाकर निशाना बनाया जा सकता है. लेकिन इससे जिन राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति होती है वो कम महत्वपूर्ण नहीं है. कैसी हो प्रतिक्रिया? इस तरह के हमलों के बाद किया क्या जाना चाहिए? क्या रवैया इसराइल की तरह हो या फिर भारत सरकार की तरह जो कहे तो ये कि आतंकवाद को कुचल कर रख देंगे लेकिन जब करने का वक़्त आए तो करे कुछ नहीं. सुरक्षा विश्लेषक ब्रह्म चेलानी कहते हैं, ''जो इसराइल कर रहा है वह ज़रूरत से ज़्यादा है और जो भारत कर रहा है वह ज़रूरत से बहुत कम है. भारत में जब भी कोई बड़ा हमला होता है तो उसका जवाब केवल शब्दों में होता है." उनका कहना है,'' कश्मीर के अंदर 15 साल से चरमपंथ चल रहा है लेकिन हमने कभी वायु सेना का इस्तेमाल नहीं किया. दरअसल भारत की सरकार बहुत मज़बूत है. हमारी सुरक्षा एजेंसियाँ बहुत मज़बूत है.’’ ये भी एक विडंबना है कि केंद्र सरकार एक तरफ आतंकवाद बर्दाश्त न करने की बात कहती है तो दूसरी तरफ़ उसके सहयोगी दल ओसामा बिन लादेन की शक्ल वाले एक व्यक्ति को चुनाव प्रचार में उतारते हैं. मलयकृष्ण धर इससे काफ़ी खिन्न नज़र आते हैं. उनका कहना है,"राजनेताओं के बारे में क्या बताएँ. पीलू मोदी अपने कपड़े पर लिखवाए घूमते थे कि 'मैं सीआईए एजेंट हूँ' और राजनारायण भी ऐसे ही कुछ बोलते रहते थे. लेकिन अब हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा बहुत ख़तरे में है और सभी को उसी तरह ज़िम्मेदार होना पड़ेगा.’’ राष्ट्रीय सुरक्षा एक गंभीर मामला है. सौ प्रतिशत सुरक्षा तो कतई संभव नहीं है. लेकिन ज़रूरी है कि इस तरह के ख़तरों की पहले से पहचान की जाए और इसको अंज़ाम देने वालों को साफ़ संदेश जाए कि उन्हें इसका ख़ामियाज़ा भुगतना होगा. |
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