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एक साहित्यिक रचना का राजनीतिकरण | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अक्सर विवाद ऐसे लोग पैदा करते हैं जिनका मुद्दे से कोई संबंध नहीं होता. हमारे समाज के लोगों का एक समूह है, शायद छोटा सा, जो महसूस करता है कि वंदे मातरम् मूर्ति की वंदना है और उनके धर्म के अनुकूल नहीं है. अगर यही भावना है तो हमें वंदे मातरम् गाना अनिवार्य करने के बारे में भूल जाना चाहिए और इसे सबके लिए ज़रूरी और बाध्यकारी नहीं करना चाहिए. मैं मानता हूँ कि गीत गाना एक भावनात्मक अनुभव है. यह एक सांस्कृतिक रचना का समर्थन है. मैं यह कहना चाहता हूँ कि अगर किसी को आपत्ति है तो उसके लिए वंदे मातरम् गाना अनिवार्य नहीं करना चाहिए.
मेरा मानना है कि गीत के पहले दो छंदों में मातृभूमि की सुंदरता का गीतात्मक वर्णन किया गया है. लेकिन 1880 के दशक के मध्य में गीत को नया आयाम मिलना शुरू हो गया. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि बंकिम चंद्र ने 1881 में अपने उपन्यास आनंदमठ में इस गीत को शामिल कर लिया. उसके बाद कहानी की माँग को देखते हुए उन्होंने इस गीत को लंबा किया. बाद में जोड़े गए हिस्से में ही दशप्रहरणधारिणी (दुर्गा), कमला (लक्ष्मी) और वाणी (सरस्वती) के उद्धरण दिए गए हैं. लेखक होने के नाते बंकिम चंद्र को ऐसा करने का पूरा अधिकार था और इसको लेकर तुरंत कोई नकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं हुई. यानी तब किसी ने ऐसा नहीं कहा कि यह मूर्ति की वंदना करने वाला गीत है या 'राष्ट्रगीत' नहीं है. काफ़ी समय बाद जब विभाजनकारी मुस्लिम और हिंदू सांप्रदायिक ताकतें उभरीं तो यह राष्ट्रगीत से एक ऐसा गीत बन गया जिसमें सांप्रदायिक निहितार्थ थे. 1920 और ख़ासकर 1930 के दशक में इस गीत का विरोध शुरू हुआ. मोहम्मद अली जिन्ना इसका विरोध करने लगे. 'राजनीतिकरण' यह एक साहित्यिक रचना के राजनीतिकरण की कहानी है. राजनीतिक पार्टियों के लिए इसके मायने साहित्यिक दृष्टि से एकदम उलट हैं. अलग-अलग पार्टियों ने इसकी नई-नई व्याख्याएँ अपनी सुविधानुसार कीं, जो बंकिम चंद्र और उनकी रचना की भावना से अलग है. एक ओर जहाँ इसे मूर्तिपूजक और मुस्लिम विरोधी उपन्यास अंश बताकर विरोध किया जा रहा है, वहीं दूसरा समुदाय इन्हीं तत्वों को इसका गुण बताकर समर्थन कर रहा है. मैं बांग्ला बोलता हूँ और मेरा पालन-पोषण भारत में उस समय हुआ जब यह गीत स्कूलों में नियमित रूप से गाया जाता था.
वे प्रेसीडेंसी कॉलेज से पहले स्नातक थे, जहाँ से मैं भी हूँ. इसके अलावा यह गीत मेरी और शायद उस पूरी पीढ़ी की संस्कृति का हिस्सा है जिससे मैं हूँ. इसलिए व्यक्तिगत रूप से मेरे लिए यह एक सुंदर और प्रेरणादायक गीत है, ख़ासकर पहले दो छंद. लेकिन अगर आप गीत के बाद के हिस्से की बात करेंगे तो यह सच है कि इसमें हिंदू धर्म के प्रतीकों की बात की गई है. 1937 में जब जवाहर लाल नेहरू ने रवींद्रनाथ ठाकुर से इसे राष्ट्रगीत बनाने के सवाल पर सलाह माँगी तो उन्होंने कहा कि शायद पहले दो छंदों को ही अपनाना ठीक होगा. और यह सही निर्णय साबित हुआ. राजनीतिक और सांस्कृतिक वजहों को ध्यान में रखकर वंदे मातरम् गीत के पहले दो छंदों को ही राष्ट्रगीत रखना चाहिए और सार्वजनिक रूप से इसके गाने और सुनने को अनिवार्य नहीं करना चाहिए. वंदे मातरम् को देशभक्ति के 'लिटमस टेस्ट' या सही कसौटी के रूप में पेश करना भी अत्यंत आपत्तिजनक है जैसा कि हिंदू सांप्रदायिक तत्व कर रहे हैं. इससे देश में विघटन को बढ़ावा मिलेगा. (बीबीसी संवाददाता रेणु अगाल के साथ बातचीत पर आधारित) |
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