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'मीडिया पर ख़ुद का नियंत्रण हो' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
प्रसार भारती के पूर्व प्रमुख एसएस गिल और 'आज तक' के समाचार निदेशक क़मर वहीद नक़वी का मानना है कि मीडिया पर नियंत्रण ज़रुरी है. लेकिन इसके स्वरूप को लेकर मतभेद है. एसएस गिल और नक़वी ने आपकी बात बीबीसी के साथ कार्यक्रम में श्रोताओं के सवालों का जवाब देते हुए कहा कि मीडिया को मिली आज़ादी का मतलब ये नहीं है कि उन्हें अपनी ज़िम्मेदारी से दूर हो जाना चाहिए. एसएस गिल ने कहा, "भारत की सांस्कृतिक और वैचारिक विविधता को देखते हुए एक तरह का दिशा निर्देश ज़रुरी है. नहीं तो कई तरह के अंतर्विरोध पैदा होंगे." हालाँकि सरकार की ओर से कोई नियंत्रण थोपा जाए इससे निजी टेलीविज़न समाचार चैनल 'आज तक' के समाचार निदेशक नक़वी सहमत नहीं हैं. उन्होंने कहा, "समाचार चैनलों का इतिहास इस देश में बहुत पुराना नहीं है. मुझे नहीं लगता कि पिछले पाँच छह वर्षों में निजी टीवी मीडिया ने कोई ग़ैर ज़िम्मेदाराना काम किया हो." राजनैतिक पहलू एक श्रोता के इस सवाल पर कि घूस लेते हुए दिखाए जाने के बावजूद सासंदों को बचाने के लिए तरह-तरह के प्रयास हो रहे हैं, नक़वी ने कहा, "ये बात ज़रूर है कि मीडिया के इस तरह के स्वरुप से राजनेताओं में एक तरह की बेचैनी है. वे कुछ हताशा में हैं. इसीलिए मीडिया की आज़ादी पर लगाम जैसी बात आई." हालाँकि एसएस गिल का तर्क है कि मीडिया के दायरे में सिर्फ़ न्यूज़ चैनल नहीं बल्कि मनोरंजन और अन्य चैनल भी आते हैं. वे कहते हैं, "ये ज़रूर है कि राष्ट्रीय मीडिया ने ज़िम्मेदारी से काम निभाया है. गाँवों की समस्याएँ उभर कर सामने आ रही हैं. लेकिन कभी-कभी ये लक्ष्मण रेखा भी पार कर जाते हैं और कोई देश ऐसा नहीं है जहाँ किसी न किसी तरह का नियंत्रण न हो." नक़वी भी मानते हैं कि आज़ादी का मतलब अराजकता कतई नहीं है. इसिलए उन्होंने स्टिंग ऑपरेशन का क्या स्वरुप हो, इस पर बहस और दिशा निर्देश का समर्थन किया. उपभोक्तावाद एसएस गिल ने कहा कि निजी चैनल सिर्फ़ मुनाफ़े के लिए चल रहे हैं और जहाँ भी मुनाफ़े का मामला आता है तो उस पर नियंत्रण होना चाहिए. हालाँकि उन्होंने ये भी स्वीकार किया कि जहाँ निजी चैनल मुनाफ़े को ध्यान में रख कर संचालित होते हैं वहीं सरकार समर्थित मीडिया सरकारी तोते की तरह दिखने लगता है. नक़वी इसे बदले हालात की परिणति मानते हैं. उन्होंने कहा, "पिछले दस वर्षों में भारत ने जो विकास किया है वो इससे पूर्व के सौ वर्षों में भी नहीं हुआ. इसलिए समाज और सोच भी तेज़ी से बदली है. इसलिए निश्चित रुप से मीडिया भी रुका नहीं रहेगा और वो भी बदलेगा." | इससे जुड़ी ख़बरें 'काल कपाल..' के बाद अब बारी 'ख़ौफ़' की29 जुलाई, 2006 | मनोरंजन निजी एफ़एम पर ख़बरें अभी नहीं22 जनवरी, 2006 | भारत और पड़ोस 'क्वात्रोची को कोई क्लीनचिट नहीं दी'15 जनवरी, 2006 | भारत और पड़ोस 'अब फ़िल्मों में अंडरवर्ल्ड का पैसा नहीं'25 सितंबर, 2005 | भारत और पड़ोस दोतरफ़ा कार्रवाई की ज़रूरत :कौशल20 नवंबर, 2005 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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