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रविवार, 28 मई, 2006 को 16:46 GMT तक के समाचार
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'कश्मीर मसले पर कई बार चूका भारत'
यशवंत सिन्हा
यशवंत सिन्हा के अनुसार भारत ने समाधान के कई मौके खोए
भारत के पूर्व विदेश मंत्री यशवंत सिन्हा का कहना है कि पिछले 60 वर्षों में कई बार ऐसे मौके आए जबकि कश्मीर समस्या का स्थाई समाधान किया जा सकता था पर भारत ने इस दौरान कड़ा रुख़ नहीं अपनाया और यह समस्या अभी तक बनी हुई है.

उन्होंने कहा कि अगर भारत कश्मीर समस्या का समाधान चाहता है तो उसे पाकिस्तान के साथ चिकनी-चुपड़ी बातें करना छोड़ कर कड़ा रुख़ अपनाना होगा.

पूर्व विदेशमंत्री यशवंत सिन्हा रविवार को बीबीसी के दिल्ली स्टूडियो में हिंदी सेवा के रेडियो कार्यक्रम, आपकी बात, बीबीसी के साथ में श्रोताओं के सवालों का जवाब दे रहे थे.

कश्मीर समस्या के समाधान के मसले पर पिछले 60 वर्षों के इतिहास का हवाला देते हुए उन्होंने कहा, "वर्ष 1947 में जब भारतीय सेना पाकिस्तान की सेना को पीछे ढकेल रही थी, वर्ष 1948 में जब हमने संघर्ष विराम घोषित कर दिया था, हम इस मसले को सयुक्त राष्ट्र संघ में लेकर गए जिसकी ज़रूरत नहीं थी, बांग्लादेश युद्ध के बाद भी हम इसे आगे के लिए छोड़ने के बजाय तभी हल कर सकते थे. ऐसे कितने ही मौके भारत ने गँवाए हैं जबकि इस समस्या का स्थाई समाधान निकाला जा सकता था."

 वर्ष 1947 में जब भारतीय सेना पाकिस्तान की सेना को पीछे ढकेल रही थी, वर्ष 1948 में जब हमने संघर्ष विराम घोषित कर दिया था, हम इस मसले को सयुक्त राष्ट्र संघ में लेकर गए जिसकी ज़रूरत नहीं थी, बांग्लादेश युद्ध के बाद भी हम इसे आगे के लिए छोड़ने के बजाय तभी हल कर सकते थे. ऐसे कितने ही मौके भारत ने गँवाए हैं जबकि इस समस्या का स्थाई समाधान निकाला जा सकता था
यशवंत सिन्हा, पूर्व विदेशमंत्री-भारत

हाल ही में भारत प्रशासित कश्मीर में कश्मीर समस्या के समाधान की दिशा में भारत सरकार की ओर से आयोजित दूसरे गोलमेज़ सम्मेलन को भी उन्होंने आड़े हाथों लिया.

उन्होंने कहा, "कश्मीर में इस तरह की बातचीत को हाईप्रोफ़ाइल बनाना आवश्यक नहीं है. इससे कई लोगों की जान गई. सामान्य जनजीवन ठप्प हो गया था. कई संगठनों ने इसमें हिस्सा भी नहीं लिया. कोई बड़ा नतीजा भी नहीं निकलता नज़र आया. ऐसे में कभी-कभी ऐसी वार्ताओं का चुपचाप होना ज़्यादा लाभप्रद हो सकता है."

सिन्हा ने इस बात को भी दोहराया कि भारत सरकार में एक पूर्णकालिक विदेश मंत्री के न होने के कारण विदेश नीति के मुद्दे पर वह प्रगति देखने को नहीं मिल पा रही है, जैसी की भारत के लिए आज के दौर में आवश्यक है.

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