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रविवार, 11 जुलाई, 2004 को 16:11 GMT तक के समाचार
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सिनेमाघरों का रुख़ करने लगे हैं लोग

पीवीआर सिनेमा
लोग फिर पीवीआर के बड़े सिनेमाघरों का रुख़ करने लगे हैं
भागती दौड़ती ज़िंदगी से रुपहले पर्दे पर सपनों की दुनिया में खींच ले जाने वाली फ़िल्में देखने के लिए लोग एक बार फिर सिनेमाघरों का रुख़ करने लगे हैं.

एक ज़माना था जब दिल्ली के सिनेमाघरों के बाहर मेले का सा माहौल होता था. चार का आठ, दस का बीस कहते टिकट ब्लैक करने वालों की फुसफुसाहटें और हाउसफ़ुल के बड़े से बोर्ड के आगे सिनेमा टिकट का जुगाड़ करते लोगों को देखना आम बात थी.

लेकिन बदलते ज़माने में वीसीडी, केबल और मल्टीप्लैक्स यानि कई स्क्रीन वाले बड़े सिनेमाघरों की भीड़ में एक स्क्रीन वाले बड़े सिनेमाघरों ने अब भी अपनी पहचान बनाए रखी है.

हालांकि समय के साथ न चल पाने की वजह से कुमार, जुबली, मिनर्वा, सावित्री और चंद्रलोक जैसे सिनेमाघर गुमनामी के अंधेरे में खो गए, तो विवेक और न्यू अमर जैसे मेट्रो रेल के स्टेशनों में तब्दील हो गए और जो सिनेमाघर बदल नहीं पाये वे 'जंगली हसीना' या 'यूरोपियन ब्यूटी' जैसी 'सी' ग्रेड फ़िल्मों के भरोसे ज़िंदा हैं.

आज डिलाइट, गोलचा, जनक और विशाल जैसे लगभग एक हज़ार सीटों वाले बड़े सिनेमाघरों ने आधुनिकतम तकनीक और दर्शकों के आराम की बेहतरीन सुविधाएं जुटाकर लोगों को अपनी ओर खींचा है.

डिलाइट सिनेमा के मालिक शशांक रायज़ादा का मानना है, “बड़े सिनेमा हॉल और मल्टीप्लेक्स में फ़िल्में देखने में उतना ही फ़र्क है जितना बोइंग और छोटे हवाई जहाज़ में सफर करने में है.”

स्टेटस सिंबल

मल्टीप्लेक्स सिनेमाघर में जाना आज स्टेटस सिंबल माना जाता है साथ ही वहाँ कई फ़िल्मों में से चुनने की सुविधा भी रहती है.

बुरे हाल में सिनेमाघर
कुछ पुराने सिनेमाघर इतने बुरे हाल में हैं कि उन्हें सी ग्रेड की फ़िल्में दिखानी पड़ रही हैं

पीवीआर मल्टीप्लेक्स सिनेमाघरों के वाणिज्यिक उपाध्यक्ष तुषार ढींगरा का कहना है, “मल्टीप्लेक्स के थिएटर, वर्ग विशेष के लिए बनने वाली फ़िल्में जैसे जॉगर्स पार्क, बेंड इट लाइक बेकम और झंकार बीट्स को भी प्रदर्शित कर सकते हैं लेकिन बड़े सिनेमाघरों के लिए ऐसा करना आसान नहीं होता.”

बड़े सिनेमाघरों में जहाँ 20 से 80 रुपए के बीच ख़र्च करके फ़िल्म का लुत्फ़ उठाया जा सकता है वहीं मल्टीप्लेक्स सिनेमाघरों में बाल्कनी की टिकट के लिये 150 रुपये ख़र्च करने पड़ते हैं.

पश्चिमी दिल्ली की अलका का कहना है, “दर्शक कम दाम में बेहतर सुविधाएँ चाहता है जो बड़े सिनेमाघर अब दे पा रहे हैं.”

बड़े बजट की वजह से फ़िल्मों को प्रदर्शित करने की लागत में भी बढ़ोत्तरी हुई है लेकिन देवदास, कोई मिल गया, कल हो न हो जैसी बड़ी फ़िल्मों को प्रदर्शित करने में बड़े सिनेमाघर सफल रहे हैं.

मोशन पिक्चर्स एसोसिएशन के सचिव ख़ान मोहम्मद सादिक़ ख़ान का कहना है, “भव्य फ़िल्मांकन वाली फ़िल्मों को बड़ी स्क्रीन पर देखना एक अलग ही अनुभव है और इसके चलते बड़े सिनेमाघरों पर हाउसफुल के बोर्ड के बावजूद इन सिनेमाघरों ने अपना वजूद बनाए रखा है.”

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