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रविवार, 20 अगस्त, 2006 को 16:13 GMT तक के समाचार
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'आज़ादी के बावजूद असमानता कायम'

रणवीर सिंह
रणवीर सिंह मानते हैं कि सबके हाथों में रोजगार देना सबसे बड़ी चुनौती है
भारत की संविधान सभा के एकमात्र जीवित सदस्य चौधरी रणवीर सिंह और समाजशास्त्री योगेंद्र यादव दोनों मानते हैं कि आज़ादी के छह दशकों में अमीरों और ग़रीबों के बीच खाई बढ़ी है.

रणवीर सिंह और योगेंद्र यादव ने 'आपकी बात बीबीसी के साथ' कार्यक्रम में कहा कि आज़ादी के बाद देश शैशव काल से गुज़र रहा है और अभी अंतिम निष्कर्ष पर पहुँचना बाकी है.

रणवीर सिंह कहते हैं, "आज़ादी के समय में देश की आबादी 33 करोड़ थी जो अब बढ़ कर 100 करोड़ हो गई है. आज़ादी के समय अनाजों का आयात होता था लेकिन अब हम निर्यात करने की स्थिति में है. एक कमज़ोरी ज़रुर है कि हम सभी हाथों में रोज़गार नहीं दे पाए."

दूसरी ओर योगेंद्र यादव ने कहा, "निश्चित रुप से आर्थिक आत्मनिर्भरता एक उपलब्धि है. लेकिन आम लोग यह भी पूछते हैं कि इससे उन्हें क्या मिला. कई जगहों से भुखमरी की घटनाएँ सामने आ रही है. दोनों साथ क्यों? लोकतंत्र में ये दोनों ही जायज़ सवाल है. विकास और समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के बीच सामंजस्य बनाना सबसे बड़ी चुनौती है."

आज़ादी के समय अनाजों का आयात होता था लेकिन अब हम निर्यात करने की स्थिति में है. एक कमज़ोरी ज़रुर है कि हम सभी हाथों में रोज़गार नहीं दे पाए
रणवीर सिंह

उन्होंने कहा कि जिन किसानों ने देश को आत्मनिर्भरता दी वही अब आत्महत्या कर रहे हैं, इसलिए ज़रूरी ये है कि ग्रामीण और शहरी विकास के असंतुलन को दूर किया जाए.

योगेंद्र यादव कहते हैं, "इसके लिए ग्रामीण क्षेत्रों में और असंगठित क्षेत्र में रोज़गार के अवसर बढ़ाए जाने चाहिए. गाँवों में उद्योग धंधे स्थापित करने चाहिए."

सामाजिक न्याय

सामाजिक न्याय के सवाल पर रणवीर सिंह ने कहा कि पंजाब और हरियाणा में आम लोग भी खुशहाल हैं लेकिन देश के कुछ अन्य इलाक़ों में स्थिति ऐसी नहीं है.

 सामाजिक न्याय के क्षेत्र में हमारे लोकतंत्र की अनूठी उपलब्धि है. एक बदलाव आया है. जहाँ तक सामाजिक न्याय और प्रतिभा को जोड़ने की बात है तो ये एक दूसरे के विरोधाभासी नहीं बल्कि पूरक हैं
योगेंद्र यादव

उन्होंने कहा कि इस तरह की स्थितियों से निपटने के लिए सरकार कोशिश कर रही है जिससे तस्वीर बदलेगी.

सामाजिक न्याय और आरक्षण के मुद्दे पर योगेंद्र यादव ने कहा, "सामाजिक न्याय के क्षेत्र में हमारे लोकतंत्र की अनूठी उपलब्धि है. एक बदलाव आया है. जहाँ तक सामाजिक न्याय और प्रतिभा को जोड़ने की बात है तो ये एक दूसरे के विरोधाभासी नहीं बल्कि पूरक हैं."

उन्होंने शिक्षा के स्तर में असमानता का ज़िक्र करते हुए कहा कि गाँवों और शहरों की तालीम में अंतर है जिसे दूर किया जाना चाहिए.

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