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'अब फ़िल्मों में अंडरवर्ल्ड का पैसा नहीं' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
निर्माता और निर्देशक प्रकाश झा मानते हैं कि हिंदी फ़िल्मों पर व्यावसायिकता हावी हो गई है. लेकिन उन्होंने कहा कि अब फ़िल्मों में अंडरवर्ल्ड का पैसा नहीं लगा है. उनका कहना है कि बाज़ार जिस तरह से बदला है उसके चलते सामानांतर सिनेमा बनाना मुश्किल हो गया है और सब कुछ बाज़ार को ध्यान में रखकर बनाया जा रहा है. 'आपकी बात बीबीसी के साथ' कार्यक्रम में श्रोताओं के सवालों के जवाब देते हुए प्रकाश झा ने कहा कि इस समय हिंदी सिनेमा ऐतिहासिक मुकाम पर है. सवाल था कि बॉलीवुड को कौन चलाता है? और इस सवाल के जवाब में प्रकाश झा ने कहा कि एक समय ऐसा ज़रुर था कि कहा जाता था कि फ़िल्म इंडस्ट्री पर अंडरवर्ल्ड का असर है लेकिन अब स्थिति बदल गई है. उनका कहना था कि अब फ़िल्म इंडस्ट्री में कार्पोरेट संस्कृति चल पड़ी है. उन्होंने कहा कि 60 और 70 के दशक में सरकार फ़िल्में सार्थक फ़िल्में बनाने के लिए आर्थिक सहायता दी जाती थी लेकिन इसे सरकार ने बंद कर दिया है. हालांकि उन्होंने कहा कि अब जिस तरह शहरों में मल्टीप्लेक्स बन रहे हैं उसके चलते सरकारी सहायता की ज़रुरत भी नहीं बची है. प्रकाश झा ने कहा कि इससे फ़िल्मों को भी फ़ायदा हुआ है. नकल एक श्रोता के सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि इस बात में कोई संदेह नहीं है कि हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री में बहुत से लोग नकल कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि यह अस्वाभाविक भी नहीं है क्योंकि हॉलीवुड ख़ुद भी अपनी सफल फ़िल्मों की नकल करता है और दुनिया भर में हर सफल उत्पाद की नकल हो जाती है. प्रकाश झा ने कहा कि अच्छा यह है कि भारत में मूल विषयों पर काम हो रहा है. हालांकि उन्होंने कहा कि अभी भी पटकथा आदि पर खर्च नहीं हो रहा है. इसका उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा, "पिछले साल हॉलीवुड में 85 करोड़ डॉलर पटकथा पर खर्च हुआ लेकिन हमारे यहाँ इसकी तुलना में सौवाँ हिस्सा भी खर्च नहीं किया जा रहा है." सपने बेचना प्रकाश झा ने श्रोताओं के सवाल का जवाब देते हुए कहा कि जो लोग अपने निजी जीवन के लिए अलग आदर्श रखते हैं और बाहर के लिए और ये ग़लत है.
उन्होंने अंग प्रदर्शन आदि से जुड़े सवाल के जवाब में कहा कि फ़िल्म इंडस्ट्री में भी ऐसे दोहरे मापदंड वाले लोग हैं. उन्होंने कहा, "जो लोग औरत का जिस्म दिखाकर और सुंदरता दिखाकर बेचना चाहते हैं उनकी निंदा की जानी चाहिए." उन्होंने एक और सवाल के जवाब में दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रावास का उदाहरण देते हुए कहा कि जब वास्तविक जीवन में समाज बदल रहा है तो फ़िल्में भी बदलेंगी ही. सिनेमा के माध्यम से सपने बेचने के सवाल पर उन्होंने दो टूक कहा, "सपने दिखाने और सपने बेचने में तो कोई बुराई नहीं है. सबके पास सपने तो होने ही चाहिए." बिहार की चिंता बिहार के एक श्रोता के सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि वे ख़ुद भी बिहार से आते हैं और इस समय बिहार की जो छवि है उससे वे भी चिंतित हैं. उन्होंने कहा कि इस समय बिहार जिस स्थिति से गुज़र रहा है उसके लिए सिर्फ़ राजनीतिज्ञ ही नहीं सब लोग ज़िम्मेवार है, समाज ज़िम्मेवार है. उन्होंने कहा कि वे व्यक्तिगत तौर पर कोशिश कर रहे हैं कि बिहार की स्थिति को बदला जा सके. उनका कहना था कि सिर्फ़ अच्छा दिखाने से काम नहीं चलेगा, बुराइयों को भी उभारना होगा. उन्होंने कहा कि वे जो कहना चाहते हैं अपनी फ़िल्मों के माध्यम से कहते हैं लेकिन अब यह तो जनता पर है कि वह देखे कि इससे संदेश क्या जा रहा है. |
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